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एंटी टोबैको डे पर जानिए इतिहास से लेकर विज्ञान तक की पूरी कहानी

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एक मिनट में जांचिए फेफड़ों की सेहत: पैसिव स्मोकिंग से होती हैं मर्डर से ज्यादा मौतें

लेखक: सलमान पठान


पैसिव स्मोकिंग से हर साल 13 लाख मौतें, मर्डर से ज्यादा खतरनाक

दुनियाभर में हर साल लगभग 12.5 लाख लोग मर्डर के शिकार होते हैं, लेकिन इससे भी ज्यादा – करीब 13 लाख लोग पैसिव स्मोकिंग की वजह से अपनी जान गंवा देते हैं। पैसिव स्मोकिंग यानी जब कोई व्यक्ति खुद धूम्रपान न करे, लेकिन आसपास कोई स्मोकिंग कर रहा हो तो वह धुएं के ज़रिए निकोटिन और अन्य ज़हरीले रसायनों के संपर्क में आ जाता है।

आज 31 मई, वर्ल्ड एंटी टोबैको डे है। इस मौके पर हम स्मोकिंग नहीं, पैसिव स्मोकिंग के गंभीर और अक्सर नजरअंदाज किए गए खतरों पर बात करेंगे।


क्या आप पैसिव स्मोकिंग की चपेट में हैं? सिर्फ एक मिनट में जानिए

एक मिनट का एक साधारण टेस्ट आपकी फेफड़ों की ताकत को जांच सकता है। कई वैश्विक स्वास्थ्य संस्थान यह सलाह देते हैं कि कोई स्वस्थ व्यक्ति कम से कम 30 से 40 सेकेंड तक अपनी सांस रोक सकता है।

टेस्ट:

  • एक गहरी सांस लीजिए

  • स्टॉपवॉच चालू कीजिए

  • सांस रोके रहिए

  • देखिए, आप कितनी देर रुक पाए?

अगर आप 20 सेकेंड से पहले ही सांस छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं, तो आपके फेफड़े कमजोर हो सकते हैं – और इसका एक कारण आपके आसपास का धूम्रपान हो सकता है।


स्मोकिंग पर जहांगीर का बैन: इतिहास की पहली चेतावनी

कहा जाता है कि मुग़ल सम्राट जहांगीर ने भारत में पहली बार सार्वजनिक रूप से स्मोकिंग पर प्रतिबंध लगाया था। 17वीं सदी में तंबाकू का चलन यूरोप से भारत आया और जल्द ही इसकी लत फैलने लगी। जहांगीर ने जब इसके दुष्प्रभाव देखे तो इसके उत्पादन और बिक्री पर रोक लगाई।

यह निर्णय उस युग में लिया गया, जब विज्ञान के पास आज जितने प्रमाण नहीं थे – यानी सदियों पहले भी धुएं के खतरे को समझा गया।


1843 में आई सिगरेट मशीन, पर पैसिव स्मोकिंग को समझने में लगे 150 साल

फ्रांस में 1843 में पहली सिगरेट बनाने की मशीन बनी और 1885 तक ऐसी मशीने हर मिनट में 200 सिगरेट बनाने लगीं। विज्ञापन कंपनियों और तंबाकू लॉबी के दबाव के कारण इस खतरनाक आदत के विरुद्ध रिपोर्टिंग को दबा दिया गया।

1990 तक पैसिव स्मोकिंग को गंभीर खतरे के रूप में नहीं पहचाना गया था। यही वजह है कि इससे पहले न सरकारें सतर्क हुईं और न जनता।


कुत्तों पर किया गया पहला टेस्ट: 36 सिगरेट्स का धुआं और 5 दिन में असर

1968 में अमेरिका के हेल्थ डिपार्टमेंट ने पैसिव स्मोकिंग पर पहली बार वैज्ञानिक परीक्षण किया। कुत्तों को दिन में 36 सिगरेट्स के धुएं में रखा गया। केवल 5 दिन में उनमें थकावट, सांस की तकलीफ और पैरों में सूजन जैसे लक्षण देखे गए।

हालांकि यह परीक्षण मानवों पर नहीं हुआ था, लेकिन इससे यह साफ हो गया था कि तंबाकू का धुआं बिना पीने वाले को भी बीमार बना सकता है।


