“जिंदगी मुख्तलिफ शुअरा की नजर में”
जिंदगी अल्लाह तआला की अताकरदा एक अजीम नेमत है I इंसानी जिंदगी अल्लाह तआला की तखलीक का एक अनोखा नमूना है कि अल्लाह ने किस तरह एक गंदे नुत्फे में जान डालकर उसको जिंदगी अता की है I इस पर इंसान अल्लाह तआला का जितना शुक्र अदा करे और एहसान माने उतना ही कम है I अल्लाह तआला ने क़ुरआन-ए-हकीम में कई जगह यह हिदायत फरमाई है कि तुम अपनी जिंदगी के बारे में गौरो फिक्र क्यों नहीं करते कि हमने एक नुत्फे में जान डालकर तुम्हें एक मुकर्रिरा अंधेरियों में तुम्हें परवान चढ़ाकर एक खूबसूरत शक्ल आता फरमाई I इस इंसानी शक्ल में ऐसी खूबियां अता की यानि सोचने, समझने के लिए दिमाग, देखने के लिए आंखें, सुनने के लिए कान, सूंघने के लिए नाक, बोलने के लिए जवान, पकड़ने के लिए हाथ और चलने के लिए पैरों में ताकत अता की I अच्छे बुरे की तमीज, खतरात से बचने की सलाहियत और आगाही बक्शी I यह इंसान अल्लाह तआला की अपने बंदों को अता करदा इन नेमतों का जितना शुक्र करे उतना ही कम है I
मुख्तलिफ शुअराने इंसानी जिंदगी को अपने-अपने अंदाज से समझा और परखा I इसकी तशरीह बयान की है I क्या कभी आपने गौर किया कि अल्लाह तआला के इस पैदा करदा नुत्फे में उसकी तखलीक करदा कितनी चीजें शामिल हैं I तखलीक के बाद एक मुकर्रिरा वक्त के बाद इस जिंदगी का फना होना भी तय है I हर वो जानदार जो पैदा हुआ है वो जरूर एक दिन फना हो जाएगा I यह पैदाइश और फना का सिलसिला ताकयामत तक चलता रहेगा I
उर्दू के शायर पंडित बृज नारायण चकबस्त ने अपने एक शेर में जिंदगी और मौत की तस्वीर इस तरह खींचकर बयान की है-
जिंदगी क्या है ? अजजाये अनासीर का जहूरे तरतीब,
मौत क्या है ? इन्हीं अजजा का परेशां होना I
कुरआन-ए-हकीम में भी अल्लाह ने फरमाया है कि इंसान को हमने खनखनाती मिट्टी से बनाया है, जब इंसान अपने पैदा होने के बाद बचपन के बाद जवानी में कदम रखता है और उस पर जिम्मेदारियों का बोझ पड़ता है तो वो अपनी जिंदगी में पेश आने वाले हालात, वाकियात, मामलात, रंज व गम व मुसीबतें जो पेदरपे पड़ती हैं और वो इन नित नये मरहलों से दो चार होता है तो वह अपनी तखलीफ के मकसद को भूलकर जिंदगी के झमेलों में, रिश्तों में, मोहब्बत और नफरत की कड़वाहट में गमे जिंदगी के अंधेरों में भटक जाता है और उस पर यासो हसरततारी हो जाती है और वह उदास हो जाता है I फिराक गोरखपुरी ने इस इंसानी कैफियत को अपने एक शेर में इस तरह बयान किया है-
जिंदगी क्या है आज इसे ए दोस्त
सोच लें और उदास हो जाएं I
लेकिन हमको जिंदगी में आने वाले हालात निक नई मिसाइल, रिश्तेदारों से पहुंचने वाली अज़ीयतें, दोस्तों के जरिए दिए गम और जमाने के जरिए पहुंचाई गई मुख्तलिफ कुल्फतों पर सब्र करते हैं और जवां हिम्मती से एक आहनी दीवार की मानिन्द तमाम हालात का मुकाबला करते हैं और हर आफत और मुसीबत का खुशी-खुशी सामना करते हैं और उनको पहुंचने वाले हर गम व तकलीफ को ही अपनी जिंदगी का हिस्सा समझते हैं और उस पर कफे अफसोस नहीं मलते I वो इन गमों की ही अपनी जिंदगी समझते हैं I इसी कैफियते जिंदगी को एक शायर ने इस तरह बयान किया है-
