हाशिये पर खड़े मुसलमानों के सामने रास्ते क्या है?
आज देश का मुसलमान राजनैतिक, सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिकरूप से हाशिये पर खड़ा है। उसे एक अंधेरी गुफा में धकेला जा रहा है।
आज देश का मुसलमान राजनैतिक, सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिकरूप से हाशिये पर खड़ा है। उसे एक अंधेरी गुफा में धकेला जा रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले समुदाय को अपना वजूद बचाने के लिए कौन से रास्ते पर आगे बढ़ना चाहिए। सवाल यह भी है कि क्या समुदाय और उनकी लीडरशिप का इस बात का अहसास है भी या नहीं कि कि आज पूरे समुदाय को हाशिये पर धकेल दिया गया है। और अगर अहसास है तो क्या उस लीडरशिप के पास इन हालातो से बाहर निकलने के कोई रास्ते हैं। सबसे पहले उन पहलूओं पर गौर करना जरूरी है कि समुदाय की यह हालत क्यों हुई। क्योंकि यह सब कुछ एक दिन में नहीं हुआ। समुदाय की इस हालात के लिए सभी पार्टियां जिम्मेदार हैं। 2014 से पहले तक राजनैतिक स्तर पर यह स्थिति थी कि मुसलमानों के वोटों के बिना केंद्र में किसी भी दल की सरकार बनना मुमकिन नहीं था। यानी मुस्लिम वोट एक निर्णायक भूमिका अदा करता था। लेकिन उस दौर में भी जो भी पार्टी सत्ता में थी। उसने मुसलमानों का इस्तेमाल तो किया। लेकिन उसके सामाजिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक विकास के लिए कोई प्रयास नहीं किये। यहां तक की लोकसभा और विधानसभा सीटों के सीमांकन में ऐसा खेल खेला गया कि मुसलमान अपने बूते कोई सीट आसानी से नहीं जीत सके। सीमांकन के नाम पर मुस्लिम वोटों का बंटवारा किया गया। और यह काम उन पार्टियों ने किया। जिन पार्टियों को मुसलमान वोट भी देता था और अपना हमदर्द भी समझता था। जिन पार्टियों को मुसलमान वोट देता था उन्होंने न केवल यह सीटों के सीमांकन का खेल खेला बल्कि सांप्रदायिक दंगों के जरिए उनकों आर्थिकरूप से पंगु भी बनाया। मसलन मेरठ और मुरादाबाद में पीतल का कारोबार मुसलमानों के पास था तो सांप्रदायिक दंगे करवा कर मुसलमानों को तबाह किया गया। भागलपुर और भिवंडी में कपड़े का कारोबार मुसलमानों के पास था तो वहाँ भी सांप्रदायिक दंगे करवाकर मुसलमानों को तबाह किया गया। ऐसे ही अलीगढ़ से तालों का और कानपुर से चमड़े का कारोबार मुसलमानों से छीना गया। यानी सबसे पहले उसे राजनैतिक तौर पर हाशिये पर धकेला गया और उसके बाद उसे आर्थिकरूप से बर्बाद किया गया और यह काम उन पार्टियों ने किया जिनकों मुसलमान वोट देता था और अपनी सबसे हमदर्द पार्टी समझता था। उसी तरह से मुसलमानों के शिक्षा के क्षेत्र में पीछे धकेला गया उसके शैक्षणिक पिछड़ापन को दूर करने के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए। उनकी आबादी में स्कूलों से ज्यादा थाने खोले गए। और मुसलमानों को खुश करने के लिए मदरसा बोर्ड बना दिए गए। दीनी तालीम की जरूरतें तो मुसलमान वैसे अपने द्वारा चलाये जा रहे मदरसों से कर रहा था उसकों जरूरत थी ऐसी उच्च श्रेणी की शिक्षा की जिसके जरिए उनके बच्चों को भी ऐसी श्रेष्ठ शिक्षा मिलती की प्रतिस्पर्धा के इस दौर में उसके बच्चे भी बाकी समुदाय के बच्चों का मुकाबला कर सकते और प्रशानिक सेवाओं में अपनी भागी दारी बना सकते। लेकिन मुसलमानों के वोटो से बनी सरकारों ने इस मामले में कुछ नहीं किया। अब बात करते 2014 के लोकसभा के चुनाव के नतीजों की क्योंकि इन चुनाव के नतीजौ ने ही मुसलमानों