लाल किले से पहली बार आरएसएस का जिक्र
कांग्रेस-आरजेडी ने साधा निशाना
नई दिल्ली। स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बार अपने संबोधन में एक ऐसा उल्लेख किया, जो 79 सालों के इतिहास में पहली बार हुआ। उन्होंने अपने 103 मिनट के भाषण के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का जिक्र करते हुए उसके 100 साल पूरे होने पर बधाई दी और उसके योगदान की सराहना की। प्रधानमंत्री ने कहा – “आज गर्व के साथ मैं इस बात का जिक्र करना चाहता हूं कि 100 साल पहले एक संगठन आरएसएस का जन्म हुआ। 100 साल की राष्ट्र सेवा गौरवपूर्ण है। आरएसएस ने व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण के संकल्प को लेकर मां भारती के कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित किया। सेवा, समर्पण, संगठन और अप्रतिम अनुशासन जिसकी पहचान रही है, ऐसा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दुनिया का सबसे बड़ा NGO है।” यह बयान उस ऐतिहासिक मौके पर आया जब प्रधानमंत्री लगातार 12वीं बार लाल किले से झंडा फहरा रहे थे। लेकिन इस बार उनके भाषण में आरएसएस का ज़िक्र होना राजनीतिक हलकों में बहस का बड़ा मुद्दा बन गया।
कांग्रेस का तीखा हमला
प्रधानमंत्री के भाषण पर कांग्रेस ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि मोदी ने आरएसएस का नाम केवल उन्हें खुश करने के लिए लिया। उन्होंने कहा – “प्रधानमंत्री अब पूरी तरह उनके भरोसे हैं। सितंबर के बाद जब वे 75 साल के हो जाएंगे, तो पद पर बने रहने के लिए मोहन भागवत की मदद पर निर्भर हैं।” जयराम रमेश का यह बयान उस राजनीतिक पृष्ठभूमि की ओर इशारा करता है जिसमें भाजपा के भीतर और बाहर अक्सर यह चर्चा होती रही है कि पार्टी में शीर्ष नेतृत्व का प्रभाव किस हद तक संघ की मंजूरी पर आधारित है।
RJD की आलोचना – “फर्क करना मुश्किल”
वहीं, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता मनोज झा ने भी प्रधानमंत्री पर तंज कसा। उन्होंने कहा – “प्रधानमंत्री हर बार निराश करते हैं। RSS एक सांस्कृतिक संगठन है, आजादी में उसकी भूमिका का मूल्यांकन देश के प्रधानमंत्री को करना चाहिए। आज फर्क करना मुश्किल हो गया है कि यह भाषण देश के लिए है या चुनावी रैली के लिए।” मनोज झा का यह बयान न केवल प्रधानमंत्री की शैली पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि विपक्ष को लगता है कि स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय अवसर का राजनीतिकरण हो रहा है।
पहली बार लाल किले से आरएसएस का नाम क्यों?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, प्रधानमंत्री का लाल किले से आरएसएस का नाम लेना कई मायनों में महत्वपूर्ण है। राजनीतिक संदेश – भाजपा और संघ के संबंध किसी से छिपे नहीं हैं, लेकिन लाल किले से सीधे नाम लेकर यह संदेश दिया गया कि पार्टी अपने वैचारिक स्रोत पर गर्व करती है। संगठन के 100 साल – आरएसएस की स्थापना 1925 में हुई थी और 2025 में उसके 100 साल पूरे हो रहे हैं। संभव है कि यह उल्लेख उसी ऐतिहासिक पड़ाव की भूमिका हो। वोट बैंक और वैचारिक मजबूती – आने वाले चुनावों से पहले संघ से जुड़ा भावनात्मक जुड़ाव भाजपा के लिए लाभकारी हो सकता है।
विपक्ष की रणनीति
विपक्ष इसे एक अवसर के रूप में देख रहा है ताकि वह प्रधानमंत्री पर यह आरोप लगा सके कि वे राष्ट्रीय मंच का इस्तेमाल राजनीतिक प्रचार के लिए कर रहे हैं। कांग्रेस और RJD जैसे दल यह सवाल उठा रहे हैं कि स्वतंत्रता दिवस के भाषण में किसी संगठन का नाम लेना क्या उचित है, खासकर तब जब वह संगठन राजनीतिक और वैचारिक रूप से सत्ताधारी दल से जुड़ा हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस भाषण ने स्पष्ट कर दिया कि 2024 के बाद का राजनीतिक परिदृश्य केवल नीतियों और विकास के वादों से तय नहीं होगा, बल्कि वैचारिक पहचान और संगठनात्मक जुड़ाव भी अहम भूमिका निभाएंगे। लाल किले से आरएसएस का नाम लेना जहां भाजपा और उसके समर्थकों के लिए गर्व का विषय है, वहीं विपक्ष के लिए यह नया हमला बोलने का मौका है।
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