उसकी जिंदगी रास आई है
जिसने गम से निजात पाई है I
जिंदगी का शिकवा करना एक आम बात है I
इंसान अपनी जिंदगी में हमेशा शिकवा ही करता है I
उसकी जिंदगी चाहे आला मैयार की हो उसको जिंदगी तमाम आराम व आसाइस मयस्सर हो खूब माल व दौलत हो, औलादें हो, रहने के लिए आलिशान महल जैसा मकान हो, मगर वो उसे पर वह खुश नहीं रहता है I हमेशा शिकवा ही करता रहता है I मसल मशहूर है कि इंसान किसी भी हाल में कभी खुश नहीं रहता I सब कुछ मिल जाने के बाद भी अगर हालात बदल जायें और उसकी जिंदगी में गुरबत और फ़ाकाकशी आ जाए जो अक्सर लोगों की जिंदगी में शिकवे शिकायत उसकी जबान पर होते हैं I इंसान की इस हालत को ग़ालिब ने अपने एक शेर में इस तरह बयान किया है-
जिंदगी जो इसी शक्ल में गुजरी “ग़ालिब”
हम भी क्या याद करेंगे कि खुदा रखते थे I
गालिब का यह शेर यूँ मायने हैं यानि दो मायने निकलते हैं एक माने तो यह है कि अल्लाह ने हमारी जिंदगी खूब अच्छी गुज़ारी I इस तरह के सामान ऐसो इशरत हमें हासिल थे I यह सब अल्लाह का एहसान था दूसरी तरफ इस शेर से यह मतलब भी निकलता है कि शायर अपने इस शेर में खुदा से शिकवा कर रहा है कि उसकी जिंदगी तंगी और कसमपुर्सी की हालत में गुजरी है I क्या खुदा उसको भूल गया है I दूसरों को ही अपनी अता और नवाजिशों से नवाजता है I इस बात पर उसको शिकवा है कि हम भी जिंदगी में यह याद रखेंगे कि हमारा भी कोई खुदा था, मगर हम पर उसकी नवाजिशें नहीं थी I
एक शायरा है “अस्मत” उन्होंने भी जिंदगी में आने वाली मुसीबतों और गमों को अपने रब की मेहरबानियां समझा है I जिनके सबब उनकी जिंदगी बड़ी तारीक हो गई है और उदासी उनका मुकद्दर बन गई है I जिसकी वजह से वो मुस्कुराना चाहते हुए भी मुस्कुरा नहीं सकती है I गोया वह मुस्कुराना ही भूल गई हैं I उनका शेर इस तरह से है-
ग़मे ज़िंदगी की मेहरबानियां हैं
कोई किसी तरह आज कल मुस्कुराये I
अस्मत की बात तो सही है आज के इंसान की जिंदगी में इतनी उलझनें पेचीदगियां और दुश्वारियां पैदा हो गई हैं कि इंसान उनमें उलझ कर रह गया है I इसी कैफियत को एक शायर ने इस तरह बयान किया है-
फिक्र-ए-मआशा इशके बुतां याद रफतगां
इस जिंदगी में अब कोई क्या-क्या किया करें I
गरज़े के इन हालात से इंसान मायूस हो जाता है वो हर वक्त गमो फिक्र के समंदर में गोताजन रहता है और सोचता रहता है कि इस समुद्र से कैसे निकला जाए ! किस तरह अपनी उदासी और गमों से भरी जिंदगी में बाहर लाई जाए ! लेकिन जब उसकी तमाम तदाबीर नाकाम होती नजर आती हैं और उसको चारों तरफ एक अंधेरा नजर आता उसे वक्त उसको महसूस होता है कि उसकी जिंदगी तो एक मशअल की तरह जिसका काम जलने के सिवा कुछ और नहीं है I
ऐसी कैफियत में उसकी कोई खुशी भी याद आती है तो वो भी उसके लिए आंसुओं का सबब बन जाती है, इन हालात को एक शायर ने इस तरह बयां किया है –
