मुसलमानों में अच्छी लीडरशिप क्यों पैदा नहीं हो पाती है?
- मुसलमानों में लीडरशिप के नाम पर ऐसे लोग पैदा हो गये हैं, जिनको न तो मुस्लिमों के मसाइल की समझ है और न उन्हें हल करने में दिलचस्पी। मुस्लिमों की शादियों में जाना और जनाजों में शरीक होना ही बड़ा काम समझ लेते हैं।
वैसे तो देश में आबादी के लिहाज से दूसरा सबसे बड़ा समुदाय है। लेकिन मामला जब मुस्लिम लीडरशिप का आता है तो मामला जीरो पर आकर अटक जाता है। मुस्लिमों के नाम जैसे बहुत से नाम सियासत में भी मिल जाएंगे और लीडरशिप में भी। पर सवाल यह उठता है कि क्या यह तथाकथित मुस्लिमों के नाम वाले लीडर मुसलमानों के मसाइल का हल भी करते हैं। मुसलमानों के लीडरशिप के नाम पर ऐसे लोग पैदा हो गये हैं, जिनको न तो मुस्लिमों के मसाइल की समझ है। और न उन्हें हल करने में दिलचस्पी है। मुस्लिमों की शादियों में जाना और जनाजों में शरीक होना ही बड़ा काम समझ लेते हैं। और मुसलमान भी इतना नादान है कि वह ऐसे कामों से ही बहुत खुश हो जाता है और ऐसे लीडरों की शान में कसीदे पढ़ना शुरू कर देता है। मौलाना आजाद मरहूम आखिरी मुस्लिम लीडर थे। जो इस कौम के हर मसले को हल करने की कोशिश करते थे और सियासत में उनका इतना बड़ा कद था कि वे तब के देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को उनके नाम से पुकारा करते थे। आज के मुस्लिम लीडरों की तो अपने आका और अपनी पार्टी के आलाकमान के सामने खुलकर मुस्लिमों की समस्याओं के बारे में बोलने की हिम्मत नहीं होती है।
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर मुसलमानों में अच्छी लीडरशिप पैदा क्यों नहीं होती है? इस सवाल का जवाब तलाश करने के लिए सबसे पहले यह देखना होगा कि समुदाय में से कौन से लोग सियासत में जा रहे हैं और कौन से लोग सियासत से दूर ही रहना पसंद करते हैं। समुदाय को हम तीन हिस्सों में बांट कर देखते हैं। एक वे लोग हैं जो सबसे ज्यादा पढ़े लिखे होते हैं जहीन और समझदार होते हैं। यह वर्ग अपना भविष्य भारतीय प्रशासनिक सेवाऐं, या राज्य स्तर की प्रशासनिक सेवाऐं या निजी क्षेत्र की बहुराष्ट्रीय कंपनियों, कारपोरेट सेक्टर में अपना भविष्य तलाश करते हैं वहीं सेटल हो जाते हैं। यह तबका धीरे-धीरे अपने ही समुदाय से कट जाता है। इनको आम मुसलमान से या उनकी समस्याओं से कोई लेना देना नहीं होता है। हां यह तबका अपने ड्राइंगरूम में चाय पीते हुए देश के बिगड़ते हालात पर मुसलमानों की बदहाली भी उनके तर्कों के साथ चर्चा करेंगे। फिर आराम से डिनर करके सो जाएंगे और अपने काम में मस्त हो जाएंगे। दूसरा तबका अपना भविष्य कारोबार में तलाश करता है और अपने को सियासत से दूर कर लेता है। इस तबके को भी मुसलमानों और उनकी समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं होता है। इसका पूरा फोकस पैसा कमाने में और उसके बाद अपनी शानों शौकत दिखाने के लिए अपने बच्चों की शादियों में अपने पैसे का दिखावा करने में रहता है। ताकि मुस्लिम सामुदाय उसको बड़ा आदमी माने उसे सलाम ठोके। उसके कसीदे पढ़ें। अब बचता है वह तबका जो एक तरह से नाकारा होता है जो खुद को कहीं भी सेटल नहीं कर पाता है। वह अपने आपको युवा नेता के तौर पर पेश करता है। इसलिए ही मुसलमानों में युवा नेताओं की एक फ़ौज होती है। यह फ़ौज आपको हर शहर में कस्बे हर मोहल्ले में और गली तक में मिल जाएगी। इस फ़ौज को न मुसलमानों के मसलों का कुछ पता होता है न इन मसलो