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राहुल : गुजरात की गुमनाम पार्टियों को ₹4300 करोड़ का चंदा कहां से मिला

नई दिल्ली

Rahul gandhi

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कांग्रेस का आरोप: गुमनाम दलों के जरिए हो रहा चुनावी चंदे का खेल

नई दिल्ली। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक बार फिर चुनावी चंदे और पारदर्शिता को लेकर बड़ा मुद्दा उठाया है। बुधवार को उन्होंने गुजरात की कुछ अनाम राजनीतिक पार्टियों को मिले ₹4300 करोड़ के चंदे पर गंभीर सवाल खड़े किए। राहुल ने सीधे तौर पर चुनाव आयोग (EC) से पूछा कि क्या वह इस मामले की जांच करेगा या फिर इन दलों से एफिडेविट मांगेगा। दरअसल, राहुल गांधी ने दैनिक भास्कर की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि गुजरात में ऐसी 10 पार्टियां हैं, जिनके नाम तक आम जनता ने कभी नहीं सुने, लेकिन उन्हें हजारों करोड़ का चंदा मिला। हैरानी की बात यह है कि इन पार्टियों ने अब तक बहुत ही कम चुनाव लड़े हैं और चुनाव आयोग को जो खर्च का ब्यौरा सौंपा गया, उसमें केवल 39 लाख रुपए का खर्च ही दिखाया गया।

राहुल गांधी का हमला         | यह भी पढ़े   https://www.facebook.com/share/p/178KiqNTdQ/

राहुल गांधी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट X (पूर्व ट्विटर) पर लिखा : “गुजरात में कुछ ऐसी अनाम पार्टियां हैं जिनका नाम किसी ने नहीं सुना, लेकिन ₹4300 करोड़ का चंदा मिला। इन पार्टियों ने बहुत ही कम मौकों पर चुनाव लड़ा है, या उन पर खर्च किया है। चुनाव आयोग को बताना चाहिए कि इतना पैसा आया कहां से और गया कहां।” उनका सीधा इशारा इस ओर था कि गुमनाम पार्टियों के जरिए किसी बड़े राजनीतिक खेल को अंजाम दिया जा रहा है।

चंदे का खेल और पारदर्शिता का सवाल

भारत की राजनीति में चुनावी चंदा लंबे समय से बहस का विषय रहा है। हालांकि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को असंवैधानिक ठहराते हुए इसे रद्द कर दिया, लेकिन अब भी कई सवाल बाकी हैं। आखिरकार इतनी बड़ी रकम किन स्रोतों से इन पार्टियों तक पहुंची? जब इन दलों की कोई बड़ी पहचान ही नहीं है, तो उन्हें चंदा देने वालों का मकसद क्या था? क्या यह चंदा किसी और राजनीतिक दल तक पहुंचाने के लिए “रूट” बनाया गया? यही वे बिंदु हैं, जिन पर राहुल गांधी ने चुनाव आयोग की जवाबदेही तय करने की मांग की है।

गुजरात से क्यों जुड़ा मामला?

रिपोर्ट के मुताबिक, जिन 10 गुमनाम पार्टियों को ₹4300 करोड़ मिले, उनमें से अधिकतर का पंजीकरण गुजरात में हुआ है। इन दलों का न तो कोई बड़ा राजनीतिक जनाधार है और न ही उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव लड़े हैं। यही कारण है कि राहुल गांधी और विपक्ष इसे गुजरात की सियासत से जोड़कर देख रहा है। गुजरात लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी (BJP) का गढ़ माना जाता है। ऐसे में राहुल का सवाल अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा पर भी निशाना है कि क्या यह पैसा सत्ताधारी दल तक पहुंचाने के लिए इन गुमनाम पार्टियों का इस्तेमाल किया गया।

विपक्ष की राजनीति बनाम चुनाव आयोग की चुप्पी

राहुल गांधी का यह हमला केवल चुनावी पारदर्शिता का सवाल नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठाता है। क्या चुनाव आयोग ऐसे मामलों की स्वतः संज्ञान लेगा? क्या वह इन पार्टियों से चंदे का हिसाब-किताब मांगेगा? या फिर हमेशा की तरह चुप्पी साधे रहेगा? यही प्रश्न अब विपक्ष बार-बार उठा रहा है।

जनता का भरोसा और लोकतंत्र का सवाल

लोकतंत्र की बुनियाद पारदर्शिता और जवाबदेही पर टिकी होती है। अगर राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे का कोई स्पष्ट हिसाब नहीं है, तो यह जनता के भरोसे पर सीधा हमला है। जनता को यह जानने का हक है कि राजनीतिक दलों को पैसा कहां से और क्यों मिल रहा है। अगर यह पैसा किसी कॉरपोरेट या कारोबारी हित साधने के लिए दिया गया, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर कर देगा। वहीं, अगर यह चंदा “ब्लैक मनी” को वैध बनाने का जरिया है, तो यह भ्रष्टाचार को और गहरा करेगा।

कांग्रेस की रणनीति

कांग्रेस लंबे समय से इलेक्टोरल बॉन्ड्स और चुनावी चंदे के मुद्दे को हवा देती आ रही है। राहुल गांधी इस मुद्दे को बार-बार जनता के सामने रखकर यह साबित करना चाहते हैं कि भाजपा और उसके सहयोगी दल गुप्त फंडिंग का सहारा लेकर सत्ता पर पकड़ मजबूत कर रहे हैं। गुजरात की गुमनाम पार्टियों का मुद्दा उठाकर कांग्रेस आने वाले चुनावों में इसे बड़ा हथियार बनाने की तैयारी कर रही है। खासकर विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ब्लॉक इस मुद्दे पर एकजुट होकर भाजपा पर हमला कर सकता है। राहुल गांधी का यह सवाल सिर्फ गुजरात तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे भारतीय लोकतंत्र की साख और पारदर्शिता से जुड़ा हुआ है। यदि सचमुच गुमनाम पार्टियों को ₹4300 करोड़ का चंदा मिला है और उनका कोई स्पष्ट खर्च या चुनावी गतिविधि दर्ज नहीं है, तो यह बेहद गंभीर मामला है। अब सबकी नजर चुनाव आयोग पर है कि वह इस पर क्या कदम उठाता है। क्या EC इन पार्टियों से एफिडेविट लेकर जवाब मांगेगा, या फिर यह मामला भी धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला जाएगा? लोकतंत्र में जनता का विश्वास सबसे बड़ा स्तंभ होता है। अगर चुनावी चंदे का खेल गुमनाम दलों के जरिए चलता रहा, तो यह स्तंभ डगमगा सकता है। इसलिए यह ज़रूरी है कि इस सवाल का पारदर्शी जवाब मिले—ताकि जनता जान सके कि सत्ता के गलियारों में चल रहा असली खेल आखिर है क्या।

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