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मुसलमानों का हितैषी कौनसा राजनीतिक दल है?

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  • क्या मुस्लिम लीडर अपनी कौम की फिक्र कर रहे हैं?

जयपुर, (रॉयल पत्रिका)। देश में मुसलमानों की आर्थिक स्थिति दिनों दिन खराब होती जा रही है। यही कारण है कि ज्यादातर मुस्लिम परिवार अपने बच्चों को या तो शिक्षा दिला ही नहीं पा रहे हैं या फिर जो थोड़ी बहुत शिक्षा दिला रहे हैं उनके बच्चों को उच्च शिक्षा मिलना मुश्किल होता जा रहा है। मात्र 5-10 प्रतिशत मुस्लिम परिवार के बच्चे ही उच्च शिक्षा प्राप्त कर पा रहे हैं। कम शिक्षा के कारण मुस्लिम युवा पीढ़ी को रोजगार के नाम पर मजदूरी या फिर कम सैलरी की प्राइवेट नौकरी ही मिल पा रही है। देश की स्वतंत्रता को करीब 78 वर्ष हो गए। इस पीरियड में मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर हो गई। गरीबी के कारण नगर निगम, नगर पालिका एवं निजी संस्थानों में साफ सफाई का काम मुस्लिम समुदाय के मजदूर करने लगे हैं। सरकारों की तरफ से मुस्लिम क्षेत्रों में सरकारी सुविधाओं का विस्तार बंद कर दिया गया है। मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में गंदगी, अतिक्रमण एवं अवैध निर्माण की भरमार है। रास्तों में अतिक्रमण और गंदगी के कारण आना जाना मुश्किल हो जाता है यही कारण है कि मुस्लिम क्षेत्रों में कोई व्यापारी एवं कारोबारी आना ही नहीं चाहता है। क्षेत्रों में कानून व्यवस्था की स्थिति इतनी कमजोर है कि यहां नशा खुलकर होने लगा है, अपराध बढ़ रहे हैं। राजनीतिक पार्टियों के लीडर फिर भी मुस्लिम जनता से वोट बैंक जैसा व्यवहार कर रहे हैं।

राजनीतिक पार्टियां:

देश की राजनीतिक पार्टियां मुसलमानों को सिर्फ वोट बैंक समझती हैं और केवल दो चार वकतव्य या भाषण मुसलमानों के पक्ष में देकर मुसलमान के वोट बैंक पर अधिकार समझती है। जबकि देश की एकमात्र पार्टी भाजपा ऐसी पार्टी है जो मुसलमानों के विरोध में रहती है और हिन्दुत्व को देश में बढ़ावा देने के नाम पर मुसलमानों का विरोध करना जरूरी समझती है। कांग्रेस ने देश पर करीब 50 वर्ष शासन किया है। कांग्रेस के शासन में मुसलमानों की हालत बदतर हो गई है। कांग्रेस पार्टी ने मुस्लिम समाज में कार्यकर्ता तो थोक के भाव पैदा किए लेकिन पहली पंक्ति की मुस्लिम लीडरशिप को करीब करीब समाप्त कर दिया। देश में मुसलमानों की समस्याओं की बात सभी कथित सेकुलर दल करते है। लेकिन यही दल जब सत्ता में आते हैं तो मुसलमानों को शिक्षा, रोजगार एवं विकास देना भूल जाते हैं। मुसलमानों की सोच देश में सिर्फ भाजपा को हराने के लिए मतदान करने की रह गयी है। अफसोस की बात है कि मुस्लिम समाज के सांसद, विधायक एवं अन्य पदाधिकारी मुस्लिम समाज की बुनियादी समस्याओं के लिए आवाज नहीं उठाते हैं। बल्कि राजनीतिक पार्टियों की तरह मुस्लिम समाज को सिर्फ अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करने की चाबी समझने लगे हैं। यही कारण है कि वर्तमान में जयपुर सहित मुस्लिम क्षेत्रों में सड़के, सफाई, बिजली, सीवर लाइन, स्कूल और हॉस्पिटलों की खस्ता हालत है।

मुस्लिम समाज क्या करें:

कांग्रेस की पिछली सरकार में करीब 9-10 मुस्लिम विधायक थे। कांग्रेस को सत्ता में लाने में मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा योगदान था। फिर भी फंड एलॉट होने के बाद जयपुर में बॉयज़ छात्रावास के लिए जमीन एलॉट होने के बाद भी निर्माण नहीं होने दिया। बाद में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सहमति से मुस्लिम वोटो से जीत कर अपनी राजनीति चमकाने वाले यूडीएच मंत्री शांतिधारीवाल ने छात्रावास के लिए जयपुर में दी गई जमीन निरस्त करदी। जयपुर के दो मुस्लिम विधायक कुछ नहीं कर सके। साथ में उन्होंने जयपुर में छात्रावास बनाने के लिए होने वाले आंदोलन को रोकने के प्रयास भी किए। कांग्रेस के राज में आरएएस के अलावा दूसरे कैडर से आईएएस बनने वालों में एक भी मुस्लिम आईएएस नहीं बना। जबकि पूर्व मुख्यमंत्री भैरो सिंह और श्रीमती वसुंधरा राजे के कार्यकाल में तीन आईएएस बने। कहने के लिए मुसलमान कांग्रेस को थोक के भाव वोट देता है। मुख्यमंत्री वसुंधरा के राज में कर्बला में हज हाउस के लिए जमीन एलॉट की गई। जबकि कांग्रेस मीरजी के बाग, एम आई रोड की जमीन जो वक्फ प्रॉपर्टी थी, वह भी वक्फ को नहीं दी गई। इसलिए मुसलमानों को अपने राजनीतिक फायदे के लिए फिर से सोचने की जरूरत है। मुसलमानों को अब राजनीतिक विकल्पों पर गौर करने की जरूरत है। राजस्थान में कांग्रेस, भाजपा और आरएलपी विकल्प है। किसी को समर्थन दें लेकिन शर्तों के आधार पर समर्थन देना चाहिए। जो पार्टी मुसलमानों को शिक्षा, रोजगार एवं विकास पर ध्यान दें उसी को समर्थन देना चाहिए, चाहे राजनीतिक दल छोटा हो या बड़ा। राजनीतिक पार्टियों को हारने और जिताने के खेल से अब मुसलमानों को बाहर आना चाहिए। यदि समुदाय अपनी राजनीतिक जागरूकता नहीं बढ़ाता है तो भविष्य में बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

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