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ग़ज़ल

Jaipur

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हमको  तुम्हारी  याद  में  ग़म  कौन   देता  है

तसल्लियां   मुझको   हर – दम  कौन  देता है

सपनों  की   धूप-छाँव   में  जीते   रहे   सनम

शान   से  जीने   की   क़सम    कौन  देता  है

उलझी   हुई   ज़ुल्फ़ – ए – ग़म   और   आरज़ू

फिर   ख़ुश  भी  होने  का  वहम कौन  देता है

साहिल  पे  आके   टूट  गईं  कश्तियाँ  तमाम

तूफां   में   हौसलों   को   दम    कौन  देता  है

रह-रह  के  दिल  में   गूंजते   हैं  गीत  तुम्हारे

गीतों  को  मोहब्बत  में   जनम  कौन  देता है

हर  सोच  के आखिर  में  तो  हंगामे  खड़े  हैं

फिर भी क़लम  को जान-ए-हरम कौन देता है

सच   पूछिए   तो   कह   नहीं   पाएंगे    कभी

नाज़ुक सी शै को  ज़ुल्मो सितम कौन देता है

फ़ज़लुर्रहमान

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