हयात (जिंदगी) एक मशअले गम के सिवा कुछ भी नहीं I
खुशी भी याद आती है तो आंसू बनके आती है I
इंसान की जिंदगी में खुशी और गम की आंख मिचौली चलती है I मसल भी मशहूर है कि गम और खुशी का चोली दामन का साथ है I इंसान की हर मुमकिन कोशिश होती है कि वह अपनी जिंदगी में पेश आने वाली मुश्किलात, हादिसात और तकलीफात को हर किसी के सामने बयां ना करें और वो खुद ही अपनी इज्जत और खानदानी वकार और नामो नामूस की हिफाजत हर हालात के कड़वे से कड़वे घूंट को पीता रहता है और बर्दाश्त करता है, क्योंकि मुसिबत का एक-एक से अहवाल कहना मुसिबत से यह और ज्यादा मुसिबत बनता जाता है क्योंकि ग्रेवाल एहवाल सुनकर मजे लेते हैं और नमक मिर्च लगाकर बताते और साहब एहवाल को रुसवा करते हैं I जिससे उस आदमी का विकार मजरूह होता है और उसकी अना को ठेस पहुंचती है I इंसान अपनी आबरू व अना के लिए कभी सख्त और गलत कदम भी उठा लेता है और मौत को गले लगाने तक के लिए तैयार हो जाता है I लेकिन आबरू, विकार व अना को मजरूह नहीं होने देता I इन हालात को नरेश कुमार साद ने अपने एक शेर में इस तरह बयान किया है-
जिंदगी तेरी आबरू के लिए
मर रहे हैं बड़े विकार से हम I
हमारी जिंदगी अल्लाह तआला का अता कर्दा एक हसीन तोहफा है I इसमें करने की कोई जरूरत नहीं यह बुज़दिली है I इंसान अपनी जिंदगी को आला से आलातर बना सकता है अगर वो अल्लाह के एहकाम के मुताबिक अपनी जिंदगी गुजारने का अज्म करे I उसके एहकामात पर अमल करने से उसकी जिंदगी खुशगवार बन सकती है और वो जिंदगी में हर खुशी हासिल कर सकता है I अगर इंसान रब चाही जिंदगी नहीं गुज़ारता है और मनचाही जिंदगी गुज़ारता है तो उसको मायूसी और नाकामी के सिवा कुछ नहीं मिलता I ऐसे इंसान को जिंदगी एक सजा मालूम होती है I उर्दू के एक शायर ने इस कैफियत को एक शेर में इस तरह से बयान किया है-
ए खुदा तूने अपने बंदों को
जिंदगी की बड़ी सज़ा दी है I
जिंदगी को हमको बड़ी सज़ा नहीं मानना चाहिए, बल्कि इसको अपने आमाल, आदत से खूब से खूबतर बनाने की कोशिश करनी चाहिए I जिंदगी में चाहे जितनी आफतें, मुसिबतें, अजीयतें, तकलीफें है और मुश्किलात आयें, उनको कभी भी अपने ऊपर सवार होने का मौका नहीं देना चाहिए I बल्कि उनको बर्दाश्त करने और दूर करने की हर मुमकिन और आला ज़र्फी, बुर्दबारी और हिम्मत के साथ पेश आने वाले हालात, वाकियात और हादसात को बगैर किसी शिकवे और शिकायत के सब्र व तहम्मुल और खुद्दारी के साथ बर्दाश्त करके उनको हल करने की कोशिश करनी चाहिए I क्योंकि एक पत्थर मुसल्सल चोटों यानि तराशने के बाद ही बुत का दर्जा हासिल करता है, लोग उसकी पूजा करने लगते हैं सब उसके आगे झुकते हैं I जिंदगी के इस पहलू को एक शायर ने इस तरह बयान किया है-
संग (पत्थर) क्या है एक सराया इंतजारे बुत तराश
जिंदगी का ख्वाब लोगों यूं भी देखा जाए है I
