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देश के नाम पर भारत में शहीद होने वाले पहले मुस्लिम थे राजा हसन मेवाती

Jaipur

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  • राजा हसन मेवाती के 497 वें शहादत दिवस पर विशेष

हसन खान मेवाती का जन्म मेवात में हुआ था। उनके पिता अलावल पूर्व शासक खानजादा और मेवात राज्य के एक महत्वाकांक्षी मुस्लिम राजपूत शासक थे। उनके वंश ने लगभग 150 वर्षषों तक मेवात राज्य पर शासन किया था। वह राजा नाहर खान मेवाती के वंशज थे, जो 14 वी शतांब्दी में मेवात के वली थे। उन्होनें 1492 में अलवर किले का निर्ममाण किया। हसन खां 1505 ई. में मेवात के राजा बनें। 1526 ईसवीं में जब मुगल बादशाह बाबर ने हिंदुस्तान पर हमला किया तो इंब्राहीम लोदी, हसन खां मेवाती तथा दिगर राजाओ नें मिलकर पानीपत के मुकाम पर बाबर का मुकाबला किया। इसमें राजा हसन खां के पिता अलावल खां शहीद हो गए। पानीपत की विजय के बाद बाबर ने दिल्ली और आगरा पर तो अपना अधिकार जमा लिया लेकिन भारत सम्राट बनने के लिये उसे महाराणा संग्राम सिंह (मेवाड) और हसन खां (मेवात) बाबर के लिये कडी चुनौती के रूप में सामना करना पड़़ा। बाबर ने हसन खां मेवाती को अपने साथ मिलाने के लिये उन्हहें इस्लाम का वास्ता दिया और एक लडाई में बंधक बनाये गये राजा हसन खा के पुत्र को बिना शर्त छोड दिया, लेकिन राजा हसन खां की देश भक्ति के सामने धर्म का वास्ता काम नही आया। बाबर नें राजा हसन खान मेवाती को पत्र लिखा और उस पत्र में लिखा ‘’बाबर भी कलमा-गो है और हसन ख़़ान मेवाती भी कलमा- गो है, इस प्रकार एक कलमा-गो दूसरे कलमा-गो का भाई है इसलिए राजा हसन ख़़ान मेवाती को चाहिए की बाबर का साथ दे। राजा हसन खान मेवाती ने बाबर को खत लिखा और उस खत में लिखा ‘’बेशक़ हसन ख़़ान मेवाती कलमा-गो है और बाबर भी कलमा-गो है, मगऱ मेरे लिए मेरा मुल्क (भारत) पहले है और यही मेरा ईमान है इसलिए हसन खान मेवाती राणा सांगा के साथ मिलकर बाबर के विरुद्ध युद्ध लड़़ेगा। मुल्क़ का नाम लेकर भारत वर्ष में शहीद होने वाले वह पहले व्यक्ति थे। देशभक्ति की मिसाल थे राजा हसन खां: हसन खां मेवाती वतन परस्ती की मिसाल थे। हसन खां मेवाती भारत माता के वो सच्चे सपूत थे जिन्होनें बाबर को रोकने के लिए अपने राज्य की कुर्बानी तक दे दी। बाबर ने मजहब की दुहाई के साथ कई और लालच दिए, लेकिन मेवाती ने उनका पैगाम ठुकरा कर देश भक्ति को चुना। इसके बाद बाबर ने धमकी देना शुरु किया, बाबर ने लिखा कि मैं तुम्हारे पुत्र को रिहा कर दूंगा, तुम मेरे से आकर मिलो, इसपर मेवाती ने जवाब दिया कि अब हमारी मुलाकात युद्ध के मैदान में होगी। खानवा की लड़़ाई मेवाड़ के राणा सांगा और बाबर के बीच हुई। उस समय हसन खां मेवाती की देशभक्ति देशभर में प्रसिद्ध हो चुकी थी। हसन खां मेवाती ने इस लड़़ाई में राणा सांगा का साथ दिया। 15 मार्च 1527 को हसन खां ने राणा सांगा के साथ मिलकर खानवा के मैदान में बाबर के साथ जमकर युद्ध किया। अचानक एक तीर राणा सांगा के सिर पर आ गया और वे हाथी से नीचे गिर पड़़े, फिर सेना के पैर उखडऩे लगे तो सेनापति का झण्डा खुद राजा हसन खां मेवाती ने संभाल लिया और बाबर सेना को ललकारते हुए उनपर जोरदार हमला बोल दिया। राजा हसन खां मेवाती के 12 हजार घुड़सवार सिपाही बाबर की सेना पर टूट पड़़े और उनपर भारी पड़ते दिखे, फिर अचानक एक तोप का गोला राजा हसन खां मेवाती के सीने पर आ लगा और मेवाती लड़ते लड़ते वीर गति को प्राप्त हो गए।

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