क्या आप अपने हर एक बोल का हिसाब देने के लिए तैयार है ?
“वह ज़बान से कोई बात नहीं निकालता मगर यह कि एक निगरान फ़रिश्ता उसके पास तैयार बैठा होता है।” (सूरह क़ाफ़: 18)
इस आयत में अल्लाह तआला ने साफ़ कर दिया कि हम जब भी कोई बात करते हैं, तो एक फ़रिश्ता उसे लिख लेता है। यानी हमारी हर बात अल्लाह के पास हमारे नामे-आमाल में महफ़ूज़ हो जाती है।
इसलिए हमें जब भी बोलना हो तो ख़ैर की बात, अच्छी बात और ऐसी बात बोलनी चाहिए जिस पर हमें सवाब मिले, वरना चुप रहना ही बेहतर है।
आख़िरी पैग़म्बर की नसीहत
इसी वजह से आख़िरी पैग़म्बर ने फ़रमाया कि ज़बान को काबू में रखो।
हज़रत उक़बा बिन आमिर रज़ि. फ़रमाते हैं:
मैंने आख़िरी पैग़म्बर से अर्ज़ किया:
“मुझे बताइए कि दुनिया और आख़िरत में नजात (छुटकारा) का ज़रिया क्या है?”
तो आख़िरी पैग़म्बर ने फ़रमाया:
1.अपनी ज़बान को काबू में रखो।
2.तुम्हारा घर तुम्हें काफ़ी हो (यानी फ़िज़ूल इधर-उधर न घूमो, ज़रूरत के बग़ैर घर से बाहर न रहो)।
3.अपने गुनाहों पर रोया करो (तौबा और इस्तिग़फ़ार करते रहो)।
पहली नसीहत: ज़बान पर काबू
आख़िरी पैग़म्बर ने नजात का सबसे पहला ज़रिया बताया – ज़बान को काबू में रखना।
यानी अपनी ज़बान को ऐसी बातों से पाक रखो जिनमें कोई भलाई और फ़ायदा न हो।
- फ़िज़ूल बातें
- झूठ, ग़ीबत, चुग़ली
- दिल दुखाने वाली बातें
- बेकार की बहस
इन सब से ज़बान को बचाओ, क्योंकि ये चीज़ें इंसान को हलाकत में डाल देती हैं।
इंसानी अंगों में से ज़बान को बहुत अहमियत हासिल है। उलमा ने इसे दो धार वाली तलवार क़रार दिया है – यह हक़ (सच) में भी चलती है और बातिल (झूठ और बुराई) में भी। इंसान की ज़बान ज़िंदा लोगों पर भी चलती है और कभी-कभी मरे हुए लोगों को भी नहीं छोड़ती।
इसलिए इंसान जो भी अपनी ज़बान से बोले, सोच-समझ कर बोले। साथ ही अपनी हर बात के बारे में यह सोचता रहे कि मैं जो कुछ भी कह रहा हूँ, सब कुछ लिखा जा रहा है।
मुझे अपने हर-हर लफ़्ज़ का हिसाब देना होगा।
क्या मैं जो कुछ कह रहा हूँ, उसका हिसाब दे सकता हूँ?
अल्लाह तआला का फ़रमान है:
“इंसान की ज़बान से कोई लफ़्ज़ ऐसा नहीं निकलता, मगर उसे लिखने के लिए एक निगरान फ़रिश्ता मौजूद होता है।”
यानि मेरी और आपकी तमाम बातें लिखी जा रही हैं। अल्लाह तआला ने इसके लिए अपने फ़रिश्ते मुक़र्रर कर रखे हैं।
इसलिए हमें चाहिए कि अपनी बातचीत में, गपशप में, हँसी-मज़ाक में भी एहतियात से काम लें।
अगर ज़बान से कोई ग़लत बात निकल जाए तो बंदे को चाहिए कि अल्लाह के सामने सच्चे दिल से माफ़ी माँगे और आइंदा के लिए अपनी ज़बान को फ़िज़ूल और ग़लत बातों से बचाने की कोशिश करे।
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