इमाम अबू हामिद मुहम्मद (ग़ज़ाली र. अ.)
इमाम ग़ज़ाली र. अ. का पूरा नाम – अबू हामिद मुहम्मद इब्न मुहम्मद अल-ग़ज़ाली है। उनके पिता एक कपास/कपड़ा व्यापारी थे और इसलिए उन्हें ग़ज़ाली कहा जाता है। इमाम ग़ज़ाली की पैदाइश सन 1058 ई. (450 हिजरी) में, बमुकाम-तूस (तौस) के तबरान कस्बे (ख़ुरासान, ईरान) में हुई थी और वफ़ात: 19 दिसम्बर, 1111 ई. (505 हिजरी) को तूस (तौस) में 52-53 साल की उम्र में हुई। इमाम ग़ज़ाली र. अ. की कई बेटियाँ थीं, लेकिन कोई बेटा नहीं था ।
आपका लक़ब-हुज्जतुल-इस्लाम है और इस्लामी इतिहास के सबसे प्रमुख और प्रभावशाली न्यायविदों, कानूनी सिद्धांतकारों, मुफ़्तियों, दार्शनिकों, धर्म-शास्त्रियों, तर्क-शास्त्रियों और रहस्यवादियों में से एक के रूप में उन्हें जाना जाता है।
इमाम ग़ज़ाली का इल्मी सफ़र बेहद शानदार रहा । छोटी उम्र से ही आपने तालीम हासिल की और शाफ़ई फ़िक़्ह में माहिर हुए यानि इमाम शाफ़ई मसलक से आप थे । आपने कई मशहूर उस्तादों के साथ-साथ इमाम जुबैदी और इमाम जुवैनी (इमामुल हरमैन) से इल्म हासिल किया। आप बहुत कम उम्र में ही जुलाई, 1091 में निज़ामिया मदरसा, बग़दाद (जो उस दौर की यूनिवर्सिटी की तरह था) के शैख़ व मुहद्दिस बने यानि प्रोफेसर बने। इमाम ग़ज़ाली र. अ. ने अपना शानदार केरियर छोड़ा, अर्थात प्रोफेसर के पद से खुद हट गये और लगभग 10 साल तक (सूफियाना/तसव्वुफ) संन्यासी, तपस्वी जीवन व्यतीत किया, जिसके बाद उन्होंने तूस में फिर वापसी की । 10 साल तक सूफियाना ज़िन्दगी गुज़ारने के सम्बन्ध में उन्होंने अपनी आत्म-कथा में लिखा है कि “मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि आख़िरत की नेमतें तक़वा और शारीरिक इच्छाओं के त्याग के बिना हासिल नहीं की जा सकतीं और यह तभी हो सकता है जब दुनिया की मोहब्बत गायब हो जाए, जब तक कि इंसान दुनिया को त्यागकर आख़िरत की चाहत न करे। इंसान को पूरी ऊर्जा और पूरी तरह से अपने रब की तरफ़ मुड़ना चाहिए और यह वैभव और धन-दौलत का त्याग किए बिना नहीं हो सकता। जब मैंने ख़ुद को परखा, तो पाया कि मैं दुनिया से गहराई से जुड़ा हुआ हूँ । जब मैंने अपने व्याख्यान के पीछे के उद्देश्यों का अध्ययन किया, तो पाया कि यह सिर्फ़ शान-शौकत और रुतबे के लिए था। अब मुझे यक़ीन हो गया था कि मैं बर्बादी के कगार पर खड़ा हूँ। मैंने इस स्थिति पर काफ़ी देर तक विचार किया।” आखिरकार इमाम ग़ज़ाली एकांतवास के लिए दमिश्क गए और अपना समय भक्ति और आत्म-शुद्धि में (सुफियाना, तसव्वुफ की ज़िन्दगी) बिताया।
इमाम ग़ज़ाली र. अ. दीने इस्लाम के शाफ़ई मसलक के बड़े फक़ीह थे और फ़िक़्ह व उसूल पर आपने बहुत काम किया, उसूल-ए-फ़िक़्ह (इस्लामी क़ानून की बुनियाद) पर उनकी किताब “अल-मुस्तस्फ़ा” सबसे अहम किताब मानी जाती है। उनकी सबसे मशहूर किताब “इह्या उलूमुद्दीन” है, जिसे इस्लाम की रूहानी और अख़लाक़ी ज़िंदगी का ख़ज़ाना माना जाता है। इस तरह तसव्वुफ़ (रूहानियत) के लिहाज से इस्लाम में एक नये दौर की शुरुआत हुई। इमाम ग़ज़ाली र. अ. ने ग्रीक फ़लसफ़ी (अरस्तू, अफ़लातून) और मुस्लिम फ़लसफ़ियों (फ़ाराबी, इब्न सीना) के असरात का गहरा अध्ययन किया और उन्होंने अपनी किताब “तहाफ़ुतुल फ़लासिफ़ा” (फ़लसफ़ियों का विरोधाभास) लिखकर फ़लसफ़ियों की बहुत-सी राय और उसूलों का खंडन किया। इमाम ग़ज़ाली र. अ. ने इस्लामी सोच को नया रुख़ दिया।
