क्या आरएसएस की विचारधारा से चलेगा देश ?
भारत का सबसे मजबूत सामाजिक, राजनीतिक एवं धार्मिक संगठन आरएसएस ने 27 सितम्बर 2025 को 100 वर्ष पूरे कर लिए। आरएसएस की स्थापना 27 सितंबर 1925 को डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। आरएसएस बनाने का मुख्य उद्देश्य हिंदूत्व की स्थापना है। हिंदूत्व के अनुसार समाज में जाति व्यवस्था एवं वर्ग व्यवस्था की स्थापना है। आरएसएस एक ऐसा संगठन है जिसने धीरे-धीरे लेकिन सतत रूप से विकास किया है। हालांकि आरएसएस ने राजनीति, धार्मिक, आर्थिक एवं शिक्षा के क्षेत्र में मजबूत पकड़ बनाई है। आरएसएस अपनी राजनीति शाखा भाजपा के द्वारा भारत पर शासन कर रहा है। आरएसएस का मुख्यालय स्थापना से लेकर अब तक नागपुर में ही रहा है। भाजपा में कोई भी नेता बिना आरएसएस की मर्जी के नहीं रह सकता है। आरएसएस देश में शताब्दी वर्ष मना रहा है और आरएसएस की स्थापना के उद्देश्य लोगों को बतायें जा रहे हैं। वर्तमान में आरएसएस हिंदू समाज को एकजुट करने के प्रयास कर रहा है। सभी जातियों के लिए एक शमशान, एक कुआं के प्रचलन लाकर जातिवाद समाप्त करने की ओर अग्रसर है। दूसरी तरफ आरएसएस सभी जातियों को साथ रखना चाहता है लेकिन सत्ता की चाबी कुछ वर्ग की जातियों के पास रखना चाहता है। यदि आरएसएस हिंदूत्व के एजेंडे पर चलता है तो निम्न जातियों के लिए बराबरी का सम्मान मिलना आसान नहीं होगा। आरएसएस की मजबूती के पीछे उसका देश भर में फैला शाखाओं का नेटवर्क है। देश में आरएसएस की लाखों शाखाएं लगती हैं। शाखाओं के जरिए पूरे देश पर नियंत्रण रखने और जानकारी प्राप्त करने में उसे आसानी होती है। आरएसएस यदि अपना एजेंडा पूरी तरह लागू किया तो वर्तमान संविधान बदलना भी उसके लिए जरूरी होगा। क्योंकि भारत का वर्तमान संविधान आरएसएस के एजेंडे को लागू करने में सबसे बड़ी रुकावट है। क्योंकि संविधान में विभिन्न जातियों को आरक्षण का प्रावधान है। आरक्षण के कारण हिंदू समाज कभी एक नहीं हो सकता है। आरएसएस की मंशा के खिलाफ आरक्षित जातियां भविष्य में उससे शासन छीन सकती है। आरएसएस को असली ताकत देश के मुसलमानो के विरोध के कारण मिलती है। लेकिन मुस्लिम समाज अब आरएसएस के मुकाबले में काफी कमजोर दिखाई देता है। फिर भी देश में सत्ता में बने रहने के लिए आरएसएस मुसलमानो एवं कुछ अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों पर दबाव बनाए रखता है। लेकिन हिंदू समाज में भी 100 वर्ष बाद पहली बार आरएसएस का बड़ा विरोध दिखाई देने लगा है। आरक्षित जातियों में आरएसएस की पकड़ ढीली पड़ने लगी है। आरक्षित वर्ग के लोग खुलकर आरएसएस का सड़कों पर उतरकर विरोध करने लगे हैं। साफ दिखाई दे रहा है कि देश में दो विचारधाराए हैं। जिनमें एक आरएसएस की विचारधारा और दूसरी आरएसएस के विरोध की विचारधारा। यदि लोकतंत्र देश में मजबूत होता है, तो आरएसएस की विचारधारा कमजोर हो सकती है। यदि लोकतंत्र कमजोर या समाप्त होता है तो आरएसएस के विचारधारा का ही देश में बोलबाला रहेगा।
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