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केजरीवाल बोले- मोदी सरकार का अमेरिकी कपास पर टैक्स हटाने का फैसला

नई दिल्ली

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किसानों के लिए झटका या इंडस्ट्री की मजबूरी?

नई दिल्ली।  देश की सियासत एक बार फिर किसानों और विदेशी व्यापार नीति के बीच उलझ गई है। गुरुवार को आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी कपास पर लगने वाला 11% इम्पोर्ट टैक्स हटाकर भारतीय किसानों के साथ धोखा किया है। केंद्र सरकार की ओर से जारी प्रेस रिलीज़ में यह स्पष्ट किया गया कि अमेरिकी कपास को टैक्स फ्री करने की अवधि 31 दिसंबर तक बढ़ाई गई है। वित्त मंत्रालय का तर्क है कि यह फैसला घरेलू टेक्सटाइल इंडस्ट्री की डिमांड पूरी करने के लिए लिया गया है, ताकि उद्योग को कच्चे माल की कमी न झेलनी पड़े।

केजरीवाल के आरोप

प्रेस कॉन्फ्रेंस में केजरीवाल ने कहा कि यह फैसला सीधे-सीधे भारतीय किसानों के खिलाफ है। उनके मुताबिक— जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारतीय प्रोडक्ट्स पर 50% टैरिफ लगाया है, तब भारत को जवाबी कार्रवाई करनी चाहिए थी। सरकार को चाहिए था कि वह अमेरिकी सामानों पर 100% तक टैक्स बढ़ाए, ताकि अमेरिका को सबक मिले। इसके बजाय प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिकी कपास को टैक्स फ्री कर दिया, जिससे भारत के कपास किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि यह नीति किसानों को आत्महत्या करने तक मजबूर कर सकती है, क्योंकि घरेलू मंडियों में कपास की कीमतें गिर जाएंगी। केजरीवाल ने यह भी कहा कि यह फैसला बताता है कि मोदी सरकार की प्राथमिकता विदेशी दबाव और बड़े उद्योगपतियों का हित है, न कि देश के अन्नदाता किसान।

केंद्र सरकार का बचाव

केंद्र ने अपने बचाव में कहा कि— भारत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी इंडस्ट्री है और यह लाखों लोगों को रोजगार देती है। हाल के वर्षों में घरेलू कपास उत्पादन कम हुआ है और उद्योग को कच्चे माल की कमी झेलनी पड़ रही है। ग्लोबल कॉटन मार्केट में कीमतें बढ़ने से कपड़ा उद्योग के लिए प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो रहा है। अगर उद्योग को सस्ता कपास नहीं मिलेगा तो एक्सपोर्ट घटेगा और रोजगार पर असर पड़ेगा। वित्त मंत्रालय ने यह भी साफ किया कि अमेरिकी कपास पर टैक्स छूट स्थायी नहीं है, बल्कि केवल 31 दिसंबर तक दी गई है।

किसानों की स्थिति

भारत दुनिया के सबसे बड़े कपास उत्पादक देशों में से एक है। खासकर महाराष्ट्र, तेलंगाना, गुजरात और मध्य प्रदेश में लाखों किसान कपास की खेती पर निर्भर हैं। पिछले कुछ सालों में कपास की कीमतों में उतार-चढ़ाव से किसान पहले ही परेशान हैं। अगर अमेरिकी कपास टैक्स फ्री होकर बड़े पैमाने पर भारत आएगा तो स्थानीय किसानों की फसल के दाम गिर सकते हैं। मंडियों में पहले से ही मांग और आपूर्ति का असंतुलन किसानों को घाटे में डाल रहा है। किसानों का कहना है कि सरकार को एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) मजबूत करना चाहिए, ताकि उन्हें नुकसान न उठाना पड़े।

इंडस्ट्री बनाम किसान: दो ध्रुवों की खींचतान

यह मसला दरअसल दो अलग-अलग हित समूहों की खींचतान बन चुका है— किसान, जिन्हें अपनी फसल का वाजिब दाम चाहिए। टेक्सटाइल इंडस्ट्री, जिसे सस्ता कच्चा माल चाहिए ताकि वह वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सके। सरकार का झुकाव फिलहाल इंडस्ट्री की ओर दिखाई दे रहा है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि लंबे समय तक यह नीति किसानों को हाशिए पर धकेल सकती है।

राजनीतिक मायने

यह विवाद सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक मुद्दा भी बन गया है। विपक्ष को मोदी सरकार को घेरने का एक बड़ा मुद्दा मिल गया है। किसानों का भरोसा जीतना हर पार्टी के लिए अहम है, खासकर तब जब देश कई राज्यों में विधानसभा चुनावों की तैयारी कर रहा है। केजरीवाल ने यह बयान ऐसे समय पर दिया है जब विपक्ष मोदी सरकार को अमेरिका से रिश्तों और व्यापारिक समझौतों को लेकर लगातार घेर रहा है।

आगे का रास्ता

विशेषज्ञों का मानना है कि इस विवाद का हल एक संतुलित नीति से ही निकल सकता है। सरकार को चाहिए कि टेक्सटाइल इंडस्ट्री की मांग भी पूरी करे और किसानों को भी उचित दाम की गारंटी दे। MSP को कानूनी गारंटी देना और कपास किसानों के लिए विशेष राहत पैकेज लाना जरूरी है। साथ ही, लंबे समय के लिए भारत को कपास उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान देना होगा, ताकि विदेशी आयात पर निर्भरता कम हो। अमेरिकी कपास पर टैक्स हटाने का फैसला फिलहाल टेक्सटाइल इंडस्ट्री के हित में है, लेकिन इसके चलते किसानों में असंतोष बढ़ना तय है। केजरीवाल के आरोपों ने इस फैसले को राजनीतिक बहस का हिस्सा बना दिया है। अब देखना यह होगा कि मोदी सरकार किसानों की चिंताओं को दूर करने के लिए क्या कदम उठाती है।

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