जयपुर में तीन दिवसीय तब्लीगी इज्तिमा का आयोजन
-इज्तिमा में उलेमाओं ने इस्लाम की पांच बुनियादी चीजों क़लमा, नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज की अहमियत बताई
– उलेमाओं ने कुरान को पढ़ने और उसके बताए रास्ते पर चलने की जरूरत बताई
12 काज़ियों ने 22 मिनट में 160 जोड़ों को निकाह करवाया
जयपुर (रॉयल पत्रिका)। कुरआन की तालीम को प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचाना चाहिए और कुरआन पढ़ने के साथ-साथ उसके बताए रास्ते पर चलने की जरूरत भी आवश्यकता है। जयपुर के कर्बला मैदान में शुक्रवार 15 नवंबर से सोमवार 17 नवम्बर तक आयोजित तीन दिवसीय दीनी तब्लीगी इज्तिमा में लाखों मुसलमानों ने शिरकत की। इस्लामी विद्वानों और स्कॉलर्स ने यह विचार व्यक्त किये।
उलेमाओं ने बताया कि प्रत्येक व्यक्ति की पहिचान उसके अखलाक (व्यवहार) से होती है। इसलिए घर, समाज और कारोबार हर जगह सादगी, ईमानदारी और नर्मी अपनाना जरूरी है। उलेमाओं ने इस्लाम की पांच बुनियादी चीजों (क़लमा, नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज) की अहमियत बताई। साथ ही कहा कि मुसलमान की जिंदगी इन्हीं सिद्धांतों पर टिकी है। इनका पालन करना हर मुस्लिम का फर्ज़ है।
उलेमाओं ने अपनी तकरीरों में बताया कि हमें दीन सिखाने के लिए अल्लाह ने अपने पैगम्बरों को दुनिया में भेजा और इंसानियत की सेवा का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि दीन-दुखियों की सेवा करने से बड़ी कोई सेवा नहीं है। अल्लाह के नबी मोहम्मद साहब ने इंसानियत के लिए जो अमल और अदब बताया है, उसे कबूल करो। खुदा को पहचानों, जिसने ये दुनिया, आसमान, हवा, जमीन और चांद समेत तमाम चीजें बनाई। इन सब सौगातों के लिए खुदा का शुक्रिया अदा करो। अन्य वक्ताओं ने लोगों से इल्म हासिल करने की अपील करते हुए कहा कि तालीम ही वह रास्ता है जो बेहतर इंसान बनाती है। उन्होंने बताया कि आज के दौर में सादगी से जीना और तालीम के लिए समय निकालना पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है।
12 काज़ियों ने 160 जोड़ों का निकाह करवाया
दीनी तब्लीगी इज्तिमा में दूसरे दिन रविवार को 160 जोड़ों का निकाह हुआ। मुफ़्ती सैयद अमजद अली के नेतृत्व में 12 काज़ियों ने 22 मिनट में 160 जोड़ों का निकाह करवाया।
मुफ़्ती साहब ने कहा कि इंसान अगर खुद पर गौर करे तो अल्लाह का शुक्र अदा करता रहेगा। इज्तिमा में निकाह करने वाले परिवारों का कोई फिजूल खर्च नहीं हुआ। इज्तिमा में निकाह होने से समाज में दहेज के चलन पर रोक लग सकती है। मुस्लिम समाज में आजकल दहेज़ का चलन कुछ ज्यादा ही चल रहा है। दहेज़ के कारण मुस्लिम परिवार कर्ज़दार हो रहे हैं। दहेज़ देने वाले परिवार झूठी शान के लिए कर्ज़ से पैसे लेते हैं और बाद में पूरी जिंदगी चुकाते रहते हैं।
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