इंसान अपनी जिंदगी दूसरों के लिए जितनी मेहनत, मशक्कत, उनकी इमदाद करता है इससे माशेर में उसकी इज्जत बढ़ती है, जब इंसान मोहब्बत वाहमी इमदाद को अपनी जिंदगी का शेवा (मकसद) बना लेता है हकदारों का हक अदा करता है I अपनी जात से किसी को दख तकलीफ नहीं पहुंचाता है और अपना माल दीन और दुनिया दोनों के कामों में खुशी-ख़ुशी खर्च करता है और कोई एहसान नहीं करता I दूसरों के अलावा अपनी खुद की जिंदगी में पेश आने वाले गमों और दुखों का शिकवा जबान पर नहीं लाता, बल्कि इनको अपने रब का एक इनाम समझकर बखुशी सब्र करता है और खूब से खूबतर करने की कोशिश करता और उम्मीद रब से रखता है तो उसकी जबान पर ग़ालिब का यह शेर उसकी जवान पर वालिहाना आ जाता है जो इस तरह है-
जान दी हुई उसी की थी
हक़ तो यह है कि हक़ अदा ना हुआ I
इंसानी जिंदगी में अक्सर ऐसे मौके और हालात पेश आते हैं जिनकी वजह से मायूस हो जाता है और अपनी नाकामी से अपने आप पर उसको झुँझल आती है I उसकी मिजाज में चिढ़चिढ़ापन आता है हमेशा अफ़सुर्दा रहता है I किसी काम में उसका दिल नहीं लगता हर वक्त उसका मन भारी रहता है I दूसरे लोगों को देखकर उसका दिल दुखी हो जाता है और अपनी बदनसीबी, कम मायगी और दिमागी सुकून दरहम बरहम होने पर कफे अफ़सोस मलता रहता है I ऐसी हालत में हर एक अपनी जिंदगी की नाकामियों की शिकायत करता है I ऐसे इंसान को एक शायर अपने शेर से उसको दिलासा देता, उसकी हिम्मत बढ़ाता और उसके मुर्दा दिल में इस तरह जान डालता है, उसके दिल में एक उम्मीद की किरन जगाता है और जिंदगी में हमेशा जिंदा दिल रहने का मशवरा देता है, जो इस तरह है-
जिंदगी जिंदा दिली का नाम है
मुर्दा दिल क्या खाक जिया करते हैं I
कुछ ऐसे भी शुअरा हैं जो इंसानों को जिंदा दिल होने की तलकीन के बजाए उन्हें और मायूसी की तरफ ले जाते हैं I उन्हें जिंदगी में तारीकी के सिवा कुछ नज़र नहीं आता I जिंदगी के हर मोड़ पर वो नाकामी और नामुरादी का ही तसव्वुर करते हैं I वो अपनी जिंदगी को बनाने व संवारने की कोशिश नहीं करते और ऐसे आमालों में मुब्तिला रहते हैं जिनके बाइस उनकी जिंदगी और तारीक हो जाती है और अपनी किस्मत को कोसते हैं I इसका इल्ज़ाम अल्लाह के सर रखते हैं कि उसने हमारी किस्मत ही ऐसी बनाई है कि उसमें रंज, गम और दुखों के सिवा कुछ नहीं I ऐसे लोगों की जिंदगी को एक शायर ने एक मुफलिस की क़बा है और दुखों और दर्दों का पेबन्द से तशबीह देकर इसतरह शेर कहा है-
जिंदगी एक मुफलिस की क़बा है जिसमें
हर घड़ी दर्द के पेबन्द लगे जाते हैं I
इंसान की जिंदगी अगर पुर दर्द हो तो उसको हिम्मत नहीं हारनि चाहिए I अगर इंसान आला हिम्मती और कोशिश से जिंदगी में पेश आने वाले हालात का और आफ़ात का मुकाबला करे तो वो मुसिबत जो उसके कदमों को डगमगाती है उनका तदारुक कर सकता है I अगर वो अज्म कर ले कि हर मुश्किल व मुसिबत को मुझे खुशी-खुशी बर्दाश्त करना है और उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना है तो उसका यह अज्म इरादा एक दिन जरूर उसको उसकी मंजिलें मकसूद तक पहुंचा देगा I क्योंकि यह जिंदगी जो हमारे रब ने हमको अता की है वो एक अज़ीम नेमत और हमारा इम्तिहान है और इस इम्तिहान में हमको पास होना भी जरूरी है I अक्सर शुअरा ने हमेशा जिंदगी का शिकवा ही किया है I उर्दू शायर मीर तकी मीर जिनकी शायरी पुरदर्द शायरी है अपनी जिंदगी का एक शेर इस तरह बयान करते हैं-
