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सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी और बैतुल मुक़द्दस की फ़तह

Jaipur

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भूमिका

यह बात 12वीं सदी ईस्वी की है, जब शाम (सीरिया) का एक सुल्तान अपने खेमे में आराम कर रहा था। उसी वक्त वहां एक छोटी बच्ची आ जाती है और कहती है, “मुझे ‘एजाज’ चाहिए।” ‘एजाज’ उस शहर का नाम था जिसे सुल्तान ने 38 दिन की लड़ाई के बाद हासिल किया था। सुल्तान ने उस छोटी-सी बच्ची को पूरा का पूरा शहर दे दिया। लेकिन यहाँ यह सवाल खड़ा होता है कि सुल्तान ने ऐसा क्यों किया और वह बच्ची कौन थी? यह बच्ची उस ज़माने के बहुत महान बादशाह नूरुद्दीन ज़ंगी की थी। यह वही नूरुद्दीन ज़ंगी थे, जब दो यहूदी मदीना में पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के जिस्म-ए-अतहर (पवित्र शरीर) को उनकी कब्र मुबारक से चुराने की नीयत से आए थे, तो उन्होंने उनको पकड़ कर सज़ा दी थी। यह वही नूरुद्दीन ज़ंगी थे जिनकी फ़ौज का सरदार उसी खेमे में बैठा था, और वह सरदार कोई और नहीं, बल्कि वह था जिसने मुसलमानों को उनका क़िब्ला-ए-अव्वल (पहला क़िब्ला) ईसाइयों से वापस दिलाया था, और उसका नाम था सलाहुद्दीन अय्यूबी

सलाहुद्दीन अय्यूबी और उस दौर के हालात

सलाहुद्दीन अय्यूबी का असली नाम सलाहुद्दीन यूसुफ़ था, जिनकी पैदाइश 1138 ईस्वी में कुर्दिस्तान में हुई थी। आपका ताल्लुक़ किसी बादशाह के घराने से नहीं था। आपके चाचा, शेरकोह, नूरुद्दीन ज़ंगी की फ़ौज के कमांडर थे। आपके चाचा आपको जंग में साथ ले जाया करते थे, और यहीं से आपका असल सफ़र शुरू हुआ।

जब सलाहुद्दीन की उम्र 25 साल की हुई, तो उस वक़्त मुसलमानों की सल्तनत अलग-अलग टुकड़ों में बंटी हुई थी। उस वक़्त अब्बासी सल्तनत के पैर जमे हुए थे, इराक़ और शाम में ख़ुदमुख़्तार हुकूमतों ने क़ब्ज़ा कर रखा था, मिस्र के इलाक़ों में फ़ातिमी ख़ानदान की हुकूमत थी, और मुसलमानों के क़िब्ला-ए-अव्वल पर ईसाइयों का क़ब्ज़ा था। इस ज़माने में सबसे बड़ी दिक़्क़त यह थी कि उस दौर में मुसलमान इकट्ठा नहीं थे; सब अलग-अलग हुकूमतों में बंटे हुए थे।

बैतुल मुक़द्दस पर सलीबियों (Crusaders) का क़ब्ज़ा

अब असल सवाल यह आता है कि बैतुल मुक़द्दस पर ईसाई सलीबियों की हुकूमत कैसे क़ायम हुई। बैतुल मुक़द्दस वह जगह है जो यरूशलेम में मौजूद है। यह जगह तीन बड़े मज़हबों—इस्लाम, ईसाई और यहूदी—की नज़र में बहुत बड़ा मक़ाम रखती है। मुसलमानों के लिए बैतुल मुक़द्दस क़िब्ला-ए-अव्वल था और हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) यहीं से मेराज पर गए थे।

हज़रत उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने 638 ईस्वी में बैतुल मुक़द्दस को सबसे पहले फ़तह किया और उसको इस्लामी सल्तनत में शामिल कर लिया था। हज़रत उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने सब मज़हबों के लोगों को इजाज़त दी कि वे यहाँ आ सकते हैं और इबादत कर सकते हैं, क्योंकि यह मक़ाम तीनों मज़हबों के नज़दीक मुक़द्दस है। इसके साथ-साथ, हज़रत उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने उन्हें यहाँ क़याम (रहने) की भी इजाज़त दी।