के पीछे छिपे कारणों का पता होता है। और यह सब कैसे हल हो सकते हैं उसका तो इनको कुछ भी मालूम नहीं होता है। यह युवा नेता किसी भी एक बड़े नेता को पकड़ लेंगे। उसके जन्मदिन पर बड़े-बड़े पोस्टर लगवायेंगे, उसकी शादी की वर्ष गांठ के पोस्टर लगवायेंगे। यहां तक कि नेता जी के बच्चों तक के जन्मदिन के पोस्टर लगवायेगें। इस फौज को अपने वालिद व वालिदा का जन्मदिन याद नहीं होगा। लेकिन नेताजी के पूरे खानदान का जन्मदिन इनको याद रहता है। ऐसे मुस्लिम युवा नेता सुबह-शाम अपने नेता के यहां हाजरी लगाएंगे। और फिर एक दिन इसी फौज में से किसी एक को किसी मुस्लिम बहुल सीट से टिकिट दे देती है। और बेचारा नादान मुसलमान भी इसके मुस्लिम नाम के भ्रम में आकर इनको थोक में वोट दे देता है।
मुसलमान यह देखता ही नहीं है कि जिसे वह वोट दे रहा है। उसमें मुसलमानों की लीडरशिप करने की काबिलियत है या नहीं। उसमें मुसलमानों के मामलों में बोलने की हिम्मत है या नहीं। जिसको वह वोट दे रहा है वह अपनी पार्टी के आलाकमान के सामने मुसलमानों के मसलों को रखने की हिम्मत रखता है या नहीं। बस उसका मुसलमानों जैसा नाम देखते हैं और जितवा देते हैं। मुसलमानों की इसी सोच का नतीजा है कि मरहूम मौलाना आजाद के बाद कोई अच्छी लीडरशिप सामने नहीं आई है। इसके अलावा एक और बड़ा कारण है जो अच्छी लीडरशिप पैदा नहीं हो रही है। मुसलमान जिन भी पार्टियों को वोट देता है वह ऐसे लोगों को टिकट देती है जो पैसे वाला हो। क्योंकि आज चुनाव लड़ना बहुत महंगा हो गया है। इसलिए कारोबारी होता है वह पार्टी फंड में और नेताओं को पैसे देकर टिकिट ले आता है। फिर मुसलमान उसके नाम को देखकर वोट देते हैं और वह नेता कुछ अपने पैसों से वोट जुटा लेता है और चुनाव भी जीत जाता है।
अब जरा सोचिए ऐसा नेता चुनाव जीतने के बाद अपना कारोबार बढ़ाने पर ध्यान देगा या मुसलमानों के मसले हल करने पर। इसी का नतीजा है कि आज मुसलमान साल दर साल हर मैदान में पिछड़ रहा है। चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो, सरकारी नौकरियां हो या कारोबार हो। हर जगह मुसलमानों को हाशिये पर धकेलता जा रहा है और उसकी तथाकथित लीडरशिप कुछ नहीं बोल रही है। आज हालात यह हो गये हैं कि कोई भी ऐरा-गेरा खुले आम मुसलमानों को पाकिस्तान में भेजने की धमकी दे देता है। कोई उनकी कब्रों से हड्डियां निकाल कर जलाने की धमकी देता है, कोई उनकी महिलाओं से रेप करने की धमकी देता है। कोई उनकी मस्जिदे-दरगाहें छीनने का ऐलान कर देता है। उनके यह मुस्लिम लीडर इन असामाजिक तत्वों के खिलाफ न कुछ बोलने की हिम्मत करते हैं और न किसी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाने की हिम्मत करते हैं। ऐसे हालात में पूरे मुस्लिम समुदाय को सोचना होगा कि क्या उन्होंने जिनको वोट देकर लीडर बनाया है। वे मुसलमानों पर हो रहे जुल्मों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। उनके वोट का हक अदा कर रहे हैं। अगर वे ऐसा नहीं कर रहे हैं तो अब वक्त आ गया है कि मुसलमान ऐसे नाकारा और नालायक लीडरों को ख़ारिज करे और ऐसे लोगों को आगे बढ़ाये जिनकी वफादारियां आपके साथ हों। अगर मुस्लिम समुदाय अब भी इन तथाकथित धर्म निरपेक्ष पार्टियों के चुंगल से बाहर नहीं निकला तो उसे आने वाले वक्त में बहुत भारी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिये।
-डॉ. एस. खान
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