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दलितों की भलाई के लिए दलित संगठन एक हों

जयपुर

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दलित समाज में जन्मे अधिकांश लोग आज भी दलित ही हैं। इनमें से जो थोड़े-बहुत पढ़-लिख गए हैं, वे अपनी-अपनी नौकरियों और घर-परिवार के साथ व्यस्त हैं और इनमें से नगण्य लोग, जो थोड़ा समाज के लिए सोचते हैं, आज दिग्भ्रमित हैं कि आखिर वे कहाँ जाएं? क्योंकि ये जिनके साथ जुड़े, उसी ने इनका विश्वास तोड़ दिया है और आज इनकी हालत ऐसी हो गई है कि किसी भी दलित संगठन पर ये विश्वास नहीं करते।

दलित लोग अव्वल तो ऐसे संगठनों से जुड़ते ही नहीं हैं जो दलितों के लिए काम करें। ये जुड़ेंगे ऐसे संगठनों से जो इनके समय, शक्ति, श्रम और धन का प्रयोग इनके ही खिलाफ करेंगे, आरक्षण के विरुद्ध करेंगे। दलित तबका आज भी ऐसे संगठनों की संजीवनी बना हुआ है। फिर भी अगर कोई दलित, दलित हितैषी विचारधारा के संगठन से जुड़ भी जाता है तो दो-तीन साल में संगठन की सच्चाई (मसलन संगठन में एक व्यक्ति विशेष का दबदबा होना, मानवतावादी अथवा अंबेडकरवादी न होकर किसी जाति विशेष की विचारधारा का होना, कथनी-करनी में अंतर होना, अध्यक्ष, मंत्री व कोषाध्यक्ष में खींचतान रहना, समय पर कभी भी चुनाव या मीटिंगें न होना आदि) उसके सामने आने लग जाती है और वह धीरे-धीरे इन्हें किनारा करने लगता है। इसके बाद वह जातिवादी संगठनों से जुड़ने लगता है। वहां भी उसे कुछ इसी तरह का माहौल मिलता है। अंत में वह घूम-फिरकर जुड़ता है ऐसे संगठनों से, जो उसके समय, शक्ति, श्रम और धन का जमा कर ‘उपयोग’ करते हैं और अगर वह मन से दृढ़ हुआ (कि चाहे किसी भी संगठन में न रहूं, लेकिन दलित विरोधी संगठनों में तो नहीं रहूंगा) तो वह निष्क्रिय होकर घर कहीं काम-काज में और अपनी रोजी-रोटी में रमने लगता है। बाबासाहेब के संदेश – शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो – का वास्तविक अर्थ कोई और समझे या न समझे, पर दलित संगठन तो नहीं समझ पा रहे हैं। आज हालात यह है कि जो व्यक्ति थोड़ा सा भी प्रसिद्ध हो गया, वही अपना अलग संगठन लेकर बैठ गया या उसने संगठन के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। चूंकि संगठन व्यक्तियों से बनते हैं और व्यक्तियों के कार्य ही संगठन को चलाए रखने या बंद हो जाने पर मजबूर करते हैं। अतः व्यक्तियों के कारनामों से संगठन बदनाम होने लगते हैं और फिर कोई इनसे नहीं जुड़ता है। ये सक्रिय और ऊर्जावान संगठनों के बजाय जैबी (पॉकेट में रखने वाले) संगठन बन जाते हैं जो एक व्यक्ति विशेष के इशारों पर कार्य करते रहते हैं।

सारी जिंदगी पानी पी-पीकर दलित विरोधियों को गाली देने वाले लोगों के सामने जब लालचकाचोटा-सा टुकड़ा फेंका जाता है तो वे उन्हीं के साथ हो जाते हैं। जो लोग बड़ी-बड़ी बातें करते थे कि पावर में आने पर समस्याएं दूर कर देंगे, आपकी जिंदगी अच्छी हो जाएगी, अफसोस! वे दलितों और दलित विरोधियों के सहयोग से जीतने पर दलितों को ही भुला बैठे, दलितों को उन्होंने दूध में गिरी मक्खी की भांति निकाल कर फेंक दिया। इनके मापदंड बदल गए और दलित ठगे गए। क्रिया की प्रतिक्रिया होनी ही थी। दलितों ने भी तुरन्त इन्हें जमीन दिखा दी।

ऐसी बात नहीं है कि आज दलितों को किसी संगठन की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है और बहुत अधिक आवश्यकता है, परंतु संगठन ऐसा हो जो दलितों की भलाई की विचारधारा से दूर न हो, पदाधिकारी भ्रष्ट न हों, जैसे संगठन के संविधान में वर्णित हों, वे नियम और शर्तें पालन करते हों और जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले हों, कागजी घोड़े दौड़ाने वाले नहीं हों। धन की व्यवस्था करना बड़ी बात नहीं है, क्योंकि जब संगठन में पारदर्शिता होगी, जमीनी स्तर पर कार्य होगा और लोगों के हितों के लिए लड़ाई लड़ेगा, तो जो धन दलितों के हाथ से उनके ही विरोधी संगठनों के पालन-पोषण में जाता है, वही धन डायवर्ट होकर दलित हितैषी संगठनों में भी आ सकता है।

आज संक्रमण के इस काल में यह आवश्यक है कि दलितों को यदि प्रगति करनी है तो वे संगठित हों, क्योंकि एकता व जागरुकता न होने की वजह से दलितों से कई हक छीने जा रहे हैं। नौकरियां कम होती जा रही हैं, खुद के काम-धंधे की शुरुआत करने के लिए आवश्यक पूंजी का अभाव है और जमीनों के भाव में सब जगह आग लगी हुई है। फिर बिजनेस जमाना इतना आसान नहीं है। एक पूरी पीढ़ी तो जमाने में ही खप जाती है।

क्या दलित समाज में सभी दलितों को एक साथ लेकर चलने वाला संगठन तैयार हो सकता है? यह अतिकल्पनीय सोच हो सकती है, परंतु जरासोचकर देखें, जब तक इस प्रकार का संगठन नहीं होगा, दलित समाज आगे कैसे बढ़ पाएगा? इसी प्रकार का एक संगठन लगभग सौ साल पहले शुरू हुआ था और आज देश पर राज कर रहा है।

श्यामसुन्दर बैरवा

 

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