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शादी और निकाह में क्या फ़र्क़ है?

Jaipur

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असल इसका जवाब है कि कोई फ़र्क़ नहीं होना चाहिए। लेकिन आज के वक़्त में आप देखेंगे कि अगर कोई ‘शादी’ लफ़्ज़ बोलता है, तो उसके ज़हन में आता है – बैंड, बाजा, बारात, बाराती, दहेज़, ये सब आता है। जब कोई कहता है ‘निकाह’, तो उसके ज़हन में आता है कि बस चंद लोग मस्जिद में बैठे हैं और सादगी के साथ ले आना।

सबकी शादी और निकाह, ये कोई अलग-अलग चीज़ नहीं है। फिर क्यों हमारे ज़हन में दो तरीके की बातें आती हैं? इसकी वजह है हमारा मुआशरा (समाज), वो मुआशरा जो अपने फैसले इस्लाम से हट कर करता है।

अगर हम नबी पाक (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सीरत देखें, आपने अपनी बेटी फ़ातिमा का निकाह हज़रत अली (रज़ि०) से किया। उसमें क्या हुआ? बस निकाह पढ़ाया, छुहारे बांटे और चंद तोहफ़ों के साथ अपनी बेटी को रुखसत कर दिया। इतनी आसान शादी!

लेकिन आज अगर हम देखें तो इन रस्मों-रिवाज़ के बिना हमारी नाक कट जाती है। बाप अपनी बेटी की शादी के लिए 10 लाख का लोन ले रहा है। बेटी की शादी के बाद वो सारी ज़िंदगी सूद के साथ लोन चुका रहा है। और दूसरी तरफ़ जो लोग दहेज़ लेते हैं, वो भी बेटी को तंग करते हैं, क्योंकि ज़ाहिर है वो लोग सुन्नत को मानने वाले नहीं हैं, तभी दहेज़ लिया। और उस बाप की बेटी दुःख पाती है, जिसमें हमें कई केस देखने को मिले, जिसमें आत्महत्या के केस भी सामने आए हैं।

अब इस सब में हमें क्या करना चाहिए? सबसे पहले, अगर आप लड़के वाले हैं तो आज से, अभी से अज़्म (संकल्प) करिए कि दहेज़ नहीं लेंगे, सादगी और सुन्नत तरीक़े पर निकाह करेंगे। और आप लड़की वाले हैं तो अज़्म करें कि पैसे वाला देखकर उसको लोन पर दहेज़ नहीं देंगे, बल्कि दीनदार घराने में निकाह करेंगे, चाहे वो ग़रीब ही क्यों न हो।   ( मुहम्मद सोहैल)

 

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