इमाम ग़ज़ाली र. अ. को “मजद्दिद-ए-ग्यारहवीं सदी” (धर्म को पुनर्जीवित करने वाला) कहा जाता है। उन्होंने शरिया (क़ुरआन-हदीस), अक़्ल (फ़लसफ़ा) और तसव्वुफ़ (रूहानियत) तीनों को एक प्लेटफ़ॉर्म पर ला दिया। उनकी सोच ने न सिर्फ़ मुस्लिम दुनिया बल्कि यूरोप के ईसाई स्कॉलर्स (जैसे थॉमस एक्विनास) को भी प्रभावित किया।
इमाम ग़ज़ाली की ख़ास-ख़ास बातें:-
- इमाम ग़ज़ाली र. अ. का मानना है कि “इल्म बिना अमल बेकार है, और अमल बिना इख़लास रियाकार (दिखावा)।”
- इंसान का मक़सद अल्लाह की पहचान और उसकी बंदगी है।
इमाम ग़ज़ाली की तालिमात आज भी मदरसों और यूनिवर्सिटियों में पढ़ाई जाती है। अल-ग़ज़ाली र. अ. ने अपनी अधिकांश रचनाएँ फ़ारसी और अरबी में लिखीं हैं । इमाम ग़ज़ाली र. अ. की लिखी गईं ख़ास क़िताबें :-
- 1. इह्या उलूमुद्दीन– ईमान, इबादत, अख़लाक़ और समाजी उसूलों पर मबनी है । इह्या उलूमुद्दीन किताब 4 हिस्सोंमें बंटी है और हर हिस्से में 10 किताबें (कुल 40 किताबें) हैं । “इह्या उलूमुद्दीन” एक ऐसी गाइड है जो मुसलमान को नमाज़ और रोज़ा सिखाने के साथ-साथ दिल की सफ़ाई, मोहब्बत और अल्लाह से ताल्लुक़ को ज़िंदा करना सिखाती है।
“इह्या” सदियों से मदरसों में पढ़ाई जाती रही है। इसे उलमा और सूफ़िया दोनों ने क़बूल किया।
कई लोगों ने इसे “क़ुरआन और हदीस के बाद सबसे ज़्यादा असरदार किताब” कहा।
यूरोप तक में इसका असर पहुँचा; किताब के कई हिस्सों का लातिनी और अंग्रेज़ी में अनुवाद हुआ।
- तहाफ़ुतुल फ़लासिफ़ा– इस्लामी दर्शन की एक मशहूर किताब है।फ़लसफ़ियों की राय की तन्क़ीद (आलोचना) है । इस किताब में 20 ऐसे मसाइल (विचारों) पर आपत्ति उठाई जो उनके मुताबिक़ इस्लाम के खिलाफ़ थे। यह किताब दर्शन के इतिहास में एक मील का पत्थर है, क्योंकि यह 14वीं शताब्दी के यूरोप में बाद में विकसित अरस्तू विज्ञान की आलोचना को आगे बढ़ाती है । इमाम ग़ज़ाली र. अ. ने इस किताब से यह साबित किया कि केवल दर्शन से हक़ीक़त (सच्चाई) तक नहीं पहुंचा जा सकता, बल्कि वहीं और नबूवतही अंतिम मार्ग-दर्शक हैं। ग़ज़ाली र. अ. ने यहाँ फ़लसफ़ियों के नैतिक विचारों को लिया, लेकिन उन्हें इस्लामी नज़रिये से तौला। यह किताब, फ़लसफ़ा और तसव्वुफ़ का पुल है — यानी ग़ज़ाली ने दार्शनिक तर्कों को सूफ़ी नैतिकता से जोड़ा है। इमाम ग़ज़ाली र. अ. ने किताब में कहा है कि इन तीन विचारों के मानने वाले इस्लाम से बाहर (ख़ारिज) हो जाते
हैं :- 1. क़यामत में जिस्मानी (शारीरिक) हिसाब-किताब और जन्नत-जहन्नम को न मानना । 2. अल्लाह का केवल कुल (यानि सार्वभौमिक) चीज़ों को जानना और व्यक्तिगत चीज़ों को न जानना । 3. आलम (ब्रह्मांड) का हमेशा से होना – यानि इसका कोई आरंभ न होना । बाक़ी 17 मसाइल में उन्होंने फ़लसफ़ियों को सिर्फ़ “गुमराह” (बिदअत पर) कहा।
- अल-मुस्तस्फ़ा – उसूल-ए-फ़िक़्ह पर अहम किताब। अल-मुस्तस्फ़ा चार बड़े भागोंमें है। शाफ़ई फ़िक़्ह के लिए यह मानक किताब है।
