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अल-तिर्मिज़ी र.अ.

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अल-तिर्मिज़ी र.अ.

इस्लामी दुनियां में हदीस का महत्वपूर्ण स्थान है। अल-तिर्मिज़ी का दर्जा हदीस की छह प्रामाणिक पुस्तकों में से एक है। इसे हदीस की छह सबसे प्रामाणिक पुस्तकों में से पाँचवाँ स्थान दिया गया है। सबसे पसंदीदा राय के अनुसार, अल-बुखारी को सर्वोच्च दर्जा प्राप्त है, उसके बाद क्रमशः मुस्लिम, अबू दाऊद, नसाई, तिर्मिज़ी और इब्न माजा का स्थान है। तिर्मिज़ी नाम अरबी मूल का है और यह उज्बेकिस्तान के तिर्मिज़ शहर से लिया गया है, जो इस्लामी शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र था, विशेष रूप से हदीस (पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहिवसल्लम की बातें) के क्षेत्र में।

इमाम तिरमिज़ी रअ का नाम मोहम्मद था उन्हें इन नामों से भी जाना जाता है :-  अबू ईसा मुहम्मद इब्न मूसा अल-सुलामी अद-दरीर अल-बूगी। अल-तिर्मिज़ी रअ का जन्म अब्बासिद ख़लीफ़ा अल-मामून के शासनकाल में  209 हिजरी  में  तिर्मिज़ के बुघ गाँव के इलाके में हुआ था, अब यह स्थान दक्षिणी उजबेकिस्तान में है। तिरमिजी रअ बानू सुलेयम जनजाति से थे; इसलिए उन्हें अल-सुलामी ,अल-बुगी, अल-तिर्मिज़ी भी कहा जाता है। यह भी कहा जाता है कि उनका नाम मुहम्मद इब्न ईसा इब्न यज़ीद इब्न सावरा इब्न अल-सकन था।अल-तिर्मिज़ी रअ के चाचा प्रसिद्ध सूफ़ी अबू बक्र अल-वर्राक थे। अल तिरमिजी का लकब “अद-दरीर” (“द ब्लाइंड”)  भी है। यह कहा जाता है कि तिरमिजी बाद में अपने जीवन में बहुत पढ़ाई और रोने की वजह से अंधे हो गये थे। उनके दादा मूल रूप से तुर्कमेनिस्तान के मारव ( मर्व) से थे, लेकिन बाद में बुघ, तिर्मिज़ चले गए थे।

अल-तिर्मिज़ी रअ ने शुरुआती तालीम मकामी तौर पर हासिल कर ने के बाद 20 साल की उम्र में हदीस का अध्ययन शुरू किया क्योंकि इमाम तिरमिज़ी को स्वाभाविक रूप से पैगंबर (सल्लल्लाहो अलैहिवसल्लम) की सुन्नत से प्यार हो गया और उन्होंने अपना जीवन हदीस सीखने के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने हदीस इकट्ठा करने और हदीस की तालीम के लिए  खुरासान , इराक, मक्का , मदीना,हिजाज़,शाम, बगदाद , मिस्र ,कूफा की  यात्राएं की और इल्मे दीन हासिल किया। उन्होंने 200 से अधिक हदीस लेखकों से हदीस ली थी, उन्होंने इमाम अल-बुखारी और इमाम मुस्लिम दोनों के कुछ शिक्षकों से भी हदीस ली ,उन्होने हदीस का ही ज्ञान नहीं लिया बल्कि  वह एक विश्वकोष विद्वान थे। वह ज्ञान की अन्य शाखाओं, जैसे फ़िक़्ह, इस्लामी इतिहास, अरबी भाषा और अन्य विज्ञानों में पारंगत थे। वह हदीसों से फ़िक़्ह के नियमों की अपनी उत्कृष्ट समझ और निष्कर्ष के लिए प्रसिद्ध थे। इमाम तिरमिज़ी की याददाश्त एसी थी कि एक बार सुन लेने के बाद वह उसे भूलते नहीं थे।एक दिलचस्प वाकया है कि इमाम तिरमिज़ी एक खली परचे के साथ हदीसें सुना रहे थे आलिम ने देखा की कागज़ खाली है, इस पर आलिम नाराज़ हो गए उन आलिम की दो हदीसों की लिखी दो किताबें थीं, इमाम तिरमिज़ी रअ ने कहा आप नाराज़ ना हो आपकी हदीसें याद हैं और दो किताबों में संकलित हदीसें सुना दी तब वो आलिम तिरमिज़ी रअ की असाधारण याददाश्त के ऐसे प्रदर्शन से हैरान रह गए। इमाम बुखारी ने इमाम तिरमिज़ी के बारे में एक बार कहा था कि, “तुमने मुझसे जितना लाभ उठाया है, उससे कहीं ज़्यादा लाभ मुझे मिला है”। तिरमिज़ी रअ ने जिन प्रसिद्ध शिक्षकों से दीनी और दिगर तालीम हासिल की उनमें  शामिल थे:

