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दुनिया के सबसे ऊंचे रेलवे आर्च ब्रिज चिनाब ब्रिज का उद्घाटन पीएम मोदी करेंगे

कश्मीर

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एफिल टावर से ऊंचा पुल: 266 KMPH के तूफान से लेकर भूकंपधमाके तक बेअसरआज यानी 6 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुनिया के सबसे ऊंचे रेलवे ब्रिज ‘चिनाब ब्रिज’ का उद्घाटन करेंगे। वे यहां 272 किलोमीटर लंबे उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेलवे लिंक के सबसे अहम पड़ाव कहे जाने वाले चिनाब रेलवे ब्रिज का उद्घाटन करेंगे। महज 1315 मीटर लंबा यह पुल पूरे प्रोजेक्ट का सबसे कठिन और सबसे ज्यादा समय लेने वाला हिस्सा है। इस ब्रिज को बनाने के फैसले से लेकर उद्घाटन तक में 22 साल का समय लगा।

कश्मीर घाटी में चिनाब नदी पर बना ये ब्रिज इंजीनियरिंग का बेमिसाल नमूना है, जो पेरिस के एफिल टावर से भी ऊंचा है। यह ब्रिज 40 किलो तक विस्फोटक और 8 तीव्रता तक का भूकंप भी झेल सकता है। इसके बनने से पाकिस्तान और चीन परेशानियां बढ़ गई हैं, लेकिन कश्मीर में इतना बड़ा रेल इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में 133 साल लग गए।

अंग्रेजों के समय घाटी तक रेल पहुंचाने की कोशिश हुई

1892 में अंग्रेजों ने जम्मू से कश्मीर तक रेल लाइन बिछाने की कोशिश की। चीन से व्यापार को बेहतर करने के लिए इस पूरे इलाके में रेल लाइन बिछाई जा रही थी, लेकिन कुछ खास हासिल नहीं हुआ।

20वीं सदी की शुरुआत में कश्मीर के राजा प्रताप सिंह ने जम्मू और श्रीनगर के बीच एक रेल लिंक की नींव रखी, लेकिन राजा की मौत के बाद 1925 में इसका काम बंद कर दिया गया। हालांकि, 1890 तक वजीराबाद (अब पाकिस्तान में) से जम्मू के बीच रेल लाइनें बन चुकी थीं। 1947 में बंटवारे के बाद देश की 40% रेल लाइनें और संसाधन पाकिस्तान के हिस्से में चले गए। साथ ही पाकिस्तान ने वजीराबाद-जम्मू रेलवे लाइन को बंद कर दी। आजादी के बाद 1952 में पहली बार कश्मीर तक रेल पहुंचाने का काम शुरू हुआ। इसके लिए एक छोटी सी कोशिश की गई।

दअसल, पंजाब के जालंधर तक ट्रेन जाती थी। वहीं जालंधर के आगे मुकरियां से पठान कोट के बीच पटरी थी, लेकिन मुकरियां और जालंधर के बीच रेलवे लाइन नहीं थी।ऐसे में यहां 72.6 किमी. रेलवे लाइन बिछाई गई। 7 अप्रैल 1952 को जांलधर से पठान कोट तक ट्रेन चलना शुरू हुई, लेकिन अब भी कश्मीर 227 किमी. दूर था। 1966 में पठानकोट से माधोपुर और माधोपुर से कठुआ तक ट्रैक बिछाया गया। ट्रेन भी चलाई गई।

कठुआ पहुंचते ही जम्मू-कश्मीर शुरू हो जाता है। इस रास्ते पर ट्रैक बिछाना बहुत मुश्किल काम था, जिसकी वजह थी रावी नदी। इस नदी पर छोटे-बड़े पुल बनाए गए।

2003 में चिनाब ब्रिज पर मुहर लगी, 22 साल में तैयार हुआ

कारगिल युद्ध के बाद 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने USBRL को सेंट्रल प्रोजेक्ट घोषित किया। यानी इस प्रोजेक्ट का खर्च केंद्र सरकार ने उठाया और निगरानी रखी। 2003 में सरकार ने हर मौसम में कश्मीर घाटी को देश के दूसरे हिस्सों से जोड़ने के लिए चिनाब ब्रिज बनाने का फैसला किया। 2009 तक इस ब्रिज को बनकर तैयार होना था। हालांकि ऐसा नहीं हो पाया। डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान उधमपुर से कश्मीर तक दोनों छोर पर रेल लाइनें बिछाई गईं, लेकिन इनके बीच में रेलवे लाइन नहीं बनी।

2014 में पीएम नरेंद्र मोदी ने USBRL प्रोजेक्ट के लिए प्रोएक्टिव गवर्नेंस एंड टाइमली इम्प्लिमेन्टेशन यानी PRAGATI पहल शुरू की। इसके तहत PM मोदी ने चिनाब ब्रिज के निर्माण की खुद निगरानी की और जरूरी फंड मंजूर किया। अब करीब 2 दशक के बाद 1,486 करोड़ रुपए की लागत से चिनाब नदी पर ये ब्रिज बनकर तैयार हो गया है। इसके साथ कश्मीर को भारत से सीधे जोड़ने का सपना भी पूरा हुआ।

120 साल तक भूकंप, बाढ़ और बर्फबारी को झेल सकता है चिनाब ब्रिज

दुनिया के सबसे ऊंचे रेलवे ब्रिज ‘चिनाब ब्रिज’ को भूकंप, बाढ़, बर्फबारी और विस्फोटकों से बचाने के लिए खास तरीके से तैयार किया गया है।

ब्रिज का इलाका भूकंप के जोन चार में आता है, लेकिन इसे भूकंप क्षेत्र पांच के लिए डिजाइन किया गया है। यानी यह भूकंप के लिहाज से काफी सुरक्षित है और रिक्टर स्केल पर 8 की तीव्रता वाले भूकंप को भी आसानी से झेल लेगा। इस ब्रिज को अगले 120 साल के लिए बनाया गया है।

चिनाब रेलवे ब्रिज को तैयार करने में कुल 17 खंभे बनाए गए हैं। इसका सबसे ऊंचा कॉन्क्रीट का बना खंभा 49.343 मीटर का है और इसका सबसे ऊंचा स्टील का खंभा करीब 130 मीटर का है। स्टील के इस खंभे को बनाने के लिए 29 हजार टन से भी ज्यादा स्टील का इस्तेमाल किया गया है।

डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन यानी DRDO की मदद से इस ब्रिज को ब्लास्ट लोड के लिए भी डिजाइन किया गया है। यानी 40 किलोग्राम या इससे ज्यादा विस्फोटक होने पर भी इस ब्रिज पर ब्लास्ट का कोई असर नहीं पड़ेगा।

हर मौसम में रास्ता चालू रहेगा: यह ब्रिज कश्मीर को जम्मू और देश के बाकी हिस्सों से हमेशा जोड़े रखेगा। अभी तक सर्दियों के मौसम में कश्मीर जाने में परेशानी होती थी क्योंकि बर्फबारी के कारण सड़कें बंद हो जाती थीं, लेकिन अब चिनाब ब्रिज के जरिए हर मौसम में कश्मीर पहुंचा जा सकेगा।

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