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बुजुर्ग नेताओं से तंग आए युवा: संसद भंग

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लेकिन संविधान सुरक्षित- नेपाल का नया आंदोलन

काठमांडू (एजेंसी)।  नेपाल की राजधानी काठमांडू इस समय राजनीतिक उथल-पुथल और अशांति के दौर से गुजर रही है। संसद भंग होने और प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली के इस्तीफे के बाद हालात लगातार बिगड़ते गए। इस बीच, नेपाल की नई पीढ़ी—Gen-Z—के नेता पहली बार खुलकर सामने आए हैं और उन्होंने अपने आंदोलन की वजह और मकसद दोनों को स्पष्ट करने की कोशिश की है।

बुजुर्ग नेताओं से तंग आकर किया आंदोलन

Gen-Z नेताओं अनिल बनिया और दिवाकर दंगल ने साफ कहा कि यह आंदोलन संविधान के खिलाफ नहीं है बल्कि संसद और मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ है। अनिल बनिया ने कहा, “हमने शांतिपूर्ण विरोध की अपील की थी, लेकिन हिंसा और आगजनी उन राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने की जिनका उद्देश्य आंदोलन को बदनाम करना था।” उनका मानना है कि पिछले कई दशकों से सत्ता में बैठे बुजुर्ग नेताओं ने न तो जनता की आकांक्षाओं को पूरा किया और न ही देश को स्थिरता दी। इसीलिए युवाओं ने मजबूरी में सड़कों पर उतरकर विरोध दर्ज कराया। दिवाकर दंगल ने यह स्वीकार किया कि अभी Gen-Z पूरी तरह परिपक्व नहीं है और नेतृत्व संभालने के लिए उन्हें समय चाहिए। उन्होंने कहा कि कई ताकतें उन्हें तोड़ने और आपस में बांटने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन उनकी पीढ़ी एकजुट रहकर बदलाव की लड़ाई जारी रखेगी।

अंतरिम प्रधानमंत्री की तलाश

सबसे बड़ी चुनौती इस समय नेपाल में अंतरिम प्रधानमंत्री के चयन की है। बुधवार को हुए तख्तापलट के बाद आर्मी और Gen-Z नेताओं के बीच लगातार बातचीत चल रही है। गुरुवार सुबह खबर आई कि पूर्व चीफ जस्टिस सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाने पर सहमति बन गई है। कार्की नेपाल की पहली महिला चीफ जस्टिस रह चुकी हैं और उनकी छवि ईमानदार व सख्त न्यायाधीश की रही है। लेकिन दोपहर तक हालात बदल गए। ‘लाइट मैन’ के नाम से मशहूर नेपाल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी के पूर्व प्रमुख कुलमान घीसिंग का नाम भी सामने आया। घीसिंग को नेपाल में बिजली संकट दूर करने के लिए जाना जाता है और युवाओं में उनकी बड़ी लोकप्रियता है। इस तरह अब तक अंतरिम प्रधानमंत्री के नाम पर सहमति नहीं बन पाई है।

सेना और Gen-Z के बीच बातचीत

नेपाल आर्मी इस पूरे घटनाक्रम में निर्णायक भूमिका निभा रही है। आर्मी मुख्यालय में लगातार बैठकें हो रही हैं, जिनमें Gen-Z नेताओं को भी बुलाया जा रहा है। सेना का मकसद देश में शांति और स्थिरता बहाल करना है, लेकिन वह किसी भी कीमत पर अराजकता को बढ़ने नहीं देना चाहती। इसी वजह से राजधानी काठमांडू और आसपास के इलाकों में तीसरे दिन भी कर्फ्यू जारी रखा गया है।

हिंसा और जनहानि

हालात कितने गंभीर हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अब तक की हिंसा में 34 लोगों की मौत हो चुकी है और 1300 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। अस्पतालों में घायलों की लंबी कतार है और सुरक्षा बल लगातार चौकसी में लगे हुए हैं। नेपाल का लोकतंत्र इस समय सबसे कठिन मोड़ पर खड़ा है। अगर सेना, Gen-Z और सिविल सोसाइटी मिलकर शांति और स्थिरता की राह निकालने में सफल रहते हैं तो यह देश के भविष्य के लिए एक नई शुरुआत होगी।

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