जिहाद का विरोध क्यों?
मौलाना मदनी बोले- ‘अन्याय हुआ तो जिहाद होगा’, जानें असली मतलब
मौलाना के बयान पर विवाद — मीडिया और संगठनों पर उठाए सवाल
जयपुर (रॉयल पत्रिका)। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी का एक बयान, जिसमें उन्होंने कहा था कि “यदि अन्याय हुआ तो जिहाद होगा”, इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। देश के कुछ संगठनों ने मौलाना मदनी के इस बयान की तीव्र आलोचना शुरू कर दी है।
‘जिहाद’ शब्द का अर्थ और गलतफहमी
भारत में कुछ संगठनों और व्यक्तियों ने “जिहाद” शब्द का अर्थ ही बदल कर रख दिया है। ऐसे लोग “जिहाद” का मतलब हिंसा और मारकाट से निकालते हैं, जिससे आम लोगों में डर, भय और अविश्वास पैदा होता है।
इसकी तुलना स्वतंत्रता संग्राम से की जा सकती है। स्वतंत्रता के समय देश की आजादी के लिए लड़ने वालों को हम शहीद, स्वतंत्रता सेनानी और देश-भक्त मानते थे, जबकि अंग्रेज उन्हें आतंकवादी मानते थे और उन्हें गोली मार देते थे या जेल में डाल देते थे।
इस्लामिक परम्परा में “जिहाद” का मूल अर्थ है:
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अन्याय और बुराई के खिलाफ नैतिक संघर्ष।
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समाज में सुधार लाने की कोशिश।
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स्वयं पर काबू पाना (नफ्स से जिहाद)।
मीडिया और संदर्भ का खेल
आम मीडिया और पॉप कल्चर में इसे अक्सर सिर्फ हिंसक संघर्ष के रूप में पेश किया गया है। भारतीय मीडिया में जिहाद को लेकर अनावश्यक बहस की गई। यदि देश में कोई नेता या विद्वान इस शब्द का उपयोग उसके धार्मिक या नैतिक अर्थ में करता है, तो उसे तुरंत नकारात्मक रूप में ले लिया जाता है।
कई बार मीडिया में बयान का एक छोटा हिस्सा ही हाईलाईट किया जाता है और उसका संदर्भ (Context) नहीं दिखाया जाता, जिससे शब्द का अर्थ बदल जाता है। इससे भ्रम और भय बढ़ते हैं। लोग कुछ सेकंड का क्लिप देखकर पूरा संदेश समझने के बजाय पहले से बने नज़रिये के आधार पर राय बना लेते हैं।
मौलाना मदनी की सफाई: संविधान के दायरे में संघर्ष ही जिहाद
मौलाना मदनी ने स्पष्ट किया कि जिहाद एक पवित्र और धार्मिक अवधारणा है, लेकिन आज इसे जानबूझकर हिंसा और आतंक से जोड़कर पेश किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि कुरान में जिहाद के कई मायने हैं, सिर्फ लड़ाई नहीं। इनमें से एक प्रमुख अर्थ है- अन्याय, अत्याचार और दमन के खिलाफ संघर्ष करना तथा समाज या इंसानियत की भलाई के लिए कोशिश करना।
मौलाना मदनी के संदेश का मूल सार था कि ‘जहां अन्याय होगा, वहां जिहाद होगा।’ यानी अगर कहीं अन्याय, दमन या सामाजिक न्यायहीनता हो, तो उसका विरोध करना और उसके खिलाफ आवाज उठाना ही असली जिहाद है।
हिंसा नहीं, कानूनी लड़ाई
अगर किसी व्यक्ति या समुदाय को देश में, समाज में और न्याय-व्यवस्था में अन्याय मिला हो, तो अपने अधिकारों की रक्षा करना ही जिहाद है। लेकिन मदनी ने यह भी स्पष्ट किया कि यह जिहाद हिंसा या आतंक के नाम पर नहीं हो सकता। भारत जैसे लोकतांत्रिक मुल्क में यह संघर्ष ‘कानून और संविधान’ के दायरे में रहकर ही होगा।
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