जयपुर के महात्मा गांधी सरकारी स्कूल में बच्चों की पढ़ाई पर गंभीर संकट
सरकार की लापरवाही उजागर
स्कूल में छात्र मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री का नाम तक नहीं जानते
जयपुर (रॉयल पत्रिका)। जयपुर के सी-स्कीम, रेजिडेंसी, सरदार पटेल मार्ग स्थित महात्मा गांधी सरकारी स्कूल की स्थिति देखकर कोई भी हैरान रह जाएगा। यह स्कूल सन 1914 में अंग्रेज़ों के समय स्थापित किया गया था और कभी शिक्षा का प्रमुख केंद्र माना जाता था। लेकिन रॉयल पत्रिका की टीम की हालिया जांच में सामने आया कि इस स्कूल की शैक्षणिक गुणवत्ता, अनुशासन और बुनियादी सुविधाएं बच्चों के भविष्य के लिए गंभीर खतरा बन गई हैं।
प्रशासनिक विफलता और शिक्षकों की कमी
स्कूल प्रशासन और शिक्षक वर्ग की जिम्मेदारी पर बड़े सवाल खड़े होते हैं। वर्तमान में स्कूल की स्थिति कुछ इस प्रकार है:
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शिक्षकों की ड्यूटी: स्कूल में कुल 25 शिक्षक तैनात हैं, जिनमें से लगभग 12–15 शिक्षक बीएलओ (BLO) ड्यूटी में लगे हुए हैं।
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अनुपस्थिति: शिक्षक नियमित रूप से स्कूल नहीं आते या केवल नाम के लिए उपस्थित होते हैं, जिससे पढ़ाई पूरी तरह बाधित है।
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कमजोर निगरानी: प्रिंसिपल भावना मीना के नेतृत्व में प्रशासनिक निगरानी इतनी कमजोर है कि बच्चों का भविष्य अंधकार में है।
बुनियादी ज्ञान का अभाव
रॉयल पत्रिका की टीम ने जब 12वीं कक्षा के छात्रों से बातचीत की, तो चौंकाने वाली हकीकत सामने आई। छात्रों को प्रदेश के मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री का नाम तक नहीं पता था। अपनी ही पाठ्यपुस्तक के सामान्य सवालों के जवाब देने में भी छात्र असमर्थ रहे।
स्कूल के भीतर की जमीनी हकीकत
स्कूल में कुल 207 विद्यार्थी नामांकित हैं, लेकिन उनके बैठने और पढ़ने की व्यवस्था दयनीय है:
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मिश्रित कक्षाएं: कक्षा 1 से 5 तक के सभी बच्चों को एक ही कमरे में एक ही शिक्षक द्वारा पढ़ाया जा रहा है।
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अनुशासनहीनता: स्कूल परिसर में बच्चे बाइक पर स्टंट करते हैं और मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं। अनुशासन के अभाव में छात्र अक्सर क्लास छोड़कर भाग जाते हैं।
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परीक्षा का बोझ: विज्ञान और गणित जैसे विषयों के तीन दिवसीय पेपरों को शिक्षक बोझ कम करने के लिए केवल दो दिन में ही निपटा रहे हैं।
मिड-डे-मील और स्वच्छता की बदहाली
मिड-डे-मील योजना में बड़े घोटालों की खबरों के बीच जमीनी स्तर पर कोई सुधार नहीं दिख रहा है।
मिड-डे-मील की अव्यवस्था
स्कूल में भोजन परोसने के लिए कोई जिम्मेदार व्यक्ति मौजूद नहीं था। छोटे बच्चे खुद ही खाना निकालकर एक-दूसरे को परोस रहे थे। बच्चे जमीन पर मिट्टी में बैठकर भोजन करने को मजबूर थे।
गंदगी का अंबार
पूरे स्कूल परिसर में भारी गंदगी और कूड़ा-कचरा फैला हुआ है। सफाई कर्मचारियों की तनख्वाह मात्र ₹1500 प्रतिमाह है, जो व्यवस्था के प्रति सरकार की संवेदनहीनता को दर्शाती है।
जर्जर भवन और शिक्षा व्यवस्था की विफलता
रॉयल पत्रिका की जांच में सामने आया कि भवन की स्थिति अत्यंत जर्जर है। स्कूल के 8-10 कमरों में ताले लटके हुए हैं, क्योंकि वे बैठने लायक नहीं हैं।
निष्कर्ष और सवाल
यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि सरकारी शिक्षा तंत्र में तत्काल सुधार की आवश्यकता है। 207 विद्यार्थियों वाला यह ऐतिहासिक स्कूल आज प्रशासन की लापरवाही की भेंट चढ़ चुका है। बच्चों को मूलभूत नागरिक ज्ञान तक न मिल पाना हमारी शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता है। सवाल यह उठता है कि क्या इन स्थितियों में सरकारी स्कूलों में बच्चों का भविष्य सुरक्षित है?
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