1 – इब्राहीम इब्न इस्माइल इब्न याहिया

2 – अबू इसहाक अल-तबारी

3 – इब्राहिम इब्न हातिम अल-हरावी

4 – इब्राहिम इब्न हारुन अल-बल्खी

5 – इब्राहिम इब्न याक़ूब अल-जौजाजानी

6 – मुहम्मद इब्न बशर इब्न बिंदर

7 – मुहम्मद इब्न अल-मुथन्ना

8 – कुतैबह इब्न सईद अल-बघलानी

9 – अली इब्न हजर अल-मीरवाज़ी

10 – मुहम्मद इब्न इस्माइल अल-बुखारी

11 – मुस्लिम इब्न अल-हज्जाज अल-नायसबुरी

12 – अहमद इब्न मणि अल-बघावी

13 – महमूद इब्न घायलन अल-मीरवाज़ी

14 – अब्दुल्ला इब्न अब्दुर-रहमान अल-दारिमी

15 – इसहाक इब्न रहवीह

 

अल-तिर्मिज़ी रअ के शागिर्दो में से कुछ मशहूर शागिर्द यह रहें थे।

1 – अबू अल-अब्बास मुहम्मद इब्न अहमद अल-महबूबी अल-मीरवाज़ी

2 – अबू सईद अशशि

3 – अबू धर मुहम्मद इब्न इब्राहिम

4 – अबू मुहम्मद अल-हसन अल-क़त्तान

5 – अबू हामिद अहमद इब्न अब्दुल्ला अल-मीरवाज़ी

6 – अबू बक्र अहमद इब्न आमेर अल-समरकंदी

7 – अहमद इब्न यूसुफ़ अल-नसाफ़ी

8 – अल-हसन इब्न यूसुफ अल-फ़राबरी

9 – अर-रबी इब्न हय्यान अल-बहिली

 

अल-तिर्मिज़ी रअ ने निम्नलिखित पुस्तकों की रचनाएं भी की हैं:-

1 – अल-जामी अल-मुख्तासर मिन अस-सुनन एन रसूलिल्लाह, जिसे “जामी अल-तिर्मिज़ी” के नाम से जाना जाता है

2 – अल-इलल अल-सुग़रा- अल-ज़ुहद

3 – अल-इलल अल-कुबरा

4 – अश-शमैल अन-नबवियाह वा अल-फा-दैल अल-मुस्तफावियाह

5 – अल-अस्मा वा अल-कुना- किताब अल-तारीख

ज्ञान प्राप्ति, हदीसों को बयान करने के लिए यात्रा करने और हदीस को पढ़ाने और समझाने से भरे जीवन के बाद, इमाम अल-तिर्मिज़ी रअ का निधन 13 रजब, 279 हिजरी ,सोमवार को बुघ (उनके गृहनगर तिर्मिज़ में एक गांव है) में 68 वर्ष की आयु में हो गया ।इस उम्मत के लिए इमाम तिर्मिज़ी रअ का योगदान अतुलनीय है और ज्ञान के छात्र हमेशा इस्लाम के इस दिग्गज के ऋणी रहेंगे।

संकलनकर्ता

फजलुर्रेह्मान

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