वक़्फ़ संपत्तियाँ समाज की भलाई के लिए हैं, विवाद के लिए नहीं– डॉ. मोहम्मद शोएब
जयपुर (रॉयल पत्रिका)। प्रदेश कांग्रेस सचिव डॉ. मोहम्मद शोएब ने कहा किवक्फ़ का प्रबंधन सिर्फ ज़मीन-पूंजी का मामला नहीं है, बल्कि हमारी धार्मिक स्वायत्तता, सामुदायिक आत्मसम्मान और संवैधानिक अधिकारों का सवाल है। वक्फ़ (संशोधन) अधिनियम, 2025 में जो बदलाव हुए हैं, वे मुसलमानों को स्वीकार्य नहीं हैं। AIMPLB ने इस निर्णय को “अपूर्ण और असंतोषजनक” करार दिया है क्योंकि अधिनियम की कई ऐसी धाराएँ अभी भी लागू हैं जो वक्फ़ संस्थाओं की स्वायत्तता को प्रभावित करती हैं और मुसलमानों को उनकी परंपराओं के अनुसार अपने धार्मिक और चैरिटेबल एन्डॉवमेंट्स (दान-सम्पत्तियों) को प्रबंधित करने से रोकती हैं। विशेष रूप से “वक्फ़-बाय-यूज़र” की धारणा को समाप्त करना, गैर-मुस्लिमों को वक्फ़ बोर्डों में शामिल करना, वक्फ़ संपत्तियों की मंजूरी एवं उनकी मान्यता के लिए सरकारी अधिकारियों की भूमिका बढ़ाना—ये कदम हमें लगते हैं कि मुसलमानों के धार्मिक अधिकारों और उनके इतिहास के बोझ के प्रति न्यायसंगत नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा कुछ प्रावधानों को फिलहाल स्थगित करना एक सकारात्मक कदम है—जैसे कि वक्फ़ संपत्तियों की रिकॉर्ड में जब तक अंतिम फैसला न हो, तब तक उन पर कोई कब्ज़ा या बदलाव नहीं हो सकेगा। लेकिन अधिनियम के अन्य प्रावधान अभी भी लागू हैं, जिनका दुरुपयोग होने का डर है। मुसलमानों की मांग है कि पूरा अधिनियम वापस लिया जाए और पुराना कानून बहाल हो। मुसलमान समुदाय के रूप में मेरा मानना है कि हमारा धर्म हमें इन दान की गई संपत्तियाँ के माध्यम से समाज सेवा करने का अवसर देता है, लेकिन जब सरकार ऐसी नीतियाँ बनाती है जो स्वतंत्र प्रबंधन और पारंपरिक दायरे को सीमित कर देती हैं, तो हमें संवैधानिक न्याय का सहारा लेना चाहिए। हम इस अधिनियम (Waqf Amendment Act 2025) का कड़ा विरोध करते हैं, क्योंकि यह क़ानून असंवैधानिक है और हमारे देश की एकता, संविधान तथा मौलिक अधिकारों के लिए खतरा पैदा करता है। इसीलिए, संविधान की रक्षा और अपने अधिकारों की सुरक्षा के लिए हम 11 अक्टूबर को जंतर-मंतर, दिल्ली में धरना देने जा रहे हैं। हमारा यह शांतिपूर्ण विरोध तब तक जारी रहेगा जब तक सरकार इस क़ानून को पूरी तरह वापस नहीं लेती। इसलिए हम शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से विरोध करेंगे। हमारा संघर्ष न्याय और अधिकारों के लिए है, न कि टकराव के लिए। वक्फ़ संस्थाएँ हमारी ढाल हैं, हमारी ज़मीन हैं, हमारी पहचान है—और इनमें हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए जब तक न्यायिक प्रक्रिया पूरी तरह से नहीं हो जाती।
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