इसमें उसूल-ए-फ़िक़्ह को एक मजबूत और साफ़-सुथरा फ्रेम-वर्क दिया। “अल-मुस्तस्फ़ा” को इमाम ग़ज़ाली र. अ. की इल्मी परिपक्वता का नतीजा माना जाता है, क्योंकि यह उन्होंने अपने तसव्वुफ़ी और दार्शनिक सफ़र के बाद लिखी है।
- मिज़ानुल अमल – इंसानी अख़लाक़ और अमल का तौल। यह किताब उनकी मशहूर किताब “इह्या उलूमुद्दीन” के लिखे जाने से पहले की है और ग़ज़ाली के इल्मी-सफ़रमें एक खास मुकाम रखती है। इस किताब में इमाम ग़ज़ाली र. अ. का मक़सद यह समझाना था कि अच्छा अमल कौन-सा है, बुरा अमल कौन-सा है और सही नीयत और सही मक़सद क्या होना चाहिए। “मिज़ान” शब्द से इशारा है कि हर अमल को तौला जाए — यानि कोई भी काम सिर्फ़ आदत या दिखावे के लिए न हो, बल्कि अल्लाह की ख़ुशी के लिए हो।
- क़वायदुल अक़ाइद– अक़ीदे पर असर और विरासत । यह किताबइमाम ग़ज़ाली र. अ. की किताब “इह्या उलूमुद्दीन” का चौथा रुक्न (भाग) है। इसमें उन्होंने इस्लामी अकीदा (विश्वास प्रणाली) को आसान, साफ़ और मज़बूत अंदाज़ में बयान किया है। यह किताब अहलुस्सुन्ना वल-जमाअह के अकीदे का मानक बयान बन गई।
मदरसों और दर्स-ए-निज़ामी में इसे इब्तिदाई कलाम के तौर पर पढ़ाया जाता है।
इमाम ग़ज़ाली र. अ. का मक़सद इस किताब में यह था कि आम मुसलमान को सही अकीदा (सही विश्वास) समझ आए। इस्लामी अकीदे को इतना साफ़ और आसान बना दिया जाए कि लोग ग़लत फ़लसफ़ी विचारों में न फँसे।
किताब में आसानी से समझाया गया है, अल्लाह पर ईमान – उसकी ज़ात, सिफ़ात (गुण), और उसकी तौहीद (एकता)। फ़रिश्तों पर ईमान अल्लाह की किताबों पर ईमान। रसूलों पर ईमान आख़िरत पर ईमान – हिसाब-किताब, जन्नत-जहन्नम। तक़दीर पर ईमान – अच्छा और बुरा सब अल्लाह के इल्म में है ।
ग़ज़ाली र. अ. ने अल्लाह की 20 सिफ़ात का बयान किया, जिन्हें जानना ज़रूरी है, नबूवत और रिसालत की हक़ीक़त । नबी और रसूल के बीच फर्क । नबूवत की ज़रूरत और उसकी दलीलें। मोहम्मद स. अ. के नबी होने की दलीलें ।
आख़िरत के मसाइल :- मौत के बाद की ज़िंदगी, बरज़ख़, क़यामत, हश्र-नशर। जन्नत और जहन्नम की हक़ीक़त। रूह का हिसाब।
इमाम ग़ज़ाली र. अ. ने साइंस और दर्शन, दार्शनिकता के सम्बन्ध में इस सिद्धांत को प्रतिपादित किया कि अल्लाह के हुक्म के बिना कायनात में कुछ नहीं होता । रुई को आग के पास ले जाने पर रुई खुद-ब-खुद नहीं जलती, बल्कि अल्लाह के हुक्म से जलती है। यह भी कहा जाता है कि इमाम ग़ज़ाली के उसूलों और व्याख्याओं के बाद मुस्लिम जगत, विज्ञान और दर्शन से दूर होने लगा, यह पूरी तरह से सही नहीं कहा जा सकता क्योंकि ग़ज़ाली र. अ. खुद एक बहुत बड़े आलिम थे और तर्क शास्त्र (logic) का इस्तेमाल करते थे । 13वीं सदी के बाद (1258 में बग़दाद की तबाही के बाद), असली गिरावट मंगोल आक्रमण और बाद में राजनीतिक पतन से आई, जिसने किताबों, वेधशालाओं और विश्वविद्यालयों को नष्ट कर दिया था। मुस्लिम जगत में नई-नई इजादात (अविष्कार) रुक गई थीं । यह सही है कि इमाम ग़ज़ाली र. अ. की तालीमात ने सूफीवाद व इस्लामी इल्मुल-कलाम को मज़बूत किया और इसे बहुत बढ़ावा मिला। इसका (सूफीवाद) असर मुस्लिम जगत में आज भी देखा जा सकता है।
-फ़ज़लुर्रहमान
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