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मसीहा बनते हो

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मसीहा बनते हो

तुम्हारा प्यार बारिश  की तरह बरसाओ

बहुत उमस है जहां हो यहां चले आ ओ

कितना आसां है नाराज़गी के आलम में

तुम्हारा  कहना   मेरी बला  से मर जाओ

वादे  जितने  भी  हमारे बीच हमने किये

एक आनेका जो वादा है पूरा कर जाओ

तुम्हीं  सही हो  माना  हर-एक  बार मगर

ग़लत  हम भी  नहीं थे कभी ये मनवाओ

बहुत  उजाले में हर चीज़  नज़र आती है

ख़ुशी में आंख नम क्यूं ज़रा ये समझाओ

मेरे  दु:ख़ों   का  क़िस्सा  तुम्हें  सुनाऊंगा

ये  ओर बात  के सुनते  सुनाते सो जाओ

ज़हर  आलूद  हवाओं  से  बचाना है मुझे

तेरा   वजूद  तेरी   शान   कैसे  बतलाओ

कोई  संजीदगी   की  बात  हमें  कहनी हो

तो हंस के आपका कहना जनाब फ़रमाओ

कभी तो मेरा नज़रिया भी समझना दिल से

कभी ये प्यार से कहना हमें  भी  समझाओ

तबाह  करके  ये  दुनिया  मसीहा  बनते  हो

अपने  ज़ुल्म  को  रहमो-करम  न  बतलाओ

तीर खाकर कभी जां- बा -हक हुआ असगर

गजा में क़त्ल किये किसने ये  भी  बतलाओ

तख़लीक़:- फ़ज़लुर्रहमान

सहायक सचिव (सेवा निवृत्त)

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