संस्कृत में पीएचडी प्राप्त कर रेशमा कुमारी ने दी एकता की मिसाल
आगरा,। भाषा और साहित्य को धर्म या जाति की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता, यह कहना है रेशमा कुमारी उर्फ फातिमा का, जिन्होंने संस्कृत में पी-एच.डी. करके समाज को एकता एवं सद्भाव का संदेश दिया है। उत्तर प्रदेश के आगरा जिले की रेशमा कुमारी को दयालबाग शिक्षण संस्थान, आगरा के 43वें दीक्षांत समारोह में 25 मार्च 2025 को डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गई है। उनका शोध विषय था— “डॉ. प्रशस्य मित्र शास्त्री की कृतियों में युगीन संदर्भ”। धर्म और भाषा के विवाद पर उन्होंने कहा—”धर्म को मानवता के विकास के रूप में देखना चाहिए, न कि विभाजन के लिए। मैंने कुरान और गीता दोनों का अध्ययन किया है, मेरा मानना है कि भाषा जोड़ने का माध्यम होनी चाहिए, न कि अलगाव का। अपनी सफलता का श्रेय उन्होंने अपने माता-पिता और ससुराली जनों को, विशेष रूप से पति मोहम्मद यूनिश को दिया। उनका समाज को संदेश है कि ग्रन्थ, भाषा और साहित्य पर सबका समान अधिकार होना चाहिए। मल्टीडिसीपिनरी शोध को बढ़ाव देने की बात कहते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह के शोध भविष्य में ज्ञान के सर्वतोमुखी विकास के साथ साथ सांप्रदायिक एकता को भी बढ़ावा देंगे।
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