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मौलाना आज़ाद अरबी-फारसी रिसर्च सेंटर: टोंक की सांस्कृतिक शान

Jaipur

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विश्व संग्रहालय दिवस पर ख़ास:

18 मई को पूरी दुनिया में विश्व संग्रहालय दिवस मनाया जाता है। इस दिन का मक़सद हमारी सांस्कृतिक विरासत और म्यूज़ियम्स की अहमियत को समझाना होता है। ऐसे मौक़े पर राजस्थान के टोंक शहर में मौजूद मौलाना अबुल कलाम आज़ाद अरबी-फारसी रिसर्च सेंटर का ज़िक्र ज़रूरी हो जाता है। ये सिर्फ़ एक अनोखा म्यूज़ियम ही नहीं, बल्कि इसमें मज़हब, इतिहास, अदब और विज्ञान से जुड़ी बेहद कीमती किताबें और दस्तावेज़ संभालकर रखे गए हैं।

  • राजस्थान की ज़मीन पर है किताबों का ख़ज़ाना

ये संस्थान दुनिया भर के रिसर्च स्कॉलर्स के लिए एक अहम जगह बन चुका है। अब तक करीब 50 देशों के जानकार यहां आकर रिसर्च कर चुके हैं। हाल ही में फ़्रांस से एक टीम यहां पहुंची थी। यहां रखी गई किताबें और पांडुलिपियाँ (हस्तलिखित किताबें) इतनी खास हैं कि इन्हें और कहीं देखना बहुत मुश्किल है। यही वजह है कि ये इदारा सिर्फ राजस्थान ही नहीं, बल्कि पूरे हिंदुस्तान की एक अलग पहचान है। इस इदारे की बुनियाद टोंक रियासत के तीसरे नवाब मोहम्मद अली ख़ान ने रखी थी। उन्होंने 1864 से 1867 तक हुकूमत की और बाद में बनारस चले गए। वहीं रहते हुए उन्होंने करीब 25 हज़ार बेहद पुरानी और हाथ से लिखी किताबों का ज़खीरा जमा किया। उन्होंने ईरान, इराक, मिस्र जैसे मुल्कों से आलिमों को बुलाकर धार्मिक और ऐतिहासिक किताबों का अनुवाद और तहरीर (लेखन) करवाया। बाद में उनके बेटे अब्दुल रहीम ख़ान ने ये बेशकीमती ख़ज़ाना बनारस से वापस टोंक लाकर इस इदारे की बुनियाद रखी।

  • किताबें जो अब भी वक़्त को ज़िंदा रखे हुए हैं

4 दिसंबर 1978 को राजस्थान के उस समय के मुख्यमंत्री भैरो सिंह शेखावत ने इस इदारे को निदेशालय का दर्जा दिया। इसके बाद यह एक पूरी तरह से सरकारी शोध केंद्र के तौर पर काम करने लगा। आज इस संस्थान में हजारों की संख्या में अनमोल किताबें और दस्तावेज़ सुरक्षित हैं। यहां 8513 हाथ से लिखी गई किताबें, 31432 से ज्यादा छपी हुई किताबें, 17701 पत्रिकाएं और रिसर्च जनरल्स, 719 पुराने शाही फरमान हुक्मनामे, 65000 इस्लामी कानून से जुड़े दस्तावेज़ और 9699 पांडुलिपियां रखी हैं। इसके अलावा यहां बैतुल हिकमत नाम की एक पुरानी और खास लाइब्रेरी भी है, जिसमें 65032 किताबें मौजूद हैं। इन सभी दस्तावेजों और किताबों में अरबी, फारसी, उर्दू, हिंदी, संस्कृत और कई अन्य भाषाओं की ऐसी दुर्लभ और अहम जानकारियाँ हैं, जो न सिर्फ इतिहास को ज़िंदा रखती हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक अनमोल धरोहर हैं।

  • दुनियाभर में खास पहचान

यहां फारसी ज़बान में लिखी रामायण, महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता भी रखी हुई हैं। इसके अलावा यूनानी चिकित्सा, जानवरों की दवा, खगोलशास्त्र, गणित, भूगोल, दवाओं, संगीत, अदब और सूफी फिक्र से जुड़ी किताबें भी यहां मिलती हैं। दो ऐसी किताबें भी यहां मौजूद हैं जिन्हें मंगोल हमलावर हलाकू ने तबाह करना चाहा था, लेकिन वो किसी तरह बचा ली गईं। ये किताबें 1200 ईस्वी से भी पुरानी हैं। 1986 में देश के उस समय के राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह यहां आए थे और कहा था कि ये इदारा मुल्क की गंगा-जमुनी तहज़ीब का एक बेहतरीन नमूना है। उन्होंने कहा था कि यहां की हस्तलिखित किताबों का उर्दू और हिंदी में तर्जुमा कराना चाहिए। 1982 में उपराष्ट्रपति हिदायतुल्ला ख़ान ने भी यहां के काम की तारीफ की थी। ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर की प्रोफेसर डॉ. आयशा मुख़्तार का कहना है कि टोंक की पहचान अब ब्रिटिश म्यूज़ियम तक में दर्ज है और इसकी वजह यही रिसर्च सेंटर है।

  • टोंक की पहचान और विरासत

टोंक सिर्फ़ एपीआरआई (APRI) यानी इस रिसर्च सेंटर तक सीमित नहीं है। सुनहरी कोठी, ईदगाह कोठी, सआदत अस्पताल, एजेंटी बंगला, कोठी नातमाम, दरबार स्कूल, गुलज़ार बाग और सर्किट हाउस जैसी कई पुरानी इमारतें आज भी काम में आ रही हैं। लेकिन मौलाना अबुल कलाम आज़ाद रिसर्च सेंटर वो जगह है जो मज़हब, इतिहास, इल्म और तहज़ीब का ऐसा संगम है जिसे सिर्फ़ देखने की नहीं, बल्कि बचाने और सहेजने की ज़रूरत है। इतने अहम इदारे के सामने आज कई मुश्किलें भी हैं। यहां 45 मंज़ूरशुदा पोस्ट्स (पदों) में से 35 पोस्ट्स सालों से खाली हैं। रिसर्च अफसर तक की नियुक्ति नहीं हुई है। 28 साल पहले भर्ती के पुराने नियम ख़त्म कर दिए गए थे, लेकिन अब तक नए नियम नहीं बने। पिछली सरकार ने यहां म्यूज़ियम बिल्डिंग के लिए तीन करोड़ रुपये का बजट पास किया था, मगर वो सिर्फ़ काग़ज़ों तक ही रह गया।  यह इदारा सिर्फ टोंक या राजस्थान की नहीं, बल्कि पूरे मुल्क की सांझा विरासत और विद्वता का एक शानदार प्रतीक है। इसकी हिफाज़त के लिए हुकूमत, समाज और पढ़े-लिखे लोगों को मिलकर ठोस कदम उठाने होंगे ताकि यह धरोहर आने वाली नस्लों तक महफूज़ रह सके।

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