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बाबा साहेब के मिशन को भटकाव से बचाने की आवश्यकता है

Jaipur

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प्रतिवर्ष की भाँति, इस वर्ष भी 14 अप्रैल को बाबा साहेब की जयंती बड़े धूमधाम से मनाई गई। बड़े-बड़े कार्यक्रम आयोजित किए गए। दरअसल, ज्यों-ज्यों समय बीतता जा रहा है, दलित समाज में चेतना आती जा रही है और यह समाज अपने वोटों के बारे में सोचने-समझने लगा है, जिससे सभी राजनीतिक पार्टियों में खलबली मची हुई है। यह समाज सबसे विशाल समाज है और जिस तरफ इसका झुकाव होगा, उसे सरताज होने से कोई नहीं रोक सकता। कारण यह है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों के इस समुदाय की कुल जनसंख्या देश की 85 प्रतिशत जनसंख्या बनाती है। बाबा साहेब को हर राजनीतिक पार्टी अपने अनुसार ढालती रही है। कांग्रेस कहती है कि उसने बाबा साहेब को मंत्री बनाया। यह सही बात है, लेकिन यह कांग्रेस की मजबूरी थी। बाबा साहेब के व्यक्तित्व को नकारना जीती मक्खी निगलने के समान था। बाबा साहेब कांग्रेस के साथ थे, लेकिन उनकी अपनी पार्टी ‘ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन’ थी, न कि कांग्रेस। वास्तव में देखा जाए तो बाबा साहेब के विरोधी न तो कांग्रेसी थे और न ही आज की भाजपा है, लेकिन कट्टर और सनातनी हिंदू उस समय भी बाबा साहेब के विरोधी थे और आज भी हैं। उस समय कांग्रेस में कट्टर हिंदुओं की भरमार थी, अतः समझा यह जाता है कि कांग्रेस बाबा साहेब की विरोधी थी। प्रमाणिक इतिहास में ऐसा कोई प्रसंग नहीं मिलता जब हिंदू महासभा, भारतीय जनसंघ, आरएसएस या किसी अन्य हिंदू संगठन ने बाबा साहेब के ज़ख्मों पर मरहम लगाया हो, जो हिंदू समाज ने ही उनको दिए थे। कट्टर हिंदू समाज में किसी भी प्रकार के बदलाव नहीं चाहते थे और न ही दलित समाज के लोगों को किसी प्रकार के हक-हकूक और समानता देना चाहते थे। तभी तो सामाजिक समानता के स्थान पर ‘सामाजिक समरसता’ शब्द आजकल प्रयोग में लाया जाता है, जिसका अर्थ समाज में बंधुत्व, प्रेम और सौहार्द; सामाजिक ताने-बाने का बने रहना है, समानता का होना नहीं। जिस धर्म में आज भी कुछ जातियों के लोगों को अपने ही धर्म के लोगों का घोड़ी पर बैठना, ऊँची मूँछें रखना और एक मटके से पानी पीना पसंद नहीं और इस बात पर मारपीट और हत्या तक हो जाती है, उस धर्म में कैसी समानता? समानता और समरसता में इस अंतर को कई दलित महानुभाव भी नहीं समझ पा रहे हैं।

बाबा साहेब का मान-सम्मान न केवल दलित समाज के लोगों को, बल्कि सभी को करना चाहिए। लोग इस प्रक्रिया में मूर्तियाँ/तस्वीरें बनवाते हैं, उन पर फूल मालाएँ चढ़ाते हैं, तिलक लगाते हैं और कई अति उत्साही लोग दुग्धाभिषेक भी करते हैं। और भी कई प्रकार के पाखंड किए जाते हैं। लेकिन बाबा साहेब का साहित्य पढ़ते हैं तो वहाँ इस प्रकार के उपक्रमों का कोई स्थान नहीं है। गांधी, रानाडे और जिन्ना की भूमिका (बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय प्रथम खंड) में बाबा साहेब ने साफ लिखा है कि मैं मूर्तियों को लगाने के पक्ष में नहीं हूँ, बल्कि मैं तो मूर्तिभंजक हूँ। (यह बात नेताओं की मूर्तियों के संदर्भ में कही गई है।)

अपने पचासवें जन्मदिवस पर उन्होंने कहा था, मनुष्य को ईश्वर के समान मानना विनाश का मार्ग है। इससे नेता के साथ उसके भक्तों का भी अधःपतन होता है। जब कोई समाज किसी व्यक्ति को ईश्वर का स्थान देने का प्रयास करता है तो वह आत्मनाश के मार्ग पर बढ़ने लगता है।”

इसी प्रकार पुणे में ‘अंबेडकर स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स’ के उद्घाटन के समय, 30 अक्टूबर 1945 को बाबा साहेब ने कहा था— मेरे विचारों की संस्था मत बनाइए, क्योंकि जो समाज या संस्था समय के अनुसार अपने विचारों को बदलने को तैयार नहीं हो, तो वह इस प्रतियोगी जीवन-संघर्ष में टिक नहीं पाएगी। यदि आपको यह विश्वास हो जाए कि मेरा पक्ष सही है, तभी मेरे विचार स्वीकार करने चाहिए।”

