इस्लाम में हर दिन मदर्स डे है
इस्लाम में हर दिन मदर्स डे है
मदर्स डे, यानी मातृ दिवस, माँ को सम्मान देने और उनके प्रति प्यार और आभार व्यक्त करने का दिन होता है। यह हर साल मई के दूसरे रविवार को मनाया जाता है। इस दिन हम अपनी माँ के अथक समर्पण, त्याग और प्यार को याद करते हैं और उन्हें धन्यवाद देते हैं।
मदर्स डे का इतिहास
मदर्स डे की शुरुआत 1907 में एना जार्विस ने की थी, जिन्होंने अपनी माँ की याद में एक स्मारक सेवा आयोजित की थी। एना की माँ एन रीव्स जार्विस एक शांति कार्यकर्ता थीं, जिन्होंने गृहयुद्ध के दौरान घायल सैनिकों की देखभाल की थी। एना ने अपनी माँ की श्रद्धा और प्यार के चलते इस दिन की शुरुआत की, और आज यह दिन दुनिया भर में माँ को सम्मान देने के रूप में मनाया जाता है।
हालांकि, आजकल पश्चिमी देशों और कई अन्य जगहों पर माँ-बाप को नज़रअंदाज़ किया जाता है और उन्हें ओल्ड एज होम (बुज़ुर्गों के घर) में भेज दिया जाता है। ऐसे में कम से कम एक दिन, जैसे मदर्स डे या फादर्स डे, उन्हें खुश रखने और उनका सम्मान करने का एक मौका बनता है। लेकिन इस्लाम हमें सिखाता है कि हमें माँ-बाप के साथ प्यार और इज़्ज़त का व्यवहार हर दिन करना चाहिए, ना कि सिर्फ एक खास दिन पर।
इस्लाम में माँ का स्थान
क़ुरआन में अल्लाह तआला ने फ़रमाया:
“अल्लाह की इबादत करो और उसके साथ किसी को शरीक मत ठहराओ, और माँ-बाप के साथ अच्छा सुलूक करो।”
(सूरह अन-निसा: 36)
यह आयत बताती है कि माँ-बाप की सेवा और सम्मान करना कितना अहम है। इस्लाम में माँ-बाप का सम्मान करना और उनके साथ अच्छा व्यवहार करना सिर्फ एक अच्छे इंसान बनने का नहीं, बल्कि अल्लाह की رضا (खुशी) का भी रास्ता है।
माँ की अहमियत
एक मशहूर हदीस में किसी शख्स ने रसूलुल्लाह ﷺ से पूछा: “किसके साथ सबसे अच्छा सुलूक करना चाहिए?” आप ﷺ ने तीन बार फ़रमाया: “तुम्हारी माँ” और फिर चौथी बार कहा: “तुम्हारा पिता”। इस हदीस से साफ़ है कि माँ को तीन बार क्यों ज्यादा अहमियत दी गई—क्योंकि वही हैं जिन्होंने हमें 9 महीने अपने पेट में रखा, जिन्होंने रातों की नींद कुर्बान की और हमें हर तकलीफ से बचाया। क्या किसी एक गुलदस्ते या एक दिन के तोहफे से हम इन सभी कुर्बानियों का बदला चुकता कर सकते हैं?
इस्लाम में माँ के लिए हमारी जिम्मेदारियाँ
हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम अपनी माँ की इताअत करें, जब तक कि वह अल्लाह और उसके रसूल के खिलाफ़ न बोलें। हमें हमेशा अच्छे लहजे में उनके साथ पेश आना चाहिए, नरमी और मोहब्बत से। हमें उनकी दुआ करनी चाहिए, अल्लाह से उनकी माफी और रहमत की दुआ माँगनी चाहिए। उन्हें इज़्ज़त देनी चाहिए और कभी-कभी उन्हें तोहफे भी देने चाहिए।
प्रेरणादायक माँएं
इस्लाम में कई ऐसी महिलाएं हैं जिन्होंने माँ के रूप में आदर्श पेश किया। उनकी कहानियाँ हमें अपनी माँ की अहमियत समझाने में मदद करती हैं।
- मरियम (अ.स.), हज़रत ईसा (अ.स.) की माँ:
बीबी मरियम की कहानी क़ुरआन में बताई गई है, जिसमें उनकी ईमानदारी, विनम्रता और अल्लाह पर भरोसा दिखाया गया है। उन्होंने समाज की मुश्किलों के बावजूद ईसा (अ.स.) को बहुत प्यार से पाला और इस्लाम की तालीम दी। - हज़रत मूसा (अ.स.) और हज़रत हारून (अ.स.) की माँ:
जब फिरौन ने बच्चों को मारने का हुक्म दिया, तो हज़रत मूसा (अ.स.) की माँ ने अपने बेटे को टोकरी में डालकर दरिया में छोड़ दिया। उनका यह कदम माँ के अनमोल प्यार और विश्वास को दर्शाता है। - हाज़रा (अ.स.), हज़रत इस्माईल (अ.स.) की माँ:
बीबी हाज़रा ने रेगिस्तान में पानी की तलाश में दौड़कर अल्लाह पर भरोसा किया। उनकी मेहनत और सब्र से ज़मज़म का पानी निकला। उनका संघर्ष और त्याग हमें यह सिखाता है कि जब हम परेशान होते हैं तो हमें सिर्फ अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए।
माँ समाज के निर्माण में अहम भूमिका निभाती हैं। उनका प्यार, देखभाल और तालीम बच्चों को अच्छे इंसान बनाने में मदद करती है। माँ की शिक्षा सिर्फ घर तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समाज में एक सकारात्मक बदलाव लाती है। इसलिए, हमें अपनी माँ की अहमियत समझनी चाहिए और उनके आदर्शों से प्रेरणा लेनी चाहिए। इस्लाम हमें सिखाता है कि माँ के प्रति प्यार और सम्मान हर दिन होना चाहिए, न कि सिर्फ एक खास दिन पर।
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