उर्दू ज़िन्दगी की ज़रूरत का नाम है
उर्दू पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का ब्यान उनके कुम्भ मेले में हुए हादसे से भागने का तरीक़ा है। ताकि भक्त ख़ुश होकर कुम्भ मेले में हुई मौतों पर सवाल उठा नहीं पायें।उर्दू ख़त्म करने से ज़्यादा भक्तों को कुम्भ की लापरवाही और लोगों की भगदड़ में हुई मौत से ध्यान हटाने की राजनीति है। क्योंकि भक्त ही नाराज़ हो गये हैं तो अब ख़ुश कैसे करें, ध्यान कैसे हटायें तो फिर गन्दी राजनीती का खेल खेल डाला मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ ने। उर्दू हिन्दुस्तान से लोगों की ज़िन्दगी से कोई भी नहीं मिटा सकता। उर्दू ना तो मुगल लेकर आये, नाही मुसलमानों ने पैदा की, उर्दू भारत में हिन्दी की तरह जन्मी भाषा है, जिसका इस्तेमाल ज़्यादातर आपको पुराने अदालत के क़ानूनी दस्तावेजों में मिलेगा। उर्दू पहले बही खातों में ज़्यादा इस्तेमाल हुई। राजपूतों, हिन्दू राज घराने के बहीखाते आज भी उर्दू में मौजूद हैं। उर्द ना मुसलमान की भाषा थी और ना मुग़लों की। मुगल काल की ज़्यादातर किताबें फारसी में हैं। अगर उर्दू में कोई है तो वो किसी हिन्दुस्तान के लेखक ने लिखी है। उर्दू क्या है और उसकी ज़िन्दगी में ही नहीं भारत में क्या जगह है ज़रा बॉलीवुड से उर्दू हटाकर देखो सिनेमा जगत बेरंग फीका है उर्दू बिना, ज़रा उर्दू शायरी में हटा कर देखो शायरी बद मज़ा हो जायेगी। और तो और उर्दू ज़रा बोलचाल की भाषा से निकाल कर देखो तुम्हारे शब्द खोकले हो जायेंगे। क्योंकि उर्दू से ख़ूबसूरत और मीठी कोई बोली ही नहीं है। चलिए कुछ अल्फ़ाज़ बोलकर देखते हैं और महसूस करके देखते हैं उर्दू की मीठास को। जैसे खाना खालो , भोजन ग्रहण करो यही उर्दू में खाना नोश फरमाइये। आपकी पुत्री अति सुन्दर है। आपकी दुख़्तर बहुत ख़ूबसूरत है। टट्टी लगी है शौचालय जाना है। पाख़ाना आ रहा है बैतुलख़ला जाना है। पधारो हमारे देश। तशरीफ़ लायें हमारे मुल्क। आकाश पर तारे चमक रहे हैं। अर्श पर सितारे रौशन हैं। चन्द्रमा की लाली, महताब की सुरख़ी। सूरज की गर्मी, आफ़ताब की तपिश। आपकी दयालुता, आपकी ज़र्रा नवाज़ी। वह शान्त है, वो पुर सुकून है। मैं आपसे निवेदन करती हूँ, मैं आपसे गुज़ारिश करती हूँ। हमारी संस्कृति, हमारी तहज़ीब। तुमको मैनर्स नहीं, तुमको आदाब नहीं । श्रीमन विन्रमता से जल पिलाओ, जनाब नज़ाक़त से पानी पिलायें। उर्दू में तू का तसव्वुर यानि छवि नहीं है, छोटे बड़े को आप कह कर मुख़ातिब यानि सम्बोधित किया जाता है। सब कुशल है, सब ख़ैरियत है। अब इन अल्फ़ाज़ों यानि शब्दों पर ग़ौर करें। बहुत से शब्द ऐसे हैं जो हिन्दू भाई भी हर कोई अपनी ज़िंदगी में प्रयोग यानि इस्तेमाल करते हैं। इनशाल्लाह, ज़िन्दगी, दिल, दिमाग़, इश्क़, ख़त, शर्मनाक, इज़्ज़त, फिक्र, जिस्म, क़दम, क़ीमत, ख़राब, हालात, इशारा, ख़तरा, क़ब्रिस्तान, लहजा, सही, ग़लत, सिलसिला, नसीहत, शायद, अक्सर, अदालत, अजीब, अगर, अफ़सोस, अख़बार, आम