इतना स्पष्ट कहने के बावजूद आज हर कोई उनके नाम की संस्थाएँ खोले बैठा है, उन्हें ईश्वर, भगवान, मसीहा, अवतार और न जाने क्या-क्या बनाने पर तुला हुआ है। इसमें बाबा साहेब के अनुयायी भी शामिल हैं और राजनीतिक पार्टियों के लोग भी।

अभी ‘अंबेडकर विकास परिषद’ की ओर से उनके जन्मदिन को ‘समानता एवं सनातन गौरव दिवस’ के रूप में मनाया गया, जिसे राजस्थान पत्रिका नामक अखबार ने ‘अवतरण दिवस’ के नाम से छापा, जो कि बाबा साहेब को आडंबर से जोड़ना और देवी-देवताओं की श्रेणी में रखना है।

यह कहना गलत न होगा कि इन सबका बाबा साहेब, उनके विचारों और उनके कार्यों से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि इन सबकी नजर उनके अनुयायियों के वोटों पर है। इस वोट बैंक पर पहले कांग्रेस का कब्जा था, बाद में इसे बहुजन समाज पार्टी ने खूब भुनाया और अब अन्य पार्टियाँ वही कार्य कर रही हैं।

किसी भी व्यक्ति के विचारों का समाप्त होना ही उसकी वास्तविक मृत्यु होती है। श्री हरिशंकर परसाई के कालजयी लेख पाप के चार हथियार” के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति को समाप्त करना हो, तो उसके विरोधी सर्वप्रथम उसकी निंदा करते हैं। वह इससे विचलित नहीं होता तो उसकी उपेक्षा करते हैं। लेकिन उस व्यक्ति पर इनका कोई असर नहीं पड़ता और वह जोर-शोर से अपने कार्य में लगा रहता है, तब विरोधी उसकी हत्या कर देते हैं। लेकिन यह हत्या अग्नि में घी का कार्य करती है और उसके उत्तराधिकारी तथा अनुयायी और अधिक जोर-शोर से उसके कार्य को करने लग जाते हैं। तब विरोधी अपना अंतिम हथियार फेंकता है जो उक्त तीनों हथियारों से अधिक खतरनाक है। वह हैश्रद्धा का हथियार। विरोधी अब यह प्रचार-प्रसार करने लग जाते हैं कि वे तो महापुरुष थे, हम तो उनके सामने रत्ती भर भी नहीं हैं। हम उनकी क्या बराबरी करेंगे? और फिर महापुरुष की मूर्तियाँ बनने लगती हैं, चौराहों पर लगने लगती हैं, फूल-मालाओं से उनको लाद दिया जाता है, धूप-अगरबत्ती लगाई जाती है, तिलक लगाया जाता है, दुग्धाभिषेक किया जाता है, लेकिन उनके विचारों को कोई नहीं मानता। यही उस व्यक्ति की वास्तविक हत्या हो जाती है।”

बाबा साहेब की निंदा और उपेक्षा तो उनके समय में खूब हुई, लेकिन वे इनसे अपने रास्ते से नहीं हटे। उनके देहांत के बाद जैसा जिसने चाहा, उनके विचारों को तोड़ा-मरोड़ा और पेश किया। उसी का परिणाम है कि आज वही सब कार्य किए जा रहे हैं, जिनके लिए स्वयं उन्होंने मना किया था।

कालाराम मंदिर में प्रवेश के लिए बाबा साहेब ने लंबा संघर्ष किया, और जब सफल हुए तब उनके उद्गार थे कि मंदिर प्रवेश दलितों का कोई अंतिम लक्ष्य नहीं है। वह तो सामाजिक समानता की दिशा में एक संघर्ष था। अर्थात् यदि हम भी हिंदू हैं तो हमें भी मंदिर में प्रवेश का अधिकार है, यही मंदिर प्रवेश अभियान का मूलमंत्र था।

आज बाबा साहेब के प्रति उनके तत्कालीन विरोधियों का श्रद्धा का जो सैलाब है, उसका कारण यही है कि ये बाबा साहेब के अनुयायियों के वोट लेकर अपना राज कायम रखना चाहते हैं। जो लोग बाबा साहेब को ‘हिंदुत्व’ ढालना चाहते हैं, उनको बाबा साहेब का साहित्य अवश्य पढ़ना चाहिए।

हाल ही में भाजपा ने संविधान निर्माता-भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्मान अभियान नामक एक पुस्तिका निकाली है। इसमें दो भाग हैं। प्रसंगवश पहले भाग पर चर्चा करना उचित होगा।

