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इस्लामोफोबिया के नाम पर दुनिया भर के मुसलमान निशाने पर

जयपुर

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यूरोप-अमेरिका से लेकर भारत तक; अतीत की साजिशों से वर्तमान की नफरत तक का सफर

नई दिल्ली/विशेष विचार। आज ‘इस्लामोफोबिया’ (Islamophobia) के नाम पर पूरी दुनिया के मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है। चाहे यूरोप हो, अमेरिका हो या भारत, हर जगह मुसलमान निशाने पर हैं। इस स्थिति को समझने के लिए अतीत की घटनाओं और वर्तमान वैश्विक राजनीति को समझना आवश्यक है।

अतीत के पन्नों से: तुर्की और विश्व युद्ध की साजिशें

इस्लामोफोबिया की जड़ों को समझने के लिए इतिहास में पीछे जाना होगा। 19वीं शताब्दी में तुर्की मुसलमानों का एक शक्तिशाली देश हुआ करता था, जिसका साम्राज्य एशिया, यूरोप और अफ्रीका सहित तीन महाद्वीपों में फैला था। तुर्की का बादशाह पूरी दुनिया के मुसलमानों का खलीफा माना जाता था।

प्रथम विश्व युद्ध में साजिश के तहत यूरोप के ईसाई राष्ट्रों ने उसे तबाह किया और उसके शासित प्रदेशों को आपस में बांटकर वहां के मुसलमानों को गुलाम बना लिया। इसके बाद द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया दो खेमों में बंट गई—एक का नेतृत्व अमेरिका ने किया और दूसरे का सोवियत रूस ने।

तेल, आर्थिक ताकत और ‘इस्लामोफोबिया’ का जन्म

शीत युद्ध के बाद जब सोवियत रूस खत्म हुआ, तो यूरोप और अमेरिका ने, जिनका इस्लाम से ऐतिहासिक टकराव रहा है, एक नया प्रोपेगंडा शुरू किया। इसका मुख्य कारण यह था कि आजाद हुए मुस्लिम देशों में तेल के भंडार मिले थे, जिससे वे आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे थे और यूरोप में इस्लाम तेजी से फैल रहा था।

इसे रोकने के लिए एक साजिश के तहत इस्लाम और मुसलमानों को आतंक से जोड़ा गया और ‘इस्लामोफोबिया’ शब्द गढ़ा गया। यह दुष्प्रचार किया गया कि इस्लाम पूरी दुनिया के लिए खतरा है। इसी आड़ में यूएनओ (UNO) का सहारा लेकर कई मुस्लिम देशों को तबाह किया गया और अरब क्षेत्र में इज़राइल को खड़ा किया गया, जो आज भी वहां के मूल नागरिकों के खिलाफ संघर्ष कर रहा है।

भारत में बदलता परिदृश्य और नफरत का इको-सिस्टम

भारत में भी इस्लामोफोबिया के नाम पर मुसलमानों को निशाना बनाने का सिलसिला तेज हुआ है।

  • राजनीतिक विचारधारा: आरोप है कि जब से संघ की विचारधारा की समर्थक सरकार सत्ता में आई है, मुसलमानों और उनकी आस्था पर—कभी अजान तो कभी हिजाब को लेकर—हमले बढ़े हैं।

  • मॉब लिंचिंग और नफरत: देश में एक ऐसा इको-सिस्टम तैयार किया गया है जो नफरत फैलाता है। यूपी के गाजियाबाद में पिंकी चौधरी द्वारा खुलेआम तलवार बांटने जैसी घटनाएं सामने आईं, जहां पुलिस की कार्रवाई बहुत हल्की रही और जमानत पर बाहर आने पर आरोपियों का स्वागत नायकों की तरह किया गया।

शाहरुख खान, आईपीएल और दोहरा मापदंड

नफरत का आलम यह है कि क्रिकेट और मनोरंजन भी इससे अछूते नहीं हैं। आईपीएल में जब शाहरुख खान की टीम (KKR) ने एक बांग्लादेशी खिलाड़ी को खरीदा, तो उन्हें ‘गद्दार’ कहा जाने लगा।

  • छिपाए गए तथ्य: खिलाड़ियों की लिस्ट भारतीय क्रिकेट बोर्ड (BCCI) फाइनल करता है, जिसके सचिव गृहमंत्री अमित शाह के बेटे जय शाह हैं। जय शाह से कोई सवाल नहीं पूछा गया, लेकिन शाहरुख खान को निशाना बनाया गया।

  • जूही चावला की चुप्पी: KKR में जूही चावला और उनके पति की भी बड़ी हिस्सेदारी है, लेकिन उनसे कोई सवाल नहीं हुआ, सिर्फ शाहरुख खान को मुसलमान होने के नाते टारगेट किया गया।

इबादतगाहों पर बुल्डोजर और अदालती दांव-पेच

आजकल मस्जिदों और दरगाहों को निशाना बनाने का एक नया ‘ट्रेंड’ शुरू हुआ है।

  • कानूनी प्रक्रिया: पहले किसी मस्जिद या दरगाह की जमीन को सरकारी बताते हुए कोर्ट में सर्वे की अपील की जाती है। आरोप है कि बिना पर्याप्त मौके दिए सर्वे का आदेश होता है, जमीन को अतिक्रमण घोषित किया जाता है और फिर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की जाती है।

  • ताजा मामले: उत्तराखंड में दर्जनों धार्मिक स्थल हटाए गए। दिल्ली की फ़ैज़-ए-इलाही मस्जिद के मदरसे और अस्पताल को, मामला हाईकोर्ट में लंबित होने के बावजूद, तोड़ दिया गया। यूपी के देवरिया में एक मज़ार को सिर्फ एडीएम के आदेश पर हटा दिया गया।

अजीत डोभाल का बयान और ‘बदले’ की आग

हाल ही में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने विवेकानंद फाउंडेशन के एक कार्यक्रम में युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि “विदेशी आक्रांताओं ने हमारे मंदिरों को तोड़ा, इसलिए युवाओं को प्रतिशोध की आग पैदा करनी होगी।”

इस बयान पर सवाल उठते हैं:

  1. बदला किससे? क्या वह अफगानिस्तान (महमूद गजनवी) से बदला लेंगे, जिसके विदेश मंत्री का भारत ने हाल ही में स्वागत किया?

  2. अंग्रेज और पुर्तगाली: क्या डोभाल साहब अंग्रेजों (200 साल का राज) या पुर्तगालियों (गोवा पर 1960 तक राज) से बदला लेने की बात कर रहे हैं?

  3. इशारा: दरअसल, यह इशारा परोक्ष रूप से मुसलमानों के खिलाफ समझा जा रहा है।

निष्कर्ष: सवाल यह है कि नफरत और इस्लामोफोबिया के नाम पर देश को कहां ले जाया जा रहा है? क्या नफरत फैलाकर एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव है? देश की जनता को यह समझना होगा कि सत्ता के लिए नफरत का यह खेल देश के भविष्य के लिए कितना घातक है।

– डॉ. शहाबुद्दीन खान

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