अब्दुल मलिक बिन मरवान का आखिरी वक़्त:
सल्तनत और बेबसी की एक दास्तान
सत्ता का संघर्ष और खलीफा का उदय
अब्दुल मलिक बिन मरवान खानदान-ए-उम्मियह का एक अत्यंत शक्तिशाली खलीफा हुआ है। उसे विरासत में एक कमजोर हुकूमत मिली थी, क्योंकि उस समय आधी से ज्यादा सल्तनत पर हज़रत अब्दुल्ला बिन जुबैर का इक़्तेदार कायम था। लेकिन अब्दुल मलिक ने अपनी दूरंदेशी, होशमंदी और फौजी चालों से इराक, ईरान और हिजाज़ से उनके प्रभाव को खत्म कर दिया।
सत्ता प्राप्ति और आंतरिक अशांति
हज़रत अब्दुल्ला बिन जुबैर की शहादत के बाद सन 73 हिजरी में अब्दुल मलिक पूरी ममलीकत-ए-इस्लामिया का खलीफा बन गया। इतिहास गवाह है कि इतनी बड़ी सल्तनत का मालिक होने के बावजूद उसे एक दिन के लिए भी चैन नसीब नहीं हुआ।
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सन 78 हिजरी: सीसतां की जंग के दौरान वह ‘इसतसका’ (अत्यधिक प्यास लगना) के मर्ज़ में मुब्तिला हो गया।
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शारीरिक स्थिति: उसकी हालत यह थी कि वह दिन-रात पानी पीता था, फिर भी उसके पेट की आग नहीं बुझती थी।
सल्तनत बनाम दो घूंट पानी
हकीमों ने उसे पानी पीने से मना कर दिया था, लेकिन प्यास की शिद्दत ऐसी थी कि वह चिल्ला-चिल्लाकर कहता था:
“यह पूरी सल्तनत ले लो और खुदा के लिए मुझे दो घूंट पानी दे दो। जब मैं पानी भी नहीं पी सकता तो यह सल्तनत मेरे किस काम की है!”
आखिरी वक़्त और पछतावा
सन 86 हिजरी में जब उसका अंतिम समय आया, तो वह बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोने लगा। अपनी बद-आमालियों को याद करते हुए उसने निहायत ही दर्दनाक अल्फाज कहे:
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सत्ता का मोह: उसने स्वीकार किया कि जिस सल्तनत के लिए उसने एक बेहतरीन इंसान का कत्ल कराया और खान-ए-काबा पर संगबारी (पत्थर बरसाना) की, वह आज किसी काम नहीं आ रही।
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ईश्वरीय दंड: उसने महसूस किया कि खुदा ने उसके शिकम (पेट) के अंदर ही एक जहन्नुम पैदा कर दिया है, जिसकी आग उसे दुनिया में ही झुलसा रही है।
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साधारण जीवन की चाह: वह रोते हुए कहता था, “काश मैं हुकमरां होने के बजाय एक आम इंसान होता और गुनाहों का बोझ लेकर दुनिया से न जाता।”
अंत और सबक
अब्दुल मलिक बिन मरवान ने सन 86 हिजरी में बिना पानी की मछली की तरह तड़प-तड़प कर अपनी जान दे दी। यह वाकया उन हुकमरानों के लिए एक बड़ा सबक है जिनकी अज़मत के रूबरू बड़ी-बड़ी सल्तनतें धराशाई हो गईं, लेकिन वे दुनिया से नाकाम और नामुराद होकर गए।
लेखक: हबीबुल्लाह एडवोकेट, जवाहर नगर, जयपुर साभार: दीन दुनिया
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