उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण और यादवों के बीच बढ़ने लगी खाई
- उत्तर प्रदेश में राजनीति के चलते जातिवाद चरम सीमा पर
- जातिवाद और धर्मवाद देश के विकास में बाधक है
एम. खान
जयपुर (रॉयल पत्रिका)। उत्तर प्रदेश के इटावा में एक यादव जाति के कथावाचक को ब्राह्मणों ने मारा-पीटा, सिर के बाल काटे और मूत्र के छीटे लगाए। ब्राह्मण जाति के लोगों की मान्यता है कि भागवत कथा केवल ब्राह्मण ही सुना सकता है। हिंदू धर्म की दूसरी जाति का व्यक्ति कथा नहीं सुना सकता है। यादव जाति के कथावाचक के साथ मारपीट के बाद उत्तर प्रदेश में यादव जाति के लोगों ने कड़ा विरोध किया और सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन शुरू कर दिया, साथ में आरोपियों पर कड़ी कार्रवाई करने की सरकार से मांग की। यादव बाहुल्य गांव, मोहल्लों में ब्राह्मण जाति के लोगों का प्रवेश वर्जित के बोर्ड लगा दिए। अब सोशल मीडिया पर ब्राह्मण और यादव जाति के लोगों के एक दूसरे के खिलाफ वक्तव्य पढ़ने और सुनने को मिल रहे हैं। ब्राह्मण और यादव जाति के बीच अब खाई बढ़ती जा रही है, दोनों जातियों के बीच बढ़ती खाई आपसी टकराव में भी बदल सकती है। यादव ब्राह्मण जाति टकराव में अब राजनीति भी शामिल हो गई है सभी राजनीतिक पार्टियां सोचने लगी हैं कि इस जातिवादी टकराव से कैसे फायदा उठाया जाए? उत्तर प्रदेश सरकार ने जातिवाद रोकने का अभी तक कोई कारगर उपाय नहीं किया है और कर भी नहीं सकती है, क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार चुनाव में जातिवाद और धर्मवाद का सहारा लेकर सत्ता में पहुंची है ।
राजनीति के चलते जातिवाद चरम सीमा पर
देश में नेता विकास, शिक्षा एवं सामाजिक सुधार के आधार पर नहीं चुने जा रहे हैं। नेता शैक्षणिक योग्यता के आधार पर भी नहीं चुने जा रहे हैं। राजनीति में वर्तमान में वही नेता और व्यक्ति ज्यादा सफल हो रहा है जो समाज के आधार पर, धर्म के आधार पर जहरीले भाषण दे और दूसरे विरोधी गुट को नुकसान करने की बात करे। देश के ज्यादातर लोग रोजगार, विकास, शिक्षा, समाज सुधार के भाषणों की अपेक्षा नफरत भरे भाषणों को पसंद करते हैं। इसलिए राजनीति में स्थापित होने और सफल होने के लिए जातिवाद, धर्मवाद, समाजों के बीच नफरत वाले लच्छेदार भाषण देना जरूरी है। उत्तर प्रदेश में तो राजनीति का आधार ही जातिवाद है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर ठाकुर जाति को ज्यादा तरजीह देने के आरोप लग रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती दलितों के सहारे तीन बार मुख्यमंत्री बन गई। अखिलेश यादव और उनके पिता स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव ने भी जातिवादी राजनीति का ही सहारा लिया। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण जाति और यादव जाति के मतदाताओं की संख्या 10-10 प्रतिशत के आसपास है। ब्राह्मण जाति के लोग राजनीतिक रूप से जागरूक लोग हैं। भाजपा का हिंदुत्व का एजेंडा पूरे भारत में ब्राह्मणों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है। हिंदू समुदाय की ज्यादातर जातियों में ब्राह्मणों के प्रति सहानुभूति कम हो रही है, क्योंकि हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था का जिम्मेदार ब्राह्मणों को ही माना जाता है। जातिवादी संघर्ष केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं यह ज्यादातर हिंदी भाषी प्रदेशों में दिखाई देता है। राजस्थान में जाट, राजपूत, दलित, मीणा, गुर्जर, विश्नोई आदि के बीच जातिवाद दिखाई देता है तो मध्य प्रदेश में राजपूत और दलितों के बीच, हरियाणा में जाट और गैर जाट के बीच जाति संघर्ष चरम सीमा पर है। राजनीति के चलते जाति संघर्ष कम होने वाला नहीं है या यह भी कहा जा सकता है कि जातीय टकराव राजनीति के कारण ही होता है।
जाति एवं धर्मवाद देश के विकास में बाधक
जातिवाद और धर्म की राजनीति जिस देश में सत्ता तक पहुंचाने का रास्ता होती है। उससे देश का विकास धीमा हो जाता है या वह देश ही बर्बाद हो जाता है। जाति एवं धर्म की आड़ में अयोग्य धूर्त एवं नफरत फैलाकर, जनता को आपस में बांटकर राजनीति करने वाले नेताओं का बोलबाला होता है। ऐसे नफरती नेता विकास, शिक्षा एवं रोजगार को अपनी सफलता राजनीति में बाधक मानते हैं। धर्म और जाति की आड़ में वह जनता द्वारा पूछे जाने वाले सवालों से साफ तौर पर बच निकलते हैं। जातिवाद और धर्म की राजनीति से निकले नेता देश में आधुनिक शिक्षा और सामाजिक सुधारो को पसंद नहीं करते हैं। हमारा भारत देश वर्तमान में जाति एवं धर्म की राजनीति के दलदल में फंस गया है। यही कारण है कि जगह-जगह जाति और धर्म के आधार पर आम सभाएं, प्रदर्शन रैलियां और विरोधी संघर्ष देश में दिखाई देने लगे हैं। यदि इस तरह की रैलियां, प्रदर्शन एवं सभाएं देश के विकास करने के लिए आधुनिक शिक्षा के लिए एवं रोजगार के लिए होने लगे तो देश जल्दी विकसित बन सकता है।
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