इसी बात का ग़लत फ़ायदा उठाते हुए, उन्होंने यहाँ नई-नई ख़ुराफ़ात (ग़ैर-इस्लामी गतिविधियाँ) अंजाम देना शुरू कर दिया, जैसे गाना-बजाना और नशा करना। जब मुसलमानों ने उन्हें यह समझाने की कोशिश की कि आप जो यह सब कर रहे हैं, इससे हमारी मस्जिद की बे-हुर्मती (अपमान) होती है, तो भी वे लोग नहीं माने। उनके दरमियान एक शख़्स, जिसका नाम पीटर द हरमिट था, ने सारी ईसाई कौम को मुसलमानों के ख़िलाफ़ भड़काना शुरू कर दिया। वह जगह-जगह लोगों को जमा करके कहता, “मुसलमान हमारे दुश्मन हैं, वे हमें हमारी मज़हबी रस्में अदा नहीं करने दे रहे।”

यह नफ़रत सिर्फ़ यहीं तक सीमित नहीं रही, बल्कि जर्मनी, इटली, यूनान और दुनियाभर तक इस बात का प्रचार किया गया और उन सबको मुसलमानों के ख़िलाफ़ इकट्ठा किया गया। उस वक़्त के ईसाई उलेमा (धर्मगुरुओं) ने यह फ़तवा दिया कि हमें यरूशलेम को मुसलमानों से आज़ाद कराना है, क्योंकि हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) वापस दुनिया में तब आएँगे जब हम मुसलमानों को यहाँ से बाहर निकाल फेंकेंगे। यहाँ तक कह दिया गया कि जिन लोगों के सिरों पर बहुत गुनाह हैं, अगर वे यरूशलेम का सफ़र करेंगे और वहाँ क़याम करेंगे, तो उनके सारे गुनाह माफ़ हो जाएँगे। इसके बाद पूरी दुनिया से ईसाई लोग यरूशलेम का सफ़र करने लगे और देखते-देखते इनकी तादाद 10 लाख तक पहुँच गई।

इस 10 लाख के क़ाफ़िले का मुक़ाबला सेल्जुक सल्तनत के मुट्ठी भर सिपाहियों से हुआ। उसके बाद जो फ़िलिस्तीन की सरज़मीन ख़ून से सुर्ख़ हो गई… उस वक़्त फ़िलिस्तीन में 8 दिनों में 60,000 मुसलमानों को क़त्ल कर दिया गया। और यह ख़ून-रेज़ी और नरसंहार सिर्फ़ फ़िलिस्तीन तक ही नहीं, बल्कि सीरिया और जॉर्डन जैसे इलाक़ों पर भी क़ब्ज़ा कर लिया गया। वहाँ सिर्फ़ इंसानी क़त्ल-ए-आम ही नहीं, बल्कि इल्मी (ज्ञान का) क़त्ल-ए-आम भी हुआ। एक ऐसी लाइब्रेरी, जिसमें 19 लाख किताबें थीं, जिसमें दर्शन और अन्य कलाओं की किताबें थीं, उन सबको भी जलाकर राख कर दिया गया। और देखते-ही-देखते फ़िलिस्तीन ईसाइयों के क़ब्ज़े में आ गया।

सलाहुद्दीन अय्यूबी का उदय

कहा जाता है:

“ग़लबा-ए-कुफ़्र से घबराए अहले-ईमान, रात के बाद ही हंगामा-ए-सहर होता है।”

मतलब, रात के बाद ही सूरज की पहली किरण नज़र आती है। और यह सुबह की किरण लाने वाले कोई और नहीं, सलाहुद्दीन अय्यूबी थे।

उनकी ज़िंदगी का मक़सद ही यही था कि उनको मुसलमानों को उनका क़िब्ला-ए-अव्वल वापस दिलाना है। वहाँ, सलाहुद्दीन अपने चाचा के इंतक़ाल के बाद नूरुद्दीन ज़ंगी की फ़ौज के कमांडर बन गए थे। सलाहुद्दीन अय्यूबी (रहमतुल्लाह अलैह) ने सबसे पहले मिस्र फ़तह किया और जो मुसलमानों की हुकूमतें जगह-जगह टुकड़ों में बंटी थीं, उन सबको एक किया, ताकि मुसलमानों की एक मज़बूत ताक़त बन सके।

