जदीद चीज़ों का इस्तेमाल जाइज़ है।
जो आख़िरी पैग़म्बर के अहद-ए-मुबारक में नहीं थीं, न उनका रिवाज था, लेकिन ज़माने के हालात की तब्दीली की वजह से वो चीजें वजूद में आईं, और लोगों ने उनसे फाइदा उठाना शुरू कर दिया। मसलन आख़िरी पैग़म्बर के ज़माने में चक्की नहीं थी, आज हमारा चक्की के बगैर गुज़ारा नहीं होता। उस ज़माने में पंखे नहीं थे, आज हमारा पंखे के बगैर गुज़ारा नहीं। उस ज़माने में घोड़े और ऊंटों पर सफ़र होता था, आज मोटरों की, बसों की, रेलों और हवाई जहाज़ों की भरमार है, उनके बगैर गुज़ारा नहीं। लेकिन ये सब चीजें ऐसी हैं कि कोई उनको दीन का हिस्सा नहीं समझता, मसलन कोई शख़्स ये नहीं कहता कि पंखा चलाना सुन्नत है, कोई शख़्स ये नहीं कहता कि चक्की चलाना वाजिब है, और शरई ऐतबार से ज़रूरी है। कोई शख़्स ये नहीं कहता कि रेल में सफ़र करना सुन्नत या मुस्तहब है, या वाजिब है, लिहाज़ा कोई शख़्स उन चीजों को दीन का हिस्सा नहीं समझता, बल्कि ज़रूरतों को पूरा करने के लिए नए नए तरीक़े वजूद में आते रहते हैं, इस लिए शरीअत ने भी उन पर कोई पाबंदी नहीं लगाई, इन सब चीजों का इस्तेमाल करना शरअन जाइज़ है।
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