परम्परा के नाम पर मेवाड़ क्यों ढ़ो रहा है गुलामी की निशानी को ?
-डॉ. श्याम सुन्दर बैरवा, भीलवाड़ा
हाल ही में दिनांक 27 मार्च 2025 को माण्डल, भीलवाड़ा में रंग तेरस पर नाहर नृत्य का हर साल की तरह आयोजन किया गया, जिसमें मुख्य अतिथि उप मुख्यमन्त्री माननीय डॉ. प्रेमचन्द बैरवा और कार्यक्रम के अध्यक्ष स्थानीय विधायक श्री उदयलाल भडाना रहे। माण्डल के नाहर नृत्य के बारे में बताया जाता है कि मेवाड़ में सन्धि करने आए मुगल शहजादा खुर्रम (शाहजहाँ) का काँरवा माण्डल से गुजरा तो माण्डल के तालाब के किनारे महल बना कर कुछ समय यहाँ रहे। शहजादे और बेगमों के मनोरंजन के लिए यहाँ के स्थानीय कलाकारों ने शरीर पर रुई चिपकाकर शेर (नाहर) का स्वांग किया था। इस नृत्य को देखकर शहजादा खुर्रम खुश हुए और इसे जारी रखने के लिए पाराशर वंशजों को शाही पत्र भेंट किया। तब से ही यह नृत्य अनवरत जारी है। मेरा पूछना यह है कि मुगलों और मेवाड़ में कभी नहीं बनी। महाराणा साँगा से लेकर महाराणा राजसिंह तक लगभग हमेशा ही मेवाड़ और मुगलों में युद्ध चलते ही रहे। पूरी दुनिया में मेवाड़ अपनी आन, बान और शान के लिए जाना जाता रहा है, जहाँ जौहर और शाका हुए हैं। तत्कालीन समय शहजादे को खुश करने के लिए अपनी इच्छा से या जोर-जबरदस्ती से माण्डल के कलाकारों ने नाहर नृत्य किए होंगे। यह बात तो समझ में आती है। लेकिन शहजादे और उसके लवाज़मे के जाने के बाद ऐसी कौनसी मज़बूरियाँ आ पड़ीं, जिनके चलते नाहर नृत्य बाद में भी जारी रखना पड़ा ? अगर यह मान भी लिया जाये कि बादशाह बनने के बाद शाहजहाँ ने इस पर नजर रखी होगी, तो उसकी मृत्यु के बाद तो यह प्रथा समाप्त हो जानी चाहिए थी? मुगलों के बाद अंग्रेजों की सत्ता आई, देश राजे-रजवाड़ों, नवाबों- बादशाहों, ठाकुरों-जमीन्दारों और अंग्रेजों से आजाद भी हो गया, लेकिन तब भी यह गुलामी की प्रतीक प्रथा चालू क्यों है? अब न वो नवाब-बादशाह हैं, न राजे-रजवाड़े, न उनके राजपाट, फिर भी माण्डल, जो कि मेवाड़ का ही एक हिस्सा रहा था, आज भी इस प्रथा को ढोए जा रहा है, यह आश्चर्य है !! भाजपा सरकार, जो चुन-चुन कर गुलामी की निशानियों को हटा रही है, शहरों के नाम बदल रही है, सड़कों के नाम बदल रही है, उसका इस कार्यक्रम में शामिल होना भी आश्चर्य है।
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