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देश की घटती जनसंख्या दर पर आरएसएस प्रमुख भागवत चिंतित

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जयपुर (रॉयल पत्रिका)। समय तेजी से बदल रहा है। एक समय था जब देश की सरकार जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए विभिन्न जनसंख्या कंट्रोल प्लान चलाती थी। पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी ने तो जनसंख्या कंट्रोल के लिए पुरुषों की जबरदस्ती नसबंदी अभियान चलाया था। उसके बाद सभी सरकारों ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए विभिन्न योजनाएं तो चलाई ही साथ में योजना को सफल बनाने में भागीदारों को प्रोत्साहन भी किया। सरकार ने नारा दिया कि “हम दो हमारे दो” बढ़ती जनसंख्या को देश में गरीबी और शिक्षा से जोड़ा गया। लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों के चलते देश में मल्टीनेशनल कंपनियों की बाढ़ आ गई और देश के व्यापारी, इंजीनियर, डॉक्टर, टेक्नीशियन एवं विशेषज्ञों पर पैसा बरसने लगा। देश में बड़े-बड़े प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए ट्रैन्ड युवाओं की जरूरत होने लगी। धीरे-धीरे जिस बढ़ती जनसंख्या को अभिशाप माना जाता था। वही जनसंख्या देश के विकास के लिए वरदान साबित हो रही है। ग्लोबलाइजेशन में भारतीय युवाओं और व्यवसायियों के लिए विश्व में काम के अवसर बढ़ गए हैं। दूसरी तरफ समाज में शिक्षा बढ़ाने के कारण सभी वर्गों में जनसंख्या दर घटने लगी है। घटती जनसंख्या देश की आर्थिक, सामाजिक अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर सकती है।

भागवत की चिंता क्यों :-

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने घटती जनसंख्या पर चिंता व्यक्त की है। भागवत का कहना है कि देश की जनसंख्या दर 2.1 से भी नीचे आ गई है। जो समाजों कि आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति के लिए नुकसानदायक है।  भागवत को यह भी चिंता हो रही है कि उनका हिंदूवादी संगठन आरएसएस हिंदुओं के हितों के लिए संघर्ष करता है। आरएसएस हमेशा देश में मुसलमानों की बढ़ती जनसंख्या पर चिंता व्यक्त करता आया है। इसलिए आरएसएस  के नेता कहते मिल जाते हैं कि हिंदुओं को चार-पांच बच्चे अवश्य पैदा करने चाहिए। दूसरी तरफ मुस्लिम समुदाय जिस पर देश में तेजी से जनसंख्या बढ़ने का आरोप है कि भी प्रजनन दर तेजी से घट रही है। मुसलमानों में घटती प्रजनन दर का मुख्य कारण बढ़ती शिक्षा एवं जागरूकता को माना जा रहा है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की चिंता इसलिए भी है कि देश में हिंदुओं की जनसंख्या सबसे ज्यादा घट रही है। हिंदू सबसे ज्यादा धर्म बदलकर दूसरे धर्म में जा रहे हैं। हिंदू धर्म का बड़ा हिस्सा दलित वर्ग, बौद्ध धर्म एवं ईसाई धर्म अपना रहा है। इसलिए भागवत की चिंता सिर्फ हिंदुओं की घटती जनसंख्या पर दिखाई दे रही है।

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