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सबसे मुश्किल इबादत

Jaipur

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आज मैं आपसे सबसे मुश्किल इबादत का ज़िक्र करने जा रहा हूँ, जिसे आज के ज़माने में ज़्यादातर लोगों ने छोड़ दिया है। और वो है दुआ।  दुआ से मेरा मतलब वो छोटी दुआ नहीं है जो खाने से पहले या बाद में पढ़ी जाती है। मैं बात कर रहा हूँ उस दुआ की, जब इंसान अल्लाह के सामने हाथ उठाकर, आँखों में आँसू भरकर, दिल में एक उम्मीद लेकर माँगता है।  आज लोग इस इबादत को भूल चुके हैं। जो लोग नमाज़ पढ़ते भी हैं, वो मस्जिद जाते हैं, नमाज़ अदा करते हैं और जब इमाम साहब दुआ कराते हैं तो बस वही दुआ कर लेते हैं और चले आते हैं।  जबकि अल्लाह तआला वो ज़ात है जो माँगने पर राज़ी होता है और न माँगने वालों से नाराज़ होता है।

हमें ये कैसे पता चलता है? जैसे कि अल्लाह कुरआन में फ़रमाता है:

“और तुम्हारे रब ने फ़रमाया: मुझसे दुआ करो, मैं तुम्हारी दुआ क़बूल करूँगा। और जो लोग मेरी इबादत से घमंड करते हैं, वो ज़लील होकर जहन्नुम में दाख़िल होंगे।” (सूरह ग़ाफ़िर 40:60)

अल्लाह हमें प्यार से भी समझा रहा है और चेतावनी भी दे रहा है, लेकिन इसके बावजूद हम दुआ नहीं करते और फिर कहते हैं कि हम परेशान क्यों हैं।

मैं आपको बताता हूँ दुआ की क़बूलियत के तीन तरीके:

1 पहला – जो माँगा वही मिल गया।

2 दूसरा – उस दुआ के बदले कोई मुसीबत टाल दी गई।

3 तीसरा – उस दुआ को सँभाल कर रख दिया गया और क़यामत के दिन उसे आमाल के साथ तौला जाएगा।

जैसा कि एक हदीस में आता है:

“क़यामत के दिन बंदा अपने रब के पास ऐसी दुआएँ देखेगा जो दुनिया में क़बूल नहीं हुई थीं, तो अल्लाह उसके बदले उसे अज्र देगा। उस वक़्त बंदा कहेगा, काश दुनिया में मेरी कोई भी दुआ क़बूल न होती।”

हज़रत उमर (रज़ि.) फ़रमाते हैं:

“मुझे इससे मतलब नहीं कि मेरी दुआ क़बूल हो रही है या नहीं। मुझे तो इस बात की ख़ुशी है कि मुझे दुआ माँगने की तौफ़ीक़ मिल रही है या नहीं।”

इसलिए अल्लाह की रहमत से कभी मायूस मत हो और ज़्यादा से ज़्यादा दुआ करो।

(मुहम्मद सोहैल)

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