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देश के विभिन्न शहरों में धार्मिक पलायन की समस्या

Jaipur

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 “धार्मिक पलायन” का मतलब है, धार्मिक कारणों से किसी स्थान को छोड़ना या  किसी दूसरी जगह पर जाकर बसना। यह तब होता है जब लोग किसी विशेष धर्म या धार्मिक प्रथाओं के कारण उत्पीड़न, भेदभाव  या किसी अन्य प्रतिकूल परिस्थिति का सामना करते हैं, जिसके कारण उन्हें अपना घर  छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है।‌  लोकतंत्र में, क्षेत्र विशेष के राजनीतिक नेता वोटरों  के ध्रुवीकरण की दृष्टि से पलायन का माहौल बनाकर राजनीतिक लाभ उठाते हैं। धार्मिक आधार पर यह समस्या धीरे-धीरे पूरे देश में कमोबेश फैल रही है। धार्मिक पलायन के पीछे बहुत से कारण हो सकते हैं। प्रमुख कारणों में –

धार्मिक उत्पीड़न:  धार्मिक विश्वासों या प्रथाओं के कारण लोगों को प्रताड़ित किया जाता है,  या उनके साथ भेदभाव किया जाता है।

धार्मिक असहिष्णुता:  एक समुदाय या समाज में एक विशेष धर्म के प्रति असहिष्णुता का भाव होता है, जिससे उस धर्म के अनुयायियों के लिए जीवनयापन करना मुश्किल हो जाता है।

धार्मिक संघर्ष: विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच संघर्ष या दंगों की स्थिति में, लोग पलायन करने को मजबूर हो सकते हैं।

रोजगार-आपदा:   जब स्थानीय स्तर पर विशेष वर्ग के विरुद्ध आर्थिक बहिष्कार किया जाता है या प्राकृतिक अथवा अन्य कारणों से रोजगार के अवसर ना रहें तब रोजगार की तलाश में या प्राकृतिक विपदा की  स्थिति में भी  पलायन होता है, किन्तु यह धार्मिक पलायन नहीं कहलाता।

देश के विभिन्न क्षेत्रों में धार्मिक कारणों से पलायन की घटनाएं विगत वर्षों में तेजी से बढ़ी  हैं, जिसके पीछे राजनीतिक कारणों से इन्कार नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार राजस्थान भी, इस समस्या से अछूता नहीं रहा। राजस्थान में धर्म आधारित जनगणना वर्ष 2011 अनुसार कुल 6.85 करोड़ की जनसंख्या में से      हिन्दू धर्म को मानने वाले  88.49 प्रतिशत, इस्लाम धर्मावलंबी  9.07%  सिख धर्म के अनुयाई 1.27% जैन धर्म को मानने वाले  0.91% ईसाई धर्म के लोग 0.14%  बुद्ध धर्म के 0.02% और अन्य 0.01 प्रतिशत लोग थे। स्पष्ट है राज्य में अल्पसंख्यकों की जनसंख्या बहुत थोड़ी-सी है।

विगत वर्षों में एक राजनेता की बात करें तो उनके द्वारा जयपुर जैसे साम्प्रदायिक सौहार्द के शहर में माहौल को खराब करने की कई घटनाएं सामने आई हैं, उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई भी हुई है किन्तु राजनैतिक संरक्षण और विधायिकी के कारण निरन्तर विरोध के बावजूद शहर के माहौल को बिगाड़ने का प्रयास किया गया है। शहर के साम्प्रदायिक माहौल जो सदियों से बना हुआ है और आपसी भाईचारे की मिसाल रहा है और आज भी है, इस सौहार्दपूर्ण वातावरण को दूषित करने के प्रयास शहर में होने लगे हैं। किन्तु स्थानीय लोगों की समझ, प्रशासन की सजगता से साम्प्रदायिक सौहार्द को कई मौकों पर बिगड़ने से बचाया जा सका है।