हत्तीन की जंग और बैतुल मुक़द्दस की आज़ादी

लेकिन मसल का एक बादशाह ऐसा था जो सलीबियों का साथ दे रहा था। जब सलाहुद्दीन (रहमतुल्लाह अलैह) को यह बात पता चली, तो सुल्तान ने सलीबियों को सबक़ सिखाने के लिए सन् 1177 में इन पर हमला किया। सुल्तान ने इनके कई क़िलों को फ़तह किया और वहाँ हर क़िले पर अपने सिपाही आबाद करते गए, जिसकी वजह से ज़ाहिर तौर पर दिखने में सुल्तान की फ़ौज आहिस्ता-आहिस्ता कम होने लगी। 24 नवंबर 1177 ईस्वी में सुल्तान पर सलीबियों ने अचानक हमला कर दिया। सुल्तान को उस वक़्त पीछे हटना पड़ा, क्योंकि उस वक़्त सुल्तान के साथ ज़्यादा लोग नहीं थे और उनकी फ़ौज कम हो चुकी थी।

इसके बाद सलीबियों ने सोचा कि सुल्तान के पास तो बहुत कम फ़ौज है, जो जंग में पीछे हट जाती है। सलीबियों ने इस जंग के बाद एक बड़ी फ़ौज इकट्ठा की और 10 जून 1179 को सलाहुद्दीन पर एक ज़बरदस्त हमला किया। लेकिन अफ़सोस, इस जंग में सलीबियों को बहुत ही बुरी शिकस्त हुई, क्योंकि वे सोच रहे थे कि सुल्तान के पास बहुत कम फ़ौज है, लेकिन ऐसा नहीं था। सुल्तान अपनी फ़ौज के साथ मुत्तहिद (एकजुट) थे। हार के बाद सलीबियों ने सुल्तान से अमन का मुआहिदा (शांति समझौता) किया। सुल्तान चाहते तो फ़िलिस्तीन में घुसकर उसको फ़तह कर लेते, लेकिन उन्होंने अपनी ईमानदारी का मुज़ाहिरा करके अमन का मुआहिदा किया और किसी को किसी तरह की कोई तकलीफ़ नहीं दी।

इतना सब कुछ होने के बावजूद सलीबी बाज़ नहीं आए और अलग-अलग तरीक़ों से मुसलमानों को तकलीफ़ देते रहे, “जैसे आज भी देते हैं।” इन्हीं के बीच इनका एक कमांडर था, जिसका नाम रेनॉल्ड डी चटिलॉन था। यह कमांडर एक बड़ी फ़ौज के साथ मदीना की तरफ़ रवाना हुआ, ताकि वह मदीना पर हमला करके उसको तबाह कर सके। जैसे ही इसकी ख़बर सुल्तान को हुई, सुल्तान अपना लश्कर लेकर मदीना की तरफ़ बढ़े। रास्ते में हत्तीन का एक मक़ाम पड़ता है, जहाँ सलीबियों की 60,000 लोगों की फ़ौज खड़ी थी। वहाँ सलाहुद्दीन और सलीबियों के बीच एक ख़ूंख़ार जंग होती है, जिसमें सलीबियों के 30,000 लोग मारे जाते हैं और 30,000 लोगों को बंदी बना लिया जाता है। 4 जुलाई 1187 को हुई इस जंग में सुल्तान ने अपनी तलवार से रेनॉल्ड का सर क़लम किया।

उसके बाद, वहाँ से सलाहुद्दीन ने बैतुल मुक़द्दस का रुख़ किया, जहाँ ईसाइयों और सलीबियों का एक बड़ा लश्कर मौजूद था। 8 दिन तक यह जंग चली और बैतुल मुक़द्दस फ़तह हुआ। और जब आपने यह मुक़द्दस जगह फ़तह की, तो वहाँ रह रहे ईसाई नागरिकों को क़त्ल नहीं किया। उनके साथ ऐसा सुलूक किया कि वे भी हैरान थे कि आख़िरकार एक बादशाह इतना आदिल (न्यायप्रिय) और सख़ी (उदार) कैसे हो सकता है।

और आज वह वक़्त आ चुका है, जब उसी फ़िलिस्तीन की सरज़मीन पर मुसलमानों का ख़ून बहाया जा रहा है, उनको क़त्ल किया जा रहा है। आज सब मुसलमान हुक्मरान आपस में तो एक साथ हैं, लेकिन आज फ़िलिस्तीन में हो रहे कत्ले आम पर सब खामोश है। आज भी फ़िलिस्तीन ऐसे ही किसी सलाहुद्दीन के इंतज़ार में है।

 

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