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ट्रंप टैरिफ ने दुश्मन देशो को भी एक मंच पर आने पर मजबूर किया

जयपुर

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भारत-पाकिस्तान युद्ध में चीन और तुर्की ने भारत के खिलाफ पाकिस्तान का साथ दिया था

-चीन में आयोजित एससीओ समिट में चीन, भारत, तुर्की, पाकिस्तान और ईरान के राष्ट्रीयाध्यक्ष एक साथ एक मंच पर दिखाई दिए

-प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पाकिस्तान, तुर्की के साथ नजदीकी देश के घरेलू मोर्चे पर परेशानी पैदा कर सकती है

जयपुर (रॉयल पत्रिका)। ट्रंप टैरिफ ने विश्व के देशों में हलचल पैदा कर रखी है। ट्रंप टैरिफ से विश्व के ज्यादातर देश भयभीत दिखाई दे रहे हैं। टैरिफ के मामले में एकमात्र चीन ही अमेरिका को बराबरी का जवाब देता है। लेकिन भारत ने पहली बार ट्रंप टैरिफ के विरोध में कड़े और मजबूत कदम उठाए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत से बहुत नाराज है। अमेरिका भारत को रूस से तेल खरीद कर यूक्रेन युद्ध में रूस की मदद करने वाला देश मानता है। दूसरी बात भारत ने भारत-पाकिस्तान युद्ध सीजफायर का क्रेडिट नहीं लेने दिया। यही कारण है कि ट्रंप ने मोदी से नाराज होकर 50% टैरिफ लगा दिया। ट्रंप टैरिफ से भारत को करीब 55-60 लाख करोड डॉलर का नुकसान हो सकता है। अमेरिका ने भारत को डराने और धमकाने की पूरी कोशिश की लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका के सामने झुकने के बजाय दुश्मन और पड़ोसी देश चीन, पाकिस्तान से दोस्ती करने की ठान ली है। भविष्य में चीन और पाकिस्तान से दोस्ती के क्या फायदे और नुकसान होंगे यह तो भविष्य में ही पता लगेगा लेकिन यह दोस्ती ईमानदारी से चलती है तो भारत को आर्थिक फायदा बहुत होगा। क्योंकि पड़ोसी देशों से व्यापार करना आर्थिक फायदा पहुंचा सकता है। साथ में सैन्य सामानों पर होने वाला खर्च काफी कम हो सकता है। सभी पड़ोसी देशों में विकास की गति तेज हो सकती है। भारत, चीन, रूस और ईरान का विश्व पटल पर एक साथ आना अमेरिका की बर्बादी की शुरुआत मानी जा सकती है। अमेरिका के लिए विश्व में व्यापार की सीमाएं सिमट सकती हैं।

चीन, भारत, पाकिस्तान और तुर्की दोस्ती की ओर-

भारत-पाकिस्तान में 7 से 10 मई 2025 को भयंकर युद्ध हुआ था। चीन, तुर्की और अज़रबेजान ने पाकिस्तान का एक तरफा साथ दिया था। भारत के एक सैन्य अधिकारी ने माना था कि पाकिस्तान की फौज हमारे सामने लड़ रही थी लेकिन चीन और तुर्की पीछे से लड़ रहे थे। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति और ट्रंप टैरिफ का डर इन सभी देशों को अपनी दुश्मनी से ज्यादा खतरनाक दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप सभी देशों को अपने इशारे पर चलाना चाहते हैं। अमेरिका के साथ चलने और उसकी बात मानने का मतलब है किसी देश का अपना स्वाभिमान गिरना और अमेरिका द्वारा विश्व में चल रहे गुप्त मिशनों और अभियानों में शामिल होना है। यदि मिशन और अभियान सफल होते हैं तो उसका फायदा सिर्फ अमेरिका को मिलता है। भारत एक स्वतंत्र देश है। भारत की 140 करोड़ जनसंख्या अमेरिका से डरने वाली नहीं है। विश्व में भारत तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनने जा रहा है। भारत की तरह पड़ोसी देशों को भी समझने की जरूरत है। फायदा सबको होगा।

मोदी की घरेलू मोर्चे पर परेशानी बढ़ सकती है-

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति और ट्रंप टैरिफ से तो मुकाबला कर सकते हैं लेकिन घरेलू मोर्चे पर उनकी परेशानी बढ़ सकती है। क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का देश में विराट हिंदूत्व शासक का चेहरा है। हिंदू संगठन और उनके कार्यकर्ता कभी नहीं चाहेंगे कि भारत, चीन, पाकिस्तान और तुर्की के साथ दोस्ती बढ़ाएं। पाकिस्तान से तो कुछ दिन पहले युद्ध हुआ है। पाकिस्तान और तुर्की मुस्लिम देश है। भारत में हिंदू संगठन मुसलमानो के विरोध में ही स्थापित हुए हैं। अब हिंदू संगठनों को मुसलमानो के साथ रहने और उनके साथ काम करने के लिए तैयार करना आसान नहीं है। वैसे हिंदू-मुस्लिम को साथ-साथ रहने मेलजोल बढ़ाने के लिए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी प्रयास कर रहे हैं। लेकिन हिंदू संगठनों और उनके कार्यकर्ताओं के लिए मुसलमानों के साथ रहने और मेलजोल बढ़ाने की बात मानना इतना आसान नहीं होगा। इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घरेलू मोर्चे पर आलोचना और विरोध सामने आ सकता है।

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