हुक्मरानों का किरदार हजरत उमर जैसा होना चाहिए
कहते है कि जब अबू उबैदा इब्न ज़र्राह (रजि) जब सीरिया के गवर्नर बना कर जब दमिश्क भेजे गए तो उनकी दिली इच्छा थी कि अमीर उल मोमनींन उमर बिन ख़ित्ताब (रजि) दमिश्क आये, चुनाचें उन्होंने उमर बिन ख़ित्ताब से दरखास्त की कि वो कभी दमिश्क पधारे। बार-बार रिक्वेस्ट आने पर अमीर उल मोमनींन ने उनकी दावत को क़बूल कर लिया। गवर्नर उबैदा बिन जर्राह ने अमीर उल मोमनींन के इस्क़बाल के लिए जम कर तैयारियाँ की, नियत तारीख़ को उबैदा ख़लीफ़ा की अगवानी करने के लिए दमिश्क के हज़ारों गणमान्य नागरिकों के साथ शहर से कुछ कोस आगे आ कर खड़े हो गए। दमिश्क अभी कुछ दिन पहले ही ख़ालिद बिन वलिद की क़ियादत में फ़तह किया गया था, इससे पहले दमिश्क सहित पूरा फ़िलिस्तीन और लेवांत अज़ीमो-शान रोमन साम्राज्य का सदियों से हिस्सा रहा था, रोमानी सल्तनत अपनी चमक दमक और शानो शौकत के लिए पूरी दुनियाँ में मशहूर थी। यहाँ के लोगों ने कई-कई बार रोमन सम्राटों के शाही जुलूस को मय लाजो-लश्कर निकलते देखा था, जहाँ रोमन सम्राट नंगी तलवार से लैस हज़ारों अंगरक्षकों से घिरे निकलते थे और अब वो अपने उस फ़ातेह का इस्क़बाल करने को खड़े थे, जिसके लश्कर ने रूमी सल्तनत को शिकस्त दी थी, जो अब लाखों मुरब्बा मील में फैली दुनियाँ की सबसे बड़ी सल्तनत का हाकिम था। वो अपने नए फ़ातेह का इंतज़ार कर ही रहे थे कि सामने से एक ऊँट आता दिखाई दिया जिस पर एक नौजवान सवार था, ऊँट की नकेल पकडे एक अधेड़ सा इंसान चल रहा था। जैसे ही ऊँट थोड़ा और नज़दीक आया तो उबैदा (रजि) ख़ुशी से ऊँट की तरफ़ दौड़े। दमिश्क के लोगों ने कभी अपने हुक्मरानों को तो छोड़िए हुक्मरानों के छोटे से छोटे अहलकार को भी अकेले और ऐसे साधारण कपड़ों में नहीं देखा था। उन्हें लगा ये जो नौजवान ऊँट पर बैठा है शायद ये ही अमीर उल मोमनींन है, मगर उनके पांव के नीचे से ज़मीन निकल गई जब उन्होंने उबैदा को भाग कर ऊँट की नकेल को पकड़ कर चल रहे इंसान के हाथ को बड़े ही अदब ओ एतराम से चूमते देखा।
अचरज से भरे दमिश्क के लोगों को अपनी आँखों पर भरोसा नहीं हो रहा था कि उनके दौर का सबसे बड़ा हुक्मरान किसी के ऊँट की नकेल पकड़े अकेला चला आ रहा हो, उनमें से हर एक सोच रहा था कि आख़िर कौन है ये भाग्यशाली नौजवान जिसका ऊँट उमर बिन ख़ित्ताब जैसा शख़्स पकड़ के चल रहा है? इस सवाल के जवाब ने तो उन्हें जैसे पागल ही कर दिया जब उन्हें बताया गया कि ऊँट पर बैठा नौजवान हज़रत उमर का नौकर असलम है और मदीना से चलते वक़्त ही उन्होंने तय किया था कि बारी बारी से दो कोस हजरत उमर ऊँट पर बैठेंगे और उनका सेवक ऊँट की नकेल पकड़े चलेगा और दो कोस उनका ख़िदमतगार ऊँट पर बैठेगा और वो ख़ुद ऊँट की नकेल पकड़े चलेंगे। अभी जब वो दमिश्क के पास पहुँचे थे तब असलम की ऊँट पर बैठने की बारी थी।
दमिश्क के लोगों ने ऐसा अजूबा ना कभी देखा था, ना कभी सुना था, अभी तक वो हज़रत उमर के क़ायल केवल इस बात को ले कर थे कि वो उनके मुल्क के हुक्मरान थे मगर इस वाक़िये ने उमर को अब उनके दिलों का हुक्मरान बना दिया था। उन्ही का क्यों जब भी इस वाक़िये को आप किसी को सुनायेंगे तो उमर उसके दिल पर भी राज़ करने लगेंगे तभी तो जब आज़ादी के बाद गांधी से किसी ने पूछा कि आज़ाद भारत में जो रामराज्य वो हिंदुस्तान में लाना चाहते है उसके हुक्मरान वो कैसे चाहते है? तो गांधी ने जवाब दिया कि मेरे रामराज्य के हुक्मरानो का किरदार हज़रत उमर जैसा होना चाहिए, जो अपने नौकर से भी अपने मामले इस तरह तय करे कि अदल, इंसाफ़ और सादगी की मिसाल क़ायम हो जाये।
मगर आज जब मैं लावों-लश्कर के साथ हमारे जम्हूरी हुक्मरानों को निकलता देखता हूँ जिसने अवाम को सड़क किनारे मोटे रस्सों या बल्लियों के पीछे खड़े रहने को मजबूर कर दिया जाता है तो दिल मायूस हो जाता है और लगता है कि गांधी का रामराज्य बस सपना भर ही तो है!!!
लेखक:- सुनील शर्मा,
(ज्ञानविहार यूनिवर्सिटी के कुलपति)
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