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पुलिस पर एक तरफा कार्यवाही का दबाव:

जयपुर

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राजनीति और प्रशासन की भूमिका

वर्तमान पुलिस की छवि और चुनौतियां

वर्तमान में पुलिस की छवि साफ नहीं मानी जाती है। जब भी कोई घटना होती है तो पुलिस पर एक तरफा एवं पक्षपाती कार्यवाही के आरोप लगाए जाते हैं। कानून व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने के लिए पुलिस का निष्पक्ष बने रहना जरूरी होता है, लेकिन पुलिस की कार्यवाहियां अक्सर सत्ता, राजनेताओं और वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों के अनुसार बदलती रहती हैं।

जयपुर के चौमू में क्या हुआ?

हाल ही में जयपुर शहर के नज़दीक चौमू कस्बे में एक मस्जिद के सामने से पत्थर हटाने के नाम पर प्रशासन ने कार्यवाही करना शुरू किया था। इस दौरान प्रशासन और कस्बे के मुसलमानों के बीच गर्मा-गर्मी हुई। मुस्लिम पक्ष की ओर से दो-चार लोगों ने पुलिस पर पत्थर फेंके। पुलिस ने जवाब में आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की और दर्जनों को गिरफ्तार किया।

सोशल मीडिया और सरकार का रुख

यहां तक तो मामला पुलिस के हाथ में था, लेकिन जैसे ही मामला सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, प्रदेश सरकार पर हिंदू संगठनों का दबाव बनने लगा क्योंकि मामला मुसलमानों और मस्जिद से जुड़ा हुआ था।

वर्तमान सरकार में मुसलमानों को गलती करने की कोई छूट नहीं है। घटना के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और गृह राज्य मंत्री बेढम के बयान आए कि अपराधियों और पत्थर फेंकने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। पुलिस अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए गए।

पुलिस का बदला व्यवहार और कार्यवाही

फिर क्या था, पुलिस अधिकारी सरकार के ही नौकर होते हैं, पुलिस अधिकारियों का यकायक व्यवहार बदल गया। दूसरे थानों से अतिरिक्त पुलिस फोर्स और आरएसी (RAC) की अतिरिक्त फोर्स मंगाई गई।

पुलिस ने मुस्लिम आबादी वाले मोहल्लों में जाकर:

  • मकानों के दरवाजे तोड़े।

  • मकानों के अंदर महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं के साथ मारपीट की।

  • लोगों को पकड़कर थाने ले जाकर बंद कर दिया।

  • सैंकड़ों मुसलमानों को गिरफ्तार किया गया।

सवाल यह उठता है कि पत्थर फेंकने वाले कौन थे और कहां गए, इसका पुलिस पता नहीं लगा पाई। पुलिस की इस एक तरफा कार्यवाही को सही नहीं कहा जा सकता है, लेकिन सरकार के आदेश पर की जा रही कार्यवाही को कौन गलत बता सकता है?

मुस्लिम समुदाय की स्थिति और अन्य राज्यों से तुलना

वर्तमान में मुस्लिम वर्ग कमज़ोर, अशिक्षित और आर्थिक तंगी का शिकार है और राजनीति में टूल की तरह काम में लिया जा रहा है। राजस्थान में फिर भी गनीमत है कि मारपीट और गिरफ्तारी तक मामला सीमित है, जबकि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और गुजरात में आरोप लगाकर मुकदमे दर्ज किए जाते हैं और बाद में बुलडोजर कार्यवाही करता है।

सांप्रदायिकता और पुलिस की मजबूरी

पुलिस एक तरफा कार्यवाही नेताओं, मंत्रियों और सरकार के दबाव में करती है, क्योंकि पुलिस अधिकारी भी राजनीति के दबाव में काम करते हैं। कानून के अनुसार कार्यवाही करने और लोगों को न्याय देने के दिन अब दिखाई नहीं देते हैं।

देश में सांप्रदायिकता का ज़हर इतना बढ़ता जा रहा है कि झगड़ा करने के लिए बस बहाना चाहिए। कई घटनाएं तो ऐसी सामने आई हैं जहां विपक्षी वर्ग की भी जरूरत नहीं समझी जाती, बल्कि कृत्रिम घटना बनाकर विरोधी समुदाय पर कार्यवाही शुरू कर दी जाती है। देश में एक समुदाय की अजीब स्थिति बना दी गई है। मस्जिद, मदरसा और दरगाहों के मामलों में फंसा कर एक तरफा कार्यवाही की जा रही है।

विकास बनाम विवाद

विकसित देशों में शिक्षा, रिसर्च और व्यापार पर ज़ोर दिया जाता है, जबकि भारत में बात-बात में सांप्रदायिकता नज़र आने लगी है।

इसका एक उदाहरण 25 दिसंबर को भी देखने को मिला:

  • ईसाई समुदाय के फेस्टिवल पर पत्थरबाजी की गई।

  • तोड़फोड़ और मारपीट की घटनाएं हुईं।

  • दोषियों पर पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की, क्योंकि पुलिस पर कोई राजनीतिक दबाव नहीं था।

निष्कर्ष

इस तरह की कार्यवाहियां राजनीतिक मंशा का परिणाम हैं। बहुत कम पुलिस अधिकारी हैं जो एक तरफा और पक्षपातपूर्ण कार्यवाही पसंद करते हैं, लेकिन मजबूरी में उन्हें पुलिस बल का दुरुपयोग करना पड़ता है।

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