उर्दू माध्यम स्कूलों को हिंदी माध्यम स्कूलों में मर्ज किया,विरोध शुरू
जोधपुर/अजमेर। राजस्थान की भाजपा सरकार द्वारा उर्दू माध्यम के विद्यालयों को हिंदी या अंग्रेजी में मर्ज करने के निर्णय के खिलाफ जोधपुर और अजमेर में व्यापक विरोध प्रदर्शन चल रहा है। हाल ही में सरकार ने जीरो एडमिशन और कम छात्रों वाले लगभग 450 स्कूलों को बंद या आस-पास के स्कूलों में समाहित करने का फैसला लिया है, जिसमें कई उर्दू माध्यम विद्यालय शामिल हैं। जोधपुर में बालिकाओं ने पुलिस की गाड़ी पर चढ़कर अपना विरोध दर्ज कराया, वहीं अब अजमेर में भी इसी तरह का आंदोलन देखने को मिल रहा है। वहां की कोट स्थित दो उर्दू स्कूलों को सामान्य स्कूलों में मर्ज करने के निर्णय ने स्थानीय समुदाय में असहमति पैदा कर दी है। कांग्रेस के पूर्व प्रत्याशी महेंद्र सिंह रलावता और अल्पसंख्यक विभाग के पदाधिकारियों ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को ज्ञापन सौंपकर इस कदम का विरोध किया है। उर्दू माध्यम के विद्यालयों में लगभग 300 छात्र-छात्राएं शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। रलावता ने कहा कि 1941 से चल रहे इन विद्यालयों को अचानक हिंदी माध्यम में मर्ज करना गलत है। उन्होंने सरकार से अपील की है कि उर्दू माध्यम विद्यालयों का अस्तित्व बनाए रखा जाए, अन्यथा यह छात्रों और उनके भविष्य पर नकारात्मक असर डालेगा। अभिभावकों का मानना है कि इस फैसले से उनके बच्चों की पढ़ाई और सांस्कृतिक पहचान पर गहरा असर पड़ेगा। कक्षा आठ में पढ़ने वाली बुशरा बानो ने बताया कि वह विषय ज्ञान उर्दू में ले रही हैं और परीक्षा में सामान्य विषय पर प्रश्न आने पर उन्हें कठिनाई होगी। शिक्षिका शबाना खान ने भी अपनी चिंता जाहिर की और कहा कि बच्चों के लिए उर्दू में पढ़ाई करना कठिनाई भरा होगा।
स्थानीय निवासियों और शिक्षकों ने मांग की है कि सरकार अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे। उन्होंने कहा कि यह केवल एक शैक्षणिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक पहचान और भाषाई अधिकार का प्रश्न भी है। अगर सरकार इस फैसले को वापस नहीं लेती, तो दुष्परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा। राजस्थान में उर्दू स्कूलों को हिंदी में तब्दील करने के खिलाफ उठता यह आंदोलन न केवल शिक्षा के अधिकार की बात कर रहा है, बल्कि यह सांस्कृतिक और सामाजिक साक्षरता का भी प्रश्न बनता जा रहा है। यदि सरकार ने जल्द ही इस मुद्दे का समाधान नहीं किया, तो यह मामला राजनीतिक विवाद का कारण बन सकता है।
1944 से चले रहे हैं उर्दू में स्कूल
राजकीय प्राथमिक उर्दू बालिका विद्यालय की शिक्षिका शबाना खान ने बताया कि वह सरकार के आदेश के साथ है। मगर उनके द्वारा शुरू से ही उर्दू विषय में बच्चों को पढ़ाया गया है। 1944 आजादी से पहले से ही उर्दू माध्यम में यह स्कूल चल रही है। पहले यह प्राइमरी स्कूल थी, जिसे क्रमोन्नत कर मिडिल बना दिया। अब उनके द्वारा पढ़ाए जा रहे बच्चों के सामने असमंजस की स्थिति है कि आने वाले बोर्ड परीक्षा में फॉर्म किस भाषा में भरा जाएगा।स्थानीय निवासियों, शिक्षकों और छात्रों की मांग है कि सरकार उर्दू माध्यम स्कूलों को मर्ज करने के निर्णय पर पुनर्विचार करे। यह केवल एक शैक्षणिक मुद्दा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और भाषाई अधिकार का सवाल है। यदि यह फैसला वापस नहीं लिया गया, तो यह राज्य में लंबे समय तक सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव डाल सकता है।1941 से चल रहे गवर्नमेंट प्राइमरी उर्दू स्कूल बड़बाव और गवर्नमेंट गर्ल्स हाई प्राइमरी उर्दू स्कूल समेत 8 स्कूलों में उर्दू को खत्म किया गया है और अब यहां हिंदी की तालीम दी जाएगी। इस सिलसिले में 17 जनवरी 2025 को डायरेक्टर सेकेंडरी एजुकेशन डिपार्टमेंट बीकानेर ने आदेश भी जारी किए हैं।
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