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माँ बाप के हुकूक

Jaipur

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यह बात है सन 937 ईस्वी की, यूरोप में जब यह फैसला लिया गया कि अस्पताल केवल मरीज़ों के इलाज के लिए ही नहीं, बल्कि उन बुज़ुर्गों की रहने की व्यवस्था के लिए भी बनाए जाएँ  जिनका सहारा देने वाला कोई न हो। उसी समय इंग्लैंड के राजा एथेलस्टैन ने यॉर्क में सेंट पीटर हॉस्पिटल बनवाया। और इस प्रकार के अस्पतालों को ही पहले का ओल्ड एज होम माना जाता था, जो बुज़ुर्गों की सेवा के लिए बनाए गए थे।  एथेलस्टैन को यह विचार तब आया जब उन्होंने यॉर्क के कैथेड्रल के पादरियों को अपने निजी पैसों से ग़रीबों को खाना खिलाते देखा। उन्होंने सोचा कि इसे स्थायी बना देना चाहिए, इसलिए उन्होंने इसके लिए धन दिया और इमारत बनवाई। यह अस्पताल पूरी तरह चैरिटी पर चलते थे — लोग दान करते और वहाँ रहने वाले अनाथ बुज़ुर्गों की देखभाल की जाती। धीरे-धीरे यही सिलसिला आज के ओल्ड एज होम के रूप में बदल गया।  लेकिन सवाल यह है कि उस समय वे कौन से बुज़ुर्ग थे जिनकी देखभाल के लिए इतना बड़ा सिस्टम बनाना पड़ा, जो आज भी देखने को मिलता है?

उस दौर में लोगों के ओल्ड एज होम में आने की तीन सबसे बड़ी वजह थीं

  1. परिवार या बच्चे युद्ध में शामिल होते और मारे जाते — तब उनके माँ-बाप की देखभाल ओल्ड एज होम में की जाती।
  2. रिश्तेदार या परिवार का सहारा न होना — कई लोग शादी नहीं करते, या तो चर्च के लिए अपने को समर्पित कर देते, या फिर दुनियावी तरक्की के लिए शादी नहीं करते (यह कारण आज भी मौजूद है)।
  3. कमाने के लिए दूर जाना — लोग अपने माँ-बाप से दूर काम करने चले जाते और उन्हें ओल्ड एज होम में छोड़ देते।

इसके असर आज हमें भारत में भी दिखते हैं, जबकि भारत एक धार्मिक देश है जिसमें माँ-बाप का सम्मान सिखाया जाता है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि आज भारत में भी 4000 से अधिक ओल्ड एज होम हैं। इसकी क्या वजह है, जबकि न तो अब वैसी युद्ध की स्थिति है, और अगर है भी तो परिवारिक व्यवस्था मौजूद है?

आख़िर क्यों लोग अपने माँ-बाप को ओल्ड एज होम में भेज देते हैं?

क्या वहाँ उनके माँ-बाप उतने ही खुश रहते हैं जितने अपने बच्चों के साथ?

असल में, धर्म से दूरी और पश्चिमी सोच का असर एक बड़ा कारण है — केवल इस आधार पर कि वहाँ के लोगों के पास पैसा ज़्यादा है, वे अमीर हैं, तो ज़ाहिर है वे हँसी-ख़ुशी जीवन जी रहे होंगे। लेकिन ऐसा नहीं है।

इस दुनिया में सबसे ज़्यादा आत्महत्याएँ अगर कहीं होती हैं तो वह है ग्रीनलैंड — जबकि वह भारत से कहीं अधिक विकसित है, जीवन-स्तर बेहतर है, प्रदूषण भी कम है, फिर भी लोग जीवन से परेशान हैं। इससे यह साफ़ है कि पैसों से ख़ुशी नहीं खरीदी जा सकती।  और जहाँ तक सवाल है — ओल्ड एज होम में रहने वाले और परिवार के साथ रहने वालों में से सबसे अधिक कौन खुश रहता है — तो नेशनल लाइब्रेरी ऑफ़ मेडिसिन के मुताबिक, जिन बुज़ुर्गों का जीवन अपने परिवार के साथ बीतता है, उनकी क्वालिटी ऑफ़ लाइफ ओल्ड एज होम वालों की तुलना में कहीं बेहतर होती है।  मतलब, माँ-बाप को दूर करके उनकी बददुआ भी ली और तरक्की भी नहीं मिली — क्योंकि जो लोग सबसे ज़्यादा तरक्कीशुदा हैं और अपने माँ-बाप से दूर रहते हैं, उनमें ही सबसे ज़्यादा डिप्रेशन है।

अब समाधान की तरफ चलते हैं

सबसे पहले, अल्लाह का डर। अगर यह डर निकल गया कि हमें हिसाब देना है, तो फिर जो दिल में आए करेंगे। लेकिन अगर हिसाब का डर हो, तो अल्लाह तआला फ़रमाता है —

सूरह अल-अंबिया (21:47)

“और हम क़यामत के दिन सही-सही तोलने वाले तराज़ू रख देंगे, फिर किसी पर ज़ुल्म न होगा। अगर कोई चीज़ राई के दाने के बराबर भी होगी, हम उसे लेकर आएंगे। और हम हिसाब लेने के लिए काफी हैं।” अल्लाह तआला आपके माँ-बाप के बारे में भी सवाल कर सकता है।  लेकिन यह सब तभी असरदार होगा जब ईमान होगा — अगर ईमान ही नहीं और अपने मनमाने तरीक़े से ज़िंदगी गुजारनी है तो फिर जो दिल में आए करते रहो। (मोहम्मद सोहेल)

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