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इस्लाम में फर्ज है रोज़़ा

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  • चौथी किस्त

यही वजह है कि अल्लाह ने कुरआन में रोज़़े का हुक्म देने के बाद फरमाया-तुम पर रोज़़ा फर्ज़ किया जाता है, शायद कि मुत्तकी और परहेज़गार बन जाओ। यह नहीं फरमाया कि इससे ज़रूर मुत्तकी और परहेज़गार बन जाओगे। इसलिए कि रोज़़े का यह नतीजा तो आदमी की समझ-बूझ और उसके इरादे पर मौकूफ है। जो इसके मक़्सद को समझेगा और उसके ज़रिए से असल मक़् सद को हासिल करने की कोशिश करेगा, वह थोड़़ा या बहुत मुत्तकी बन जायेगा, मगर जो मक़्सद ही कोन समझेगा और उसे हासिल करने की कोशिश न करेगा उसे कोई फायदा हासिल होने की उम्मीद नहीं। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुखतलिफ तरीकों से रोज़़े के असल मकसद की तरफ ध्यान दिलाया है और यह समझाया है कि मकसद से गाफ़िल होकर भूखा-प्यासा रहना कुछ मुफीद नहीं। जैसा कि फरमाया-जब किसी ने झूठ बोलना और झूठ पर अमल करना ही न छोड़़ा तो उसका खाना और पीना छुड़़ा देने की अल्लाह को कोई हाजत नहीं। दूसरी हदीस मे है कि प्यारे नबी सल्ल. ने फरमाया-बहुत से रोज़़ेदार ऐसे हैं कि रोज़़े से भूख-प्यास के सिवा उनके पल्ले कुछ नहीं पड़ता और बहुत से रातों के खड़़े होने वाले ऐसे हैं कि इस कियाम के रातजगे के सिवाय उनके पल्ले कुछ नहीं पड़ता। इन दोनों हदीसों का मतलब बिल्कुल साफ है। इनसे साफ तौर पर मालूम होता है कि सिर्फ भूखा और प्यासा रहना इबादत नहीं है, बल्कि असल इबादत का ज़रिया है और असल इबादत है खुदा की मुहब्बत की वजह से हर उस काम के लिए शौक से लपकना जिसमें महबूब की खुशनूदी हो और जहां तक मुम्ककिन हो नफसानियत से बचना। इस इबादत से जो आदमी गाफ़िल रहा उसने बेकार ही अपने पेट को भूख और पयास की तकलीफ दी। अल्लाह तआला को इसकी ज़रूरत कब थी कि बारह-चौदह घंटों के लिए उससे खाना-पीना छुड़़ा देता। रोज़़े के असल मक़्सद की ओर प्यारे नबी सल्ल. इस तरह ध्यान दिलाते हैं कि- जिसने रोज़़ा रखा, ईमान और एहतिसाब के साथ, उसके तमाम पिछले गुनाह माफ कर दिए गए। ईमान का मतलब यह है कि खुदा के बारे में एक मुसलमान का जो अकीदा होना चाहिये, वही अकीदा दिमाग में पूरी तरह ताज़़ा रहे और एहतिसाब का मतलब यह है कि आदमी हर वक़्त अपने ख्य़य़ालों और अपने कामों पर नज़र रखें कि कहीं वह अल्लाह की मरज़़ी के खिलाफ तो नहीं चल रहा है। इन दोनों चीज़़ों  के साथ जो आदमी रमज़़ान के पूरे रोज़़े रख लेगा वह पिछले गुऩाह बख़्शवा ले जायेगा। इसलिए कि अगर वह कभी सरकश व नाफरमान बंदा था भी तो अब उसने अपने मालिक की तरफ रूजू कर लिया जैसा कि नबी सल्ल. ने फरमाया कि- गुनाह से तौबा करने वाला ऐसा है कि जैसे उसने गुनाह किया ही ना था। दूसरी हदीस में आया है- रोज़़ा ढाल की तरह है (कि जिस तरह ढाल दुश्मन के वार से बचाने के लिए है, उसी तरह रोज़़ा भी शैतान के वार से बचने के लिए है) इसीलिए जब कोई आदमी रोज़़े से हो तो उसे चाहिए (कि इस ढाल के इस्तेमाल करे और) दंगे-फसाद से परहेज़ करे। अगर कोई आदमी उसको गाली दे या उससे लड़़ेतो उसको कह देना चाहिए कि भाई! मैं रोज़़े से हूं, मुझ से यह उम्मीद न रखों कि तुम्हारे इस मामले में हिस्सा लूंगा। दूसरा हदीसों में हुज़़ूर सल्ल. ने बताया है कि रोज़़े की हालत में आदमी को ज्य़य़ादा नेक काम करने चाहिये और हर भलाई का शौकीन बन जाना चाहिये। खासकर उस हालत में उसके अनदर अपने दूसरे भाइयों की हमदर्दी का जज़्बा तो पूरी शिद़दत के साथ पैदा हो जाना चहिए, क्योंकि वह खु़द भूख- प्यास की तकलीफ में मुब्तिला होकर ज्य़य़ादा अच्छी तरह महसूस कर सकता है कि दूसरे खुदा के बन्दों पर गरीबी और मुसीबत में क्या गुज़रती है। हज़रत इब्ने अब्बास(रजि.)की रिवायत है कि खुद हज़रत मुहम्मद सल्ल. रमज़़ान में आम दिनों से ज्य़य़ादा मेहरबान और शफीक हो जाते थे। कोई मांगने वाला उस ज़माने में हुज़़ूर सल्ल. के दरवाज़़े से खाली न जाता था और कोई कै़दी उस ज़माने में कै़दन रहता था। एक हदीस में आया है कि हुज़़ूर ने फरमाया- जिसने रमज़़ान में किसी रोज़़ेदार को इफ़्तार कराया, तो यह उसके गुनाहों की बख़्शिश का और उसकी गर्दन को आग से छुड़़ाने का ज़रिया होगा और उसको उतना ही सवाब मिलेगा जितना उस रोज़़ेदार का रोज़़ा रखने का सवाल मिलेगा।

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