न्यूक्लियर हादसा बना पैसिव स्मोकिंग रिसर्च की वजह

1979 में अमेरिका के थ्री माइल आइलैंड न्यूक्लियर प्लांट में हादसे के बाद रेडॉन गैस के फैलाव पर रिसर्च शुरू हुई। जांच में यह पाया गया कि घरों में मौजूद तंबाकू का धुआं, रेडियोएक्टिव गैसों से कहीं ज्यादा खतरनाक है।

1990 और 1992 की रिपोर्ट्स में पैसिव स्मोकिंग को कैंसर और शिशु मृत्यु जैसी गंभीर बीमारियों का जिम्मेदार बताया गया।


सिगरेट का धुआं: 7000 से ज्यादा केमिकल्स का ज़हर

एक बिना जली सिगरेट में 3000 से अधिक रसायन होते हैं। जब वह जलती है, तो इनकी संख्या 7000 से भी ज्यादा हो जाती है। इन रसायनों में से कई कार्सिनोजेनिक (कैंसरकारी), हार्मफुल मेटल्स और जहरीले गैस शामिल होते हैं – जैसे:

  • निकोटिन: दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर बढ़ाता है

  • कार्बन मोनोऑक्साइड: ऑक्सीजन के अवशोषण को रोकता है

  • टार: फेफड़ों में जमकर सांस लेने की क्षमता कम करता है


अमेरिका में कानून बनने में लगे 17 साल

1992 में अमेरिकी EPA ने पहली रिपोर्ट में स्वीकार किया कि पैसिव स्मोकिंग जानलेवा है। लेकिन इसके बाद भी कानून बनने में 17 साल लग गए। 2009 में ओबामा सरकार ने ‘The Family Smoking Prevention and Tobacco Control Act’ पास किया, जिसके तहत:

  • 21 साल से कम उम्र को सिगरेट बेचना प्रतिबंधित

  • स्कूलों, प्लेग्राउंड्स के पास बिक्री पर रोक

  • सिगरेट पैकेट पर बड़ी चेतावनी

  • स्पॉन्सरशिप और विज्ञापन पर पाबंदी


भारत में अब तक क्या हुआ?

भारत ने 1975 में सिगरेट एक्ट लागू किया, लेकिन पैसिव स्मोकिंग पर सख्ती 2000 के बाद शुरू हुई:

  • 1990: सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान पर रोक

  • 2003: सभी तंबाकू उत्पादों पर चेतावनी अनिवार्य

  • 2005: WHO के फ्रेमवर्क के तहत पिक्टोरियल चेतावनी

  • 2019: ई-सिगरेट्स पर प्रतिबंध


भारत में 26 करोड़ तंबाकू सेवन करने वाले, हर दूसरा व्यक्ति बीड़ी-सिगरेट का सेवन करता है

WHO के अनुसार भारत तंबाकू सेवन करने वाले देशों में दूसरे नंबर पर है। यहां लगभग 26 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में तंबाकू का उपयोग करते हैं, जिनमें से आधे लोग धूम्रपान करते हैं।

यह आंकड़ा सिर्फ स्मोकर्स तक सीमित नहीं है। इनके कारण करोड़ों लोग पैसिव स्मोकर बन जाते हैं – जिन्हें धुआं तो मिलता है, लेकिन चेतावनी नहीं।


निष्कर्ष: खुद को बचाइए, दूसरों को भी

पैसिव स्मोकिंग सिर्फ एक आदत नहीं, बल्कि एक धीमा ज़हर है जो न सिर्फ आपके फेफड़ों को, बल्कि आपके बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को भी नुकसान पहुंचाता है।

अगर आप स्मोकिंग करते हैं –

  • सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान न करें

  • घर के अंदर स्मोकिंग से बचें

  • धूम्रपान छोड़ने की पहल करें

और अगर आप स्मोकर नहीं हैं –

  • ऐसे स्थानों से दूर रहें

  • घर और ऑफिस में ‘नो स्मोकिंग ज़ोन’ बनाएं

  • दूसरों को जागरूक करें


यह सिर्फ आज की चेतावनी नहीं है, ये आने वाली पीढ़ियों के लिए जिम्मेदारी है।

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