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संवैधानिक संस्थाओं पर लोगों का भरोसा कम क्यों हो रहा है ?

jaipur

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किसी भी देश में मजबूत लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि लोगों का वहाँ की संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा हो I लेकिन देश में कुछ सालों से जनता का भरोसा इन संस्थानों पर कमजोर हो रहा है I

किसी भी देश में मजबूत लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि लोगों का वहाँ की संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा हो I लेकिन देश में कुछ सालों से जनता का भरोसा इन संस्थानों पर कमजोर हो रहा है I यह देश के लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है I आज चाहे चुनाव आयोग हो, न्यायपालिका हो, ईडी, सीबीआई, आयकर विभाग, एनआईए जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर से लोगों का भरोसा कम हो रहा है I आज जनता के बीच यह चर्चा आम है कि ये संस्थाएं सत्ताधारी दल के दबाव में काम करती हैं और निष्पक्ष होकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं करती हैं I ऐसे में सवाल यह है कि लोगों के बीच जो यह धारणा बनी है, उसके पीछे कोई ठोस कारण भी हैं या सिर्फ भ्रम है I इसके लिए हम कुछ संवैधानिक संस्थाओं की कार्य शैली का विश्लेषण करते हैं I

सबसे पहले हम देश के चुनाव आयोग की कार्य शैली का विश्लेषण करते हैं I जनता का हर वर्ग आवाज उठाता है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं है और सत्ता पक्ष को फायदा पहुंचाने का काम करता है I अभी चुनाव आयोग ने बिहार में मतदाता सूचियों के विशेष निरीक्षण का आदेश दिया और कहा कि 2024 की मतदाता सूचियों में गड़बड़ थी I ऐसे में सवाल यह उठता है कि अगर 2024 की मतदाता सूची में गड़बड़ थी तो फिर बिहार में 2024 के लोकसभा चुनाव के परिणाम भी अवैध हैं I फिर उन नतीजों को भी निरस्त किया जाना चाहिए था I लेकिन चुनाव आयोग इस मामले में खामोश है I हैरानी की बात यह है कि जो चुनाव आयोग पिछले लोकसभा चुनावों में दस दिन में यह आंकड़े नहीं बता पाया कि कुल कितने वोट पड़े थे ? वह चुनाव आयोग बिहार के आठ करोड़ मतदाता सूचि का निरीक्षण मात्र 25 दिन में कर लेना चाहता है I हैरानी की बात है कि चुनाव आयोग ने उस आधार कार्ड को भी मानने से इनकार कर दिया, “जिसको मेरा आधार-मेरी पहचान” कहा गया I पूरे देश को आधार कार्ड बनवाने के लिये लाइन में खड़ा कर दिया गया I उसी को चुनाव आयोग ने मानने से इनकार कर दिया I एक पत्रकार ने जब देखा कि बिहार में अधूरे फॉर्म को बीएलओ अपलोड कर रहे हैं तो पत्रकार ने आवाज उठाई और प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए तो चुनाव आयोग ने उस पत्रकार के सवालों के जवाब नहीं दिए, बल्कि उस पत्रकार पर ही एफआईआर दर्ज करवा दी I ऐसे में विपक्ष और जनता के उस आरोप को बल मिलता है, जिसमें वे आरोप लगा रहे हैं कि इस निरीक्षण के नाम पर चुनाव आयोग मुसलमानों, दलितों और पिछड़ों के वोट देने का अधिकार छीन लेना चाहता है I क्योंकि चुनाव आयोग ने निरीक्षण के समय कहा था कि इसके जरिए वे देश के नागरिकों की नागरिकता की जांच करना चाहते हैं I जबकि नागरिकता की जांच करने का अधिकार चुनाव आयोग का नहीं है I यह अधिकार देश के गृह मंत्रालय का है कि कौन देश का नागरिक है और कौन नहीं I

चुनाव आयोग ने खुद माना है कि मध्य प्रदेश में बहुत से घर ऐसे हैं जहां एक ही घर के सौ से ज्यादा मतदाताओं का रजिस्ट्रेशन है I ऐसे में अगर जनता में चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल है तो आयोग को हर सवाल का जवाब देना चाहिए I अगर वह ऐसा नहीं करते तो वे देश के लोकतंत्र को कमजोर कर रहे हैं I