जयपुर शहर के कई क्षेत्रों में धार्मिक पलायन की घटनाएं हुई हैं, जिसके तहत मोहल्लेवासियों के मकानों पर इश्तहार लगाया गया, पुलिस कार्यवाही भी की गई। सबसे दुःखद बात यह हुई कि इन सब में साम्प्रदायिकता आ गई। यानि सम्पत्ति एक वर्ग विशेष को नहीं बेचने देंगे और कई संगठन खड़े हो गये कि वर्ग विशेष के लोगों को मकान नहीं बेचने देंगे और अल्पसंख्यकों को नहीं खरीदने देंगे। यूट्यूब पर कई वीडियो इस संबंध में देखे जा सकते हैं और समाचार-पत्रों में भी पलायन को लेकर बहुत कुछ लिखा गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इन सब में भी वर्ग विशेष ही को नाना प्रकार से दोषी करार दिया गया। जबकि प्रशासन ने सभी शिकायतों को निराधार बताया या जांच करने की बात कही। उल्लेखनीय है कि शिकायतों में धर्म विशेष के लड़कों द्वारा लड़कियों से छेड़छाड़, गाड़ी-बाइक पार्किंग, शोर-शराबा जैसे आरोप प्रमुख रुप से लगाये जाते रहे हैं। एक ओर आरोप यह भी लगाया जाता रहा है कि वर्ग विशेष के लोगों की संख्या बढ़ जाने से उनका जीवन दूभर हो जाएगा, बकरी पालन के कारण परेशानियां होंगी आदि आदि। वस्तुत: जनसंख्या वृद्धि के कारण अल्पसंख्यक समुदाय के लोग बाजार भाव अनुसार या उच्च भावों पर मकान क्रय करने में रुचि रखते हैं और सम्पत्ति बेचने वाले अन्य धर्म के होने की स्थिति में राजनीतिक लाभ उठाने के लिए, वोटरों के ध्रुवीकरण करने के लिए पार्टी विशेष के राजनेता/संगठन  द्वारा तनाव की स्थिति पैदा कर दी जाती है। एमएलए/पार्षद और  राजनीतिक लोग इन मुद्दों को हवा देते हैं, घबराहट और असुरक्षा का माहौल बनता है। शहर की शांति प्रभावित होती है। जयपुर शहर के एक राजनेता एमएलए जब से एमएलए  बने हैं, तभी से अपने पांच-दस लोगों को लेकर मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में निकल जाते हैं और लोगों की भीड़ इकट्ठी कर के धर्म विशेष के विरुद्ध माहौल बनाकर राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयास करते हैं। उनके द्वारा अब तक कितने ही ऐसे काम किए गये, जो राष्ट्रीय स्तर पर भी समाचार-पत्रों, मीडिया में आ गए। उल्लेखनीय है कि जो काम प्रशासन का है वह स्वयं लोकसेवक को हाथ में नहीं लेना चाहिए और प्रशासन से करवाया जाना चाहिए। कोई काम गैर-कानूनी हो, लोगों की असुविधा का कारण हो, प्रशासनिक व्यवस्था का हो या अन्य जन हितकारी काम हो, जन प्रतिनिधियों को प्रशासन से करवाना चाहिए ना कि स्वयं मौके पर भीड़ जुटाकर माहौल बनाकर, धर्म विशेष के लोगों को प्रताड़ित, अपमानित किया जाना चाहिए। जन प्रतिनिधि सब जनता का होता है, एक एमएलए किसी क्षेत्र विशेष के सभी वर्गों का संवैधानिक रुप से जन प्रतिनिधि होता है, सभी धर्मों के लोगों का होता है, उसे सभी क्षेत्रवासियों की सुविधा देखनी चाहिए तभी सर्वाधिक विकास होता है और ऐसा राजनेता अत्यंत लोकप्रिय होता है।

विगत वर्षों में या यूं कहें कि वर्ष 2014 से देश की नई सरकार के गठन पश्चात भारतीय राजनीति में नये दौर का आगाज हुआ और धर्म की राजनीति का भी नया दौर शुरू हुआ। सभी जानते हैं कि धर्म विशेष के विरुद्ध बोलने से राजनीति में उच्च आयाम प्राप्त होते हैं, जिसके कई परिणाम सामने हैं। संभवतः इस बात को समझकर ही जयपुर और राज्य में कुछ लोगों द्वारा माहौल में साम्प्रदायिकता का ज़हर घोलने वाली साजिश का प्रयास समय-समय पर चुनाव को दृष्टिगत रखते हुए किया जाता है। यह समाज और राष्ट्र के हित में नहीं है। अपने राज्य के शहर के क्षेत्र के सभी पार्टियों के राजनेताओं से अपील करते हैं कि बच्चों के स्कूलों में उनकी पढ़ाई पर ध्यान देवें, टूटी-फूटी सड़कें ठीक करावें, नवयुवकों के लिए रोजगार की व्यवस्था करावें। आम जन के लिए अच्छी गुणवत्ता पूर्ण स्वास्थ, चिकित्सा की आवश्यकता पूर्ति करावें। सुदृढ़ राष्ट्र निर्माण करावें। राज्य  साम्प्रदायिकता की दृष्टि से शान्त और सौहार्द के वातावरण का बना रहे इस दिशा में कार्य करें। एमएलए को यह समझना चाहिए और राजनीतिक रुप से सौहार्दपूर्ण वाताव

रण बनाना चाहिए, जयपुर टूरिस्ट स्पॉट है और विश्व स्तर पर ख्याति प्राप्त है। यदि जयपुर में साम्प्रदायिकता बढ़ती है तो पर्यटन पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। जिससे यहां के घरेलू उद्योगों पर भी प्रतिकूल प्रभाव होगा और बेरोज़गारी बढ़ेगी।

-फ़ज़लुर्रहमान

   

 

 

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