प्रथम भाग का सार-संक्षेप यह है कि कांग्रेस ने किस प्रकार पग-पग पर बाबा साहेब को हराया, उन्हें नज़रअंदाज़ किया और मृत्यु के बाद भी उन्हें वो सम्मान नहीं दिया, जिसके वे हकदार थे।” इसमें जो-जो उदाहरण और घटनाएँ दी गई हैं, उनमें से कुछ तो प्रमाणिक पुस्तकों में मिल जाती हैं, लेकिन कुछ नहीं। मसलन, बाबा साहेब के पार्थिव शरीर को ले जाने के लिए कोई सरकारी विमान उपलब्ध नहीं कराया गया और विमान का बिल भी डॉ. अंबेडकर की शोकाकुल पत्नी को भेजा गया,” इस घटना का विवरण कहीं नहीं मिलता है।

इसी पुस्तिका में भाजपा द्वारा बाबा साहेब के सम्मान में क्या-क्या किया गया, कहाँ-कहाँ मूर्तियाँ लगवाई गईं, पार्क बनवाए गए, जहाँ-जहाँ वे रहे, उन स्थानों पर क्या किया गया, इस पर चर्चा की गई है। इन सब घटनाओं को देने का उद्देश्य यही है कि कांग्रेस द्वारा बाबा साहेब के प्रति किए गए कृत्यों को जनता के समक्ष लाया जाए, जिससे जनता, खास तौर पर दलित समाज को हकीकत पता चले और वह कांग्रेस से विमुख होकर भाजपा के पक्ष में हो जाए।

इसमें कुछ जानकारियाँ तो इतनी हास्यास्पद हैं कि तरस आता है कि लेखक ने उन्हें लिखा कैसे? जैसे—भीम ऐप जिसका पूरा नाम Bharat Interface for Money होता है, जिसके पहले अक्षरों को जोड़ने से BHIM बनता है, उसका बाबा साहेब से क्या संबंध है, यह समझ में नहीं आता।

यह एक बहुत बड़ा संयोग था, जो दलित समाज के पक्ष में रहा, कि अपनी मृत्यु के मात्र 53 दिन पहले ही बाबा साहेब ने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था, अन्यथा भाजपा और आरएसएस उनको कब का कट्टर हिंदू घोषित कर चुकी होतीं। आज भाजपा और आरएसएस उनको भगवा रंग में रंगने के लिए उनका इतिहास खोद रही है, लेकिन जो जगजाहिर घटनाएँ (बाल्यकाल में गाड़ी से उतारना, नाई द्वारा बाल नहीं काटना, स्कूल में अलग से बैठाना, प्यास लगने पर अन्य व्यक्ति द्वारा बाँस की नली से पानी पिलाना, बड़ौदा, गुजरात में होटल में कमरा नहीं देना, हिंदुवादियों द्वारा बड़ौदा में ही सैन्य सचिव जैसे महत्वपूर्ण पद पर होने के बावजूद पानी की अलग से मटकी रखना, महाड़ का चावदार तालाब सत्याग्रह) हैं, उन पर मौन है, कभी कोई माफी नहीं माँगी गई है।

उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथों, भारत में जातिप्रथा एवं जातिप्रथा का उन्मूलन, हिंदुत्व दर्शन, हिंदुत्व और साम्यवाद, हिंदुत्व के प्रतीक, क्रांति तथा प्रतिक्रांति, हिंदुत्व की पहेलियाँ, अस्पृश्य होने का अर्थ, दलित उत्पीड़नः समस्या की जड़ें, अस्पृश्यों के रास्तों की जड़ें, अस्पृश्य एवं अस्पृश्यता, शूद्र कौन थे?, अछूतः वे कौन थे और अछूत कैसे हो गए? और समय-समय पर दिए गए भाषणों में हिंदू धर्म की जो सटीक आलोचना की है, वह सब छिपा दी गई है। कट्टर हिंदू आज भी मनु को भगवान और उसी की लिखी मनुस्मृति को आदर्श दंड संहिता मानते हैं, जिसकी बाबा साहेब ने 25 दिसंबर 1927 को होली जलाई थी।

आज बाबा साहेब के प्रति श्रद्धा” प्रकट करने के लिए भाजपा वही सब कर रही है, जिसके लिए बाबा साहेब ने मना किया था। बाबा साहेब कभी तीर्थ यात्रा पर नहीं गए, लेकिन उनसे जुड़े पाँच प्रमुख स्थानों को भाजपा ने पंचतीर्थ के रूप में विकसित किया है।

अंत में, बाबा साहेब के विचारों का पढ़ना, समझना और उन पर अमल करना, वंचितों, ग़रीबों की शिक्षा की उचित व्यवस्था करना, पाखंड, आडंबर, दिखावे आदि से दूर रहना ही उनको सच्ची श्रद्धांजलि देना होगा। उनकी मूर्तियाँ बनवाना, उन पर फूल मालाएँ चढ़ाना, धूपबत्ती करना, तिलक लगाना, संविधान पार्क बनवाना, तीर्थ स्थल बनाना केवल नासमझों का ध्यान भटकाने और बाबा साहेब के मिशन को भी पथ से भटकाने जैसा है।

डॉ. श्याम सुंदर बैरवा

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