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दीनी सवाल जवाब……

Jaipur

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सवाल:- अगर किसी इंसान का ज़बर्दस्त एक्सीडेंट हुआ जिसकी वजह से उसके शरीर के हिस्से बिखर गए और डॉक्टर ने प्लास्टिक में पैक करके दिए, तो उसे गु़स्ल कैसे दें और क्या उसकी नमाज़े जनाज़ा पढ़ी जाएगी?

जवाब:- इस सूरत में ग़ुस्ल का तरीक़ा यह होगा कि प्लास्टिक के ऊपर ही पानी बहा दिया जाए, यही ग़ुस्ल माना जाएगा। ऐसी डेड बॉडी की नमाज़े जनाज़ा आ़म जनाज़े की तरह पढ़ी जाएगी और दफ़न करने का तरीक़ा भी वही रहेगा।

सवाल:- मैंने पिछले साल ज़कात नहीं दी थी, अब देनी है तो क्या सोना-चांदी की रक़म पिछले साल की रेट के हिसाब से होगी या मौजूदा रेट के हिसाब से?

जवाब:- पिछले साल की ज़कात पिछले साल के रेट के मुताबिक़ अदा करनी होगी और इस साल की ज़कात इस साल के रेट के मुताबिक़।

सवाल:- एक औरत तीन महीने की प्रेग्नेंट है और रोज़ा रखने से थोड़ी मुश्किल हो रही है तो उसके लिए क्या हुक्म है?

जवाब:- अगर थोड़ी मुश्किल हो रही है तो रोज़ा रखना चाहिए, लेकिन अगर रोज़ा रखने से ज़्यादा परेशानी हो रही हो या डॉक्टर की राय हो कि इससे मां या बच्चे को नुक़सान हो सकता है, तो अभी रोज़ा ना रखने की इजाज़त है अलबत्ता बाद में क़ज़ा करना ज़रूरी होगा।

सवाल:- मेरी किराने की दुकान है और लोगों में मेरा दो लाख बका़या है। लोग पुराना चुका कर फिर से उधार ले लेते हैं। इस सूरत में ज़कात का क्या तरीक़ा होगा?

जवाब:- अगर उधारी ऐसे लोगों पर है जो पैसे वापस करने की हालत में हैं और आ़म तौर पर चुका देते हैं, तो इस रक़म पर ज़कात वाजिब होगी। लेकिन अगर ऐसा क़र्ज़ है जिसके मिलने की उम्मीद बहुत कम हो, तो जब तक वह मिल ना जाए, उस पर ज़कात नहीं। आपने जो सूरत बयान की है, उस पर ज़कात है।

सवाल:- कपड़े पर नापाकी लगी थी, लेकिन यह नहीं पता कि कब लगी, तो इस दौरान जो नमाज़ें पढ़ी गईं, उनका क्या हुक्म है?

जवाब:- अगर किसी को बाद में पता चला कि कपड़े नापाक थे, तो जो नमाज़ें पढ़ी गईं, वो दोबारा पढ़नी होंगी। लेकिन अगर यह यक़ीन ना हो कि नापाकी कब लगी, तो ग़ालिब गुमान पर अ़मल करते हुए उस समय से नमाज़ें लोटाएंगे, जबसे नापाक होने पर दिल जमे।

सवाल:- क्या मोबाइल में क़ुरआन शरीफ़ पढ़ सकते हैं और फ़िर ऐसा मोबाइल लेकर वॉशरूम जाना कैसा?

जवाब:- मोबाइल में क़ुरआन पढ़ना बिल्कुल जायज़ है, क्योंकि यह स्क्रीन पर डिजिटल फॉर्म में होता है और मोबाइल में क़ुरआन पढ़ने से मोबाइल क़ुरआन नहीं बन जाता, इस लिए उसे वॉशरूम ले जाने में भी हर्ज नहीं लेकिन यह ज़रूर एहतमाम करना चाहिए कि ऐसे किसी भी मौक़े पर मोबाइल स्क्रीन पर क़ुरआन की आयतें, या क़ुरआनिक एप्लीकेशन खुली ना हों।

सवाल:- हमारे ससुर का इंतका़ल हो गया है और सास इद्दत में है, उन्हें किन लोगों से पर्दा करना होगा?