अब बात करते हैं देश की न्यायपालिका की I पिछले कुछ सालों से सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भी जनता शक कर रही है चाहे बाबरी मस्जिद का मामला हो, राफेल का या चुनावी बांड का मामला हो I बाबरी मस्जिद मामले में कोर्ट ने माना था कि मस्जिद में मूर्तियां रखना अपराध था I मस्जिद को गिराना अपराध था I मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर नहीं बनी थी I लेकिन फैसला कुछ और आया I राफेल मामले में फ्रांस की सरकार ने माना कि सौदे में बिचौलियों थे I लेकिन सुप्रीम कोर्ट में अनिल अंबानी की कंपनी को क्लीन चिट दे दी I चुनावी बांड को कोर्ट ने अवैध माना, लेकिन न तो लेने वालों के खिलाफ कार्रवाई हुई न ही देने वालों के खिलाफ I उमर खालिद और शरजील इमाम मामला तो हैरान करने वाला है, उमर खालिद पिछले 5 साल से जेल में बंद है I जब उसकी जमानत याचिका सुप्रीम कोर्ट में लगी तो 10 महीने तक उस पर सुनवाई तक नहीं हुई I बस तारीख पर तारीख मिलती रही, आखिर में थककर उमर खालिद ने अपनी जमानत याचिका सुप्रीम कोर्ट से वापस ली और आज तक जेल में बंद है I सीबीआई जो देश की सर्वोच्च संस्था है, वह 9 साल में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र नजीब का पता नहीं लगा सकी और अंत में केस को बंद कर दिया कि आखिर नसीब को जमीन खा गई या आसमान I नजीब की बेबस माँ आज भी इंसाफ और अपने नजीब का इंतजार कर रही है I ईडी ने तो गजब कर रखा है I जो भी व्यक्ति या नेता सत्ता से सवाल करता है I ईडी उसके घर पहुंच जाती है I ईडी ने अब तक जितने लोगों को गिरफ्तार किया है उसमें से सिर्फ दो फीसदी लोगों को ही सजा दिलवा पाई है I ईडी की कार्यवाही के कुछ बहुत दिलचस्प किस्से भी हैं I असम के वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सर्मा कांग्रेस में थे तो भाजपा ने उन पर चार हज़ार करोड़ रुपये के घोटाले के आरोप लगाए और ईडी ने उनको सम्मन जारी कर दिया I लेकिन जैसे ही हेमंत बिस्वा सर्मा ने भाजपा ज्वाइन की उनके सारे पाप धुल गए और आज वे भाजपा से असम के मुख्यमंत्री हैं I ऐसे ही महाराष्ट्र के वर्तमान उपमुख्यमंत्री अजित पर देश के गृहमंत्री अमित शाह ने सार्वजनिक मंच से सत्तर हज़ार करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप लगाया और ईडी ने सम्मन जारी कर दिया I जैसे ही अजीत पवार ने भाजपा ज्वाइन की वैसे ही ईडी के सारे केस खत्म I ऐसे और भी दर्जनों मामले हैं जिसमें नेताओं के भाजपा ज्वाइन करते ही ईडी के केस खत्म हो गए I ऐसे में अगर जनता के मन में यह सवाल उठाते हैं कि ईडी सत्ता पक्ष के साथ इशारे पर काम करती है तो वह सवाल उठना स्वाभाविक है I ऐसी ही कार्य शैली आयकर विभाग की है I जो नेता सत्ता से सवाल करता है, उसी के घर पर आयकर के छापे शुरू हो जाते हैं I जबकि जनता जानती है की काला धन किस-किस के पास है ! लेकिन आयकर विभाग को पता नहीं चलता है I ऐसे में यह स्वाभाविक है कि जनता का भरोसा इन संवैधानिक संस्थाओं पर से उठ रहा है, इसलिए इन संवैधानिक संस्थाओं के जिम्मेदारों की जिम्मेदारी है कि वे अपनी कार्य शैली से जनता में फिर से भरोसा पैदा करें I अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो हो सकता है उनको कुछ व्यक्तिगत लाभ हो जाए I लेकिन देश को और देश के लोकतंत्र को बहुत नुकसान पहुंचा रहे हैं I

-डॉ. एस. खान

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