इन्सान, क़ानून, काग़ज़, आदत, ख़ुशी, उम्र, अजीब, शुक्रिया, दोस्त, आज़ादी, औरत, मर्द, इमारत, महल, क़िला, ईमानदार, इत्तेफ़ाक़, इन्तज़ार, यक़ीन, शहीद, इस्तेमाल, किताब, क़र्ज़, तारीफ़, तारीख़, गुनाह, इल्ज़ाम, किताब, मशहूर, ऐतराज़, अहसान फ़रामोश, मसला, इलाक़ा, मजबूर, इम्तेहान, मजबूर, मजबूरी, ग़रीब, रहम, ख़ूबसूरत, हसीन, दस्तावेज़, दस्ताख़त, हैरानी, बेइज़्ज़ती, मुमकिन, फ़ैसला, हक़, हक़ीक़त, सुकून, मेहरबान, मेहरबानी, सवाल, जवाब, ज़िम्मेदार, ज़िम्मेदारी, फ़र्ज़ी, वकील, इनाम, क़ाबिल, धोखा, हमदर्द, हमदर्दी, ग़म, शर्मनाक, हरकत, बदबू, ख़ुशबू,दख़ल, ख़त, दीवार, दिवाना, पागलपन, ख़ामोशी, ख़ामोश, निगाहें, इतराना, आदत, बरताव, बरबाद, तन्हा, तन्हाई, रुख़सत, जल्दी, तोहफ़ा, शक, ताक़तवर, हिम्मत, ख़ौफ़, ग़ुलाम, ग़ुरूर, जश्न, ख़ुदकुशी, लिहाज़, रूह, हैवान, बेरहम, ख़ारिज, मर्ज़, मर्ज़ी, इलाज, हकीम, खाना, मकान, मसीहा, क़त्ल, ख़ून, ख़ूब, ख़ुद,रोज़ी, रोज़ाना, रोज़गार, ज़िद ये अल्फ़ाज़ पढ़िए और सोचिए इनमें आप की ज़रूरत वाले अल्फ़ाज़ मिलेंगे जो आप रोज़ाना बोलते हैं।उर्दू पर सियासत हमेशा होती रहती है। मगर उर्दू आम ज़िन्दगी की ज़रूरत है, जिससे राजनीति मिटा नहीं सकती। स्कूलों से उर्दू ग़ायब कर सकते हो मगर लोगों की ज़बानों पर चढ़े हुए उर्दू शब्द कैसे ख़त्म करोगे जो वो रोज़ाना बोलते हैं। जो सिनेमा जगत सबसे ज़्यादा टैक्स देता है वो उर्दू ख़त्म नहीं कर सकता, सारे डायलॉग ही उर्दू में लिखे और बोले जाते हैं। ये सरकार का फ़न्डा है पुराना, जब कहीं हादसा होता है और ये दोषी होते हैं जनता नाराज़ होती है तो कोई ऐसा मुद्दा खड़ा करते हैं जिससे पब्लिक हादसा भूलकर उसमें उलझ जाती है। यही पुलवामा हादसे के बाद सियासत का खेल खेला गया था। आन्नद नारायण जी लिखते हैं कि जिस उर्दू की मुहब्बत में राम प्रसाद “बिस्मिल” नें कहा था सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है जिस उर्दू की मुहब्बत में रघुपति सहाय फ़िराक़ गोरखपुरी हो गये।बृजनारायण चकबस्त हो गये, पंडित हरिचंद “अख़्तर” हो गये, सम्पूर्ण सिंह कालरा “गुलज़ार” कश्मीरी पंडित आनंद नारायण ज़ुतशी गुलज़ार देहलवी हो गये। जिस उर्दू में भगत सिंह ख़त लिखा करते थे, जिस उर्दू को ख़ुद गॉंधी जी हिंदुस्तानी भाषा कहते हैं, जिस भाषा से नेहरू और पटेल ने प्यार किया। जिस उर्दू भाषा ने इंकलाब ज़िंदाबाद का नारा दिया, जिस उर्दू भाषा ने जय हिंद का नारा दिया, जिस भाषा में मौहब्बत और बग़ावत के गीत गाये गये, जिस उर्दू ने क्रांतिकारियों के सपोर्ट में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ अख़बार सजाये। जिस उर्दू ने आज़ादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई। आज एक सूबे के मुखिया आदित्यनाथ योगी उसी भाषा को कठमुल्ला की भाषा कह रहे हैं। हंसी आती है ऐसी अभद्रता पर। उन्हें कोई बताये कि उर्दू ‘कठमुल्ला’ की नहीं बल्कि आनंद नारायण ‘मुल्ला’ की ज़बान है।
‘मुल्ला’ बना दिया है इसे भी महाज़-ए-जंग
इक सुल्ह का पयाम थी उर्दू ज़बाँ कभी।
–आनंद नारायण मुल्ला
मैंमूना नरगिस
सामाजिक कार्यकर्ता जयपुर
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