कों हाशिये पर धकेलने का काम बहुत तेजी से किया। इस चुनावी नतीजों ने साबित किया कि बिना मुसलमान वोटों के भी बहुमत से केंद्र में सरकार बनाई जा सकती हैं यानी 2014 से पहले जो मुस्लिम वोटो की अहमियत हुआ करती थी वह खत्म हो गई। और देश में हिंदुओं का एक बड़ा और निर्णायक वोट बैंक सामने आया। बहुसख्यकों का यह वोट बैंक ऐसा था जो मुसलमानों से नफरत की बुनियाद पर खड़ा हुआ था और इस बार सरकार बनी वह हर तरह से मुसलमानों का हासिये पर धकेल देना चाहती थी और उसने ऐसा किया भी। पूरे देश में मुसलमानो के खिलाफ नफरत का माहौल बनाया जाने लगा। कभी गाय के नाम पर, तो कभी लव जिहाद के नाम पर, तो कभी एनआरसी या कभी तीन तलाक कानून और कभी हिजाब के मुद्दे पर पूरे देश में मुसलमानो को अछूत सा बना दिया और इस नफरत से बहुसंख्या का ध्रुवीकरण किया गया। उसका नतीजा यह निकला कि बड़े-बड़े राज्यों की सरकारों में कोई मंत्री ही नहीं रहा क्योंकि जो पार्टी सत्ता में आई, उसको मुस्लिम वोट चाहिए थे और न ही मुसलमानो के विकास में उसकी कोई दिलचस्पी थी। इसका नतीजा यह निकला कि आज देश का मुसलमान पूरी तरह से हाशिये पर पहुंच गया। आज खुलेआम उसके पाकिस्तान भेजने के बयान आने लगे। उसके आर्थिक बहिष्कार करने का खुलेआम ऐलान होने लगा। मुसलमाने को कारोबार करने से रोकने के हर तरह के प्रयास खुलेआम होने लगे। यानि कि मुसलमाने को पूरी तरह से हाशिए पर धकेल दिया। अब उसकी पीड़ा को सुनने के लिए कोई निष्पक्ष प्रशासनिक व्यवस्था है और ना निष्पक्ष न्याय पालिका। अब ऐसे सवाल यह है कि मुसलमानो के सामने रास्ते क्या हैं कैसे वह इस अंधेरी गुफा से बाहर निकले, कैसे वह अब अपने वजूद को बचा ले और कैसे वह अपने संवैधानिक अधिकारों की हिफाजत करें। संविधान का अनुच्छेद 29 में 30 मुसलमानो को अपनी पसंद के तालीमी इदारे कायम करने की इजाजत देता है । मुसलमान अब तक इस संवैधानिक अधिकारों का सही से इस्तेमाल नहीं कर पाया है । इसलिए अब पूरे मुस्लिम समुदाय को अपने उच्च कोटि की शिक्षा देने वाले तालीमी इदारे कायम करने चाहिए । अगर उसके इन विचारों से उसके बच्चे उच्च कोटि की शिक्षा हासिल कर लें तो उनकी पचास फ़ीसदी समस्या हल हो सकती है, क्योंकि यदि उच्च कोटि शिक्षा प्राप्त बच्चे होंगे तो फिर इस प्रतिस्पर्धा के दौर में भी वह अपना मुकाम बना लेंगे और आने वाले कुछ सालों में हर जगह उसकी भागीदारी होगी। और जब उसकी भागीदारी बढ़ेगी तो उसकी आर्थिक स्थिति में भी सुधार आएगा और शिक्षित और आर्थिक रूप से मजबूत समुदाय को हाशिए पर धकेलना आसान नहीं होगा। दूसरा मुसलमानो को प्रयास करना चाहिए कि उसकी राजनीतिक भागीदारी बड़े उसके समुदाय से चाहे एमएलए या एमपी बने, लेकिन हर शहर में हर कस्बे में एक ऐसी लीडरशिप खड़ी करें जो समुदाय पर होने वाले जुल्म के खिलाफ सीना तानकर खड़ी हो जाए। अगर हर शहर और कस्बे में ऐसी लीडरशिप खड़ी हो जाए तो कैसी भी मुस्लिम विरोधी पार्टी की सरकार हो उसके लिए मुसलमानो पर जुल्म करना या हाशिए पर धकेलना आसान नहीं होगा। उसका अपना मजबूत कारोबार होगा तो इन तथाकथित मुसलमानो का आर्थिक बहिष्कार करने के ऐलान से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। शायर अल्लामा इकबाल का शेर- ” ए मुसलमान तीन बातों में है तेरी निजात, इल्म पढ़, दौलत कमा और दीन का पाबंद रह” इन हालातों से निपटने के लिए कहा गया था ।
–डॉ. एस. खान
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