हस्ती अपनी हबाब सी है
यह नुमाइश एक सराब की सी है I
मीर साहब के नजदीक जिंदगी हबाब यानि पानी के बुलबुले की सी है, जितनी देर बुलबुला रहता है बस इंसानी जिंदगी की यही हकीकत है I इसमें जो चमक-दमक नज़र आती है वो एक धोका है I मगर हमको जिंदगी को इस नजरिए से नहीं देखना चाहिए असलियत इसकी हकीकत को जानने समझने और परखने की कोशिश करनी चाहिए I क्योंकि अल्लाह तआला का फरमान है कि हमने इंसान को बेफायदा पैदा नहीं किया है हमने इसको हमारी बंदगी के लिए पैदा किया है जोकि इसकी जिंदगी का असल मकसद है I बेशक तुम्हें हमारी ही तरफ लौटकर आना है I लेकिन शुअरा ने इंसानी जिंदगी के मकसद, कि हमारा रब हमसे क्या चाहता है ? इस नायाब जिंदगी से गोरों फ़िक्र ना करते हुए अपने तख़य्युल की परवाज़ में शराबुर होकर जिंदगी को एक मुअम्मा बना दिया है वो हमेशा इस मु अम्मे की गुत्थी को सुलझाने में दीवानगी की हद तक पहुंच जाते हैं और इस जिंदगी को दीवाने के ख्वाब से ताबीर करते हैं जो कतअन दुरुस्त नहीं है I एक शायर का यह शेर मुलाहिज़ा कीजिए-
एक मुअम्मा है समझने का ना समझाने का जिंदगी का हे को हे ख्वाब है दीवाने का
ज़िन्दगी काहे को है एक ख्व़ाब है दीवाने का I
जिंदगी दरअसल दीवाने का ख्वाब नहीं है बल्कि अल्लाह तआला का एक नायाब तोहफा है, उसका बड़ा इनाम है अगर वो हमको इंसान की जगह जानवर बना देता तो उसको रोकने वाला कौन था, कोई नहीं उसने इंसान को इस कायनात में सबसे अशरफ आला बनाया है और अशरफुल मखलूक होने का दर्जा अता किया है I शायर अपने तखय्युल की परवाज में यह भूल जाते हैं कि हर अच्छी बुरी तकदीर अल्लाह की तरफ से होती है जो पहले से लिखी होती है कि इंसान की जिंदगी से रंज व ग़म में गुजरेगी और किसकी जिंदगी ऐशो इशरत में बसर होगी I हमको हर हाल में कायनात के रब का शुक्र अदा करना चाहिए I उसने जिंदगी में जो नेमतें हमको अता की हैं, उनका शुक्र अदा करना चाहिए और अगर जिंदगी में कुछ दुख, गम या मुसिबतें तो उन पर सब्र करना चाहिए क्योंकि अल्लाह सब्र करने वालों के साथ होता है I इंसान की खसलत है कि वो किसी हाल में भी खुश नहीं रहता है I हर वक्त बस उसकी जबान पर शिकवा रहता है I लिहाज़ा अल्लाह की रज़ा में राज़ी रहना चाहिए और उसके इस एहसान कि उसने हमें अशरफुल मखलूक बनाया की कदर करते हुए उसके बताए हुए एहकामों पर अमल करते हुए उनके मुताबिक अपनी जिंदगी गुजारने की कोशिश करनी चाहिए I अल्लाह तआला हम सबको उसके बताए तरीके जो कुरआन और अहादीस में वाजेह किया गया है, पर अमल करते हुए जिंदगी गुज़ारने की तौफीक अता फरमाए I आमीन
-हबीबुल्ला एडवोकेट,
जवाहर नगर, जयपुर
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