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सिमटते रिश्ते और बिखरती पीढ़ियां

Jaipur

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शादाब अली

समय की तेज रफ्तार ने हमारे जीवन की बहुत-सी सच्चाइयों को बदल दिया है, लेकिन सबसे गहरी चोट अगर किसी पर हुई है, तो वो है हमारे आपसी रिश्तों पर। वो रिश्ते जो कभी हमारी पहचान हुआ करते थे, अब महज एक औपचारिकता बनकर रह गए हैं। चंद घंटों की मुलाकातें, खानपान के समय की पूछताछ और रस्म अदायगी तक सिमटे मेलजोल—ये आज की रिश्तेदारी की हकीकत है। पहले रिश्तों की अहमियत इतनी होती थी कि दूर – दराज के रिश्तेदार भी विवाह समारोह में हफ्तों पहले आ जाया करते थे और दुख दर्द में हफ्तों तक रुक जाया करते थे। घरों की रौनक, बच्चों की चहलकदमी और औरतों की सामूहिक रसोई—सबमें अपनापन और जुड़ाव नजर आता था। अब वही रिश्ते वॉट्सऐप के संदेशों और सोशल मीडिया की ‘शुभकामनाओं’ में सिमट चुके हैं। शादी में जाना हो तो पहले पूछा जाता है, “खाना कब शुरू होगा और अगर मौत मैय्यत जाना हो तो, दफनाया कब जाएगा रिश्तों की आत्मा खो चुकी है—बस शरीर बचा है।

रिश्ते नहीं, रस्में बची हैं :-

आज रिश्तों की बुनियाद में आत्मीयता की बजाय दिखावा और समय की तंगी हावी हो चुकी है। लोग बस इतना करना चाहते हैं जिससे समाज में उनकी ‘हाजिरी’ लग जाए। कई बार तो हाल यह होता है कि अगर कोई अपना एक दिन के लिए भी ठहरने आ जाए तो उससे पहले वजह पूछी जाती है। क्या यह वही समाज है जहां रिश्तेदार महीनों तक मेहमान बनकर रहते थे और मेज़बान उसे खुशी-खुशी निभाता था?

गरीब की रिश्तेदारी—एक अनकहा संघर्ष :-

इस बदलते दौर में सबसे ज्यादा मार उस वर्ग पर पड़ती है जो आर्थिक रूप से कमजोर है। उसकी भी जिम्मेदारियां और रिश्ते होते हैं, लेकिन उन्हें निभाने के लिए उसे कई बार अपनी जरूरतों की बलि चढ़ानी पड़ती है। कोई शादी की दावत हो तो अमीर मेहमान की तरह दिखने के लिए वो कर्ज लेता है, तंगी छुपाता है और उम्मीद करता है कि उसका सम्मान बना रहे। मगर समाज उसे उसकी हैसियत से नहीं, उसके ‘परफॉर्मेंस’ से तौलता है और अगर वो किसी रस्म में थोड़ा पीछे रह जाए, तो उसे नजरें नीची करनी पड़ती हैं।

अब भी वक्त है :-

समाज को अब रुककर सोचना होगा कि क्या हम वाकई एक ‘स्मार्ट’ युग में जी रहे हैं, या फिर एक ‘संवेदनहीन’ युग में रिश्ते खून से नहीं, एहसास से बनते हैं। वो एहसास अब मशीनों में नहीं, हमारे दिलों में ही जिंदा रह सकते हैं। जरूरत है सिर्फ थोड़ी समझदारी, थोड़े समय और ढेर सारी अपनापन की। रिश्तों को निभाना हो तो समय दीजिए, सम्मान दीजिए और सबसे जरूरी—समझदारी दीजिए। वरना आने वाली पीढ़ियां बस तस्वीरों में देखती रह जाएंगी कि कभी हमारे यहां रिश्तों की भी एक तहज़ीब हुआ करती थी।

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