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अरावली पर्वतमाला के अस्तित्व पर गंभीर संकट:

जयपुर

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नाज़िमुद्दीन ने जताई चिंता

खनन की अनुमति से राजस्थान और दिल्ली-NCR के भविष्य पर खतरा

जयपुर (रॉयल पत्रिका)। जमाअत-ए-इस्लामी हिन्द, राजस्थान के प्रदेश अध्यक्ष मुहम्मद नाज़िमुद्दीन ने अरावली पर्वतमाला के भविष्य को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का ध्यान इस ओर आकृष्ट करते हुए कहा कि हालिया न्यायिक परिभाषा के कारण इस प्राचीन पर्वतमाला के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया है।

100 मीटर की शर्त से 90% अरावली खतरे में

नाज़िमुद्दीन ने बताया कि नई न्यायिक परिभाषा के तहत केवल 100 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले भू-भाग को ही ‘अरावली’ माना गया है।

  • इसका सीधा असर यह होगा कि अरावली का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कानूनी संरक्षण से बाहर हो जाएगा।

  • उन्होंने आशंका जताई कि यदि इस आधार पर बड़े पैमाने पर खनन की अनुमति दी गई, तो परिणाम विनाशकारी होंगे।

सिर्फ पहाड़ नहीं, उत्तर भारत का रक्षा कवच है अरावली

उन्होंने कहा कि अरावली मात्र मिट्टी और पत्थरों की श्रृंखला नहीं है, बल्कि यह राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली-एनसीआर के लिए:

  1. जल-रक्षा कवच है।

  2. धूल और प्रदूषण रोकने वाला अवरोध है।

  3. जलवायु संतुलन का मुख्य आधार है।

विशेष रूप से राजस्थान के कई जिलों में यह भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। खनन से पहाड़ियों की प्राकृतिक संरचना नष्ट होने पर कुएँ, बावड़ियाँ और जलधाराएँ सूख जाएँगी, जिससे किसान और ग्रामीण समुदाय सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।

सुप्रीम कोर्ट से 4 प्रमुख मांगें

मुहम्मद नाज़िमुद्दीन ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय से सादर अपील की है कि:

  • परिभाषा बदलें: अरावली की परिभाषा केवल ऊँचाई के बजाय पारिस्थितिकीय निरंतरता (Ecological Continuity), वनस्पति और जल-संरक्षण की भूमिका के आधार पर तय की जाए।

  • खनन पर रोक: अरावली क्षेत्र में नए खनन पट्टों पर पूर्ण रोक लगाई जाए और संवेदनशील क्षेत्रों में चल रहे खनन को चरणबद्ध तरीके से बंद किया जाए।

  • अनाधिकृत खनन: पूरे क्षेत्र में अवैध खनन रोकने के लिए कठोर क़दम उठाए जाएं।

  • इकोलॉजिकल ज़ोन: अरावली को ‘क्रिटिकल इकोलॉजिकल ज़ोन’ घोषित कर इसे सख्त कानूनी संरक्षण दिया जाए।

“विकास के नाम पर विनाश मंजूर नहीं”

नाज़िमुद्दीन ने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा, “विकास के नाम पर प्रकृति का विनाश न तो संविधान की भावना के अनुरूप है और न ही मानवता के हित में। हमें सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद है कि वह पर्यावरण संरक्षण और आने वाली पीढ़ियों के न्याय को प्राथमिकता देगा।”

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