जवाब:- इद्दत का पर्दा कोई स्पेशल पर्दा नहीं बल्कि जिन ग़ैर महरमों से आ़म दिनों में पर्दा है, उन्हीं से इद्दत में भी पर्दा है और इसी लिए बेटों, पोते-नातियों और सगे भतीजे-भांजों से पर्दा करने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि वो महरम होते हैं।

सवाल:- रोज़े की हालत में ज़ुबान से फ़ोन की बैटरी का करंट चेक करना कैसा है?

जवाब:- अगर कोई व्यक्ति ज़ुबान से बैटरी का करंट चेक करे और उसका कोई अंश पेट में चला जाए, तो रोज़ा टूट सकता है लेकिन चूंकि आ़म तौर पर ऐसा नहीं होता इस लिए इसमें हर्ज नहीं मगर हेल्थ के एंगल से अगर ठीक नहीं तो शरीअ़त भी इससे बचने का हुक्म देती है।

सवाल:- क्या उतारे हुए कपड़ों पर जिन्न या ख़बीस का साया हो सकता है? इससे बचने का क्या तरीका है?

जवाब:- इस्लामी तालीमात के मुताबिक़, ऐसा कुछ नहीं होता, ये ग़लत फ़हमियां हैं।

सवाल:- फ़तवा और बयान क्या होता है और फ़तवा कौन दे सकता है?

जवाब:- फ़तवा इस्लामी का़नून यानी शरीअ़त के अनुसार किसी मसले का विश्लेषण या विशेष उत्तर होता है, जो योग्य मुफ्ती दे सकता है जबकि बयान आ़म धार्मिक जानकारी होती है। फ़तवा केवल वही व्यक्ति दे सकता है, जो इस्लामी फिक़्ह, हदीस, क़ुरआन और उसकी तफ़सीर में योग्य हो और उसे किसी प्रतिष्ठित इदारे से उसकी इजाज़त प्राप्त हो।

सवाल:- क्या रोज़े की हालत में बालों में अंडा या ऐलोवेरा लगाया जा सकता है?

जवाब:- हां, रोज़े की हालत में सिर पर अंडा या ऐलोवेरा लगाने में कोई हर्ज नहीं।

सवाल:- सेहरी के बाद ब्रश करने से हल्का ठंडा एहसास और हल्का स्वाद 15-20 मिनट तक रहता है, क्या ऐसे में रोज़ा हो जाएगा?

जवाब:- कोई दिक्कत नहीं।

सवाल:- अगर किसी पर क़र्ज़ हो, तो क्या वह क़र्ज़ चुकाने के लिए ज़कात ले सकता है?

जवाब:- हां, अगर वह ज़कात का हक़दार है यानी उसकी मालियत निसाब से कम है और उसके पास कोई दूसरा ज़रिया भी नहीं, तो वह ज़कात ले सकता है और क़र्ज़ चुकाने में इस्तेमाल कर सकता है।

सवाल:- रमज़ान में अगर वित्र की नमाज़ पहले पढ़ ली तो क्या तरावीह हो सकती है?

जवाब:- हाँ, अगर किसी ने वित्र की नमाज़ पहले पढ़ ली है, तो वह बाद में तरावीह की नमाज़ पढ़ सकता है। लेकिन सुन्नत तरीक़ा बहर हाल यही है कि तरावीह पहले पढ़ी जाए और वित्र बाद में।

सवाल:- मुक़ीम इमाम के होते हुए मुसाफ़िर इमाम के पीछे जमाअ़त का क्या हुक्म है?

जवाब:- अगर कोई मुकी़म यानी स्थायी निवासी इमाम मौजूद है, तो उसे ही इमामत करनी चाहिए। लेकिन अगर कोई मुसाफ़िर इमाम बन जाए, तब भी मुकी़म लोग उसकी इत्तेबा कर सकते हैं और उसका तरीक़ा यह रहेगा कि मुसाफ़िर इमाम चार रकअ़त वाली नमाज़ों को दो रकअ़त पढ़ाएगा, मुकी़म अपनी बाक़ी की दो रकअ़तें खु़द पूरी करेंगे।

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