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इस्लामिक नाटो और भारत:

जयपुर

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तुर्की, सऊदी और पाकिस्तान का नया गठजोड़

पाकिस्तान की न्यूक्लियर पावर और तुर्की की सैन्य शक्ति का मिलन; क्या भारत के लिए खतरे की घंटी?

नई दिल्ली/इस्लामाबाद। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में ‘इस्लामिक नाटो’ की चर्चा जोरों पर है। इस नए गठजोड़ में फिलहाल तीन प्रमुख देश—तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान शामिल हैं। इन तीनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ है, जिसके तहत इनमें से किसी भी एक देश पर हमला, तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। यह समीकरण भारत के लिए चिंता का विषय बन सकता है।

न्यूक्लियर पावर बना पाकिस्तान का हथियार

पाकिस्तान भले ही गरीबी, बेरोजगारी और भारी राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा हो, लेकिन उसके ‘न्यूक्लियर पावर’ संपन्न होने का फायदा उसे मिल रहा है। दुनिया के ज्यादातर देश एक ‘न्यूक्लियर छतरी’ (Nuclear Umbrella) चाहते हैं, क्योंकि परमाणु शक्ति संपन्न देश को सुरक्षित माना जाता है। यही कारण है कि तमाम मुस्लिम देश पाकिस्तान की ओर खिंचे चले आ रहे हैं। इसके अलावा, पाकिस्तान वर्तमान में चीनी तकनीक से बने J-17 लड़ाकू विमानों की मार्केटिंग कर बड़ा मुनाफा कमा रहा है।

तुर्की की सैन्य ताकत और भारत विरोधी रुख

इस गठबंधन में तुर्की एक बड़ी सैन्य शक्ति के रूप में उभरा है। वह विश्व की 9वीं सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है और उसकी ड्रोन तकनीक का लोहा पूरी दुनिया मानती है। तुर्की ने पांचवीं पीढ़ी के सैन्य विमान ‘कान’ (KAAN) का निर्माण कर अपनी क्षमता साबित की है।

भारत के लिए चिंता की बात यह है कि तुर्की ने अतीत में भारत के खिलाफ युद्ध में पाकिस्तान का खुलकर साथ दिया था। वह संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के साथ मिलकर कश्मीर की आजादी का मुद्दा उठाता रहा है। तुर्की और पाकिस्तान दोनों का रुख भारत विरोधी रहा है।

सऊदी अरब और भारत के रिश्तों पर असर

इस्लामिक नाटो का तीसरा प्रमुख देश सऊदी अरब है, जो आर्थिक रूप से बेहद मजबूत है। वर्तमान में भारत और सऊदी अरब के संबंध काफी अच्छे हैं, लेकिन पाकिस्तान और तुर्की के साथ हुए इस सैन्य समझौते के बाद, सऊदी-भारत रिश्तों पर भी असर पड़ना संभावित है। यह संतुलन भारत के लिए एक कूटनीतिक चुनौती बन सकता है।

अन्य मुस्लिम देशों का जुड़ाव और बांग्लादेश का बदलता रुख

विशेषज्ञों का मानना है कि इस्लामिक नाटो भारत के लिए किसी भी लिहाज से सही साबित नहीं होगा, क्योंकि भविष्य में इसमें बांग्लादेश, मिस्र, लीबिया, सीरिया, मलेशिया, इंडोनेशिया, कतर और बहरीन जैसे देश भी शामिल हो सकते हैं।

सबसे चौंकाने वाला बदलाव बांग्लादेश के रुख में देखा जा रहा है। भारत का यह पड़ोसी देश, जो भारत की मदद से ही पाकिस्तान से अलग होकर आजाद बना था, अब चीन और पाकिस्तान के खेमे में तेजी से जा रहा है। बांग्लादेश अब भारत से अच्छे संबंध बनाने के बजाय पाकिस्तान से लड़ाकू विमान, ड्रोन और मिसाइलें खरीद रहा है।

भारत के लिए सुरक्षा चुनौतियां

इस्लामिक नाटो का गठन पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के लिए सुरक्षा के लिहाज से फायदेमंद हो सकता है, लेकिन भारत के लिए यह नुकसानदायक साबित होने के अवसर बढ़ाता है।

  • पाकिस्तान की मजबूती: इस गठबंधन से पाकिस्तान की सैन्य और आर्थिक ताकत कई गुना बढ़ जाएगी। चूंकि पाकिस्तान भारत में चोरी-छिपे आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देता रहा है, उसका ताकतवर होना भारत के लिए सीधा खतरा है।

  • अमेरिका की भूमिका: यह ध्यान देने योग्य है कि इस्लामिक नाटो में शामिल देश कहीं न कहीं अमेरिका के प्रभाव क्षेत्र में आते हैं। इसलिए, इस गठबंधन की मजबूती और दिशा काफी हद तक अमेरिका की मर्जी और कूटनीति पर निर्भर करेगी।

निष्कर्ष: भारत आर्थिक और सैन्य शक्ति के लिहाज से एक मजबूत देश है, फिर भी बदलते हुए इन समीकरणों, विशेषकर ‘इस्लामिक नाटो’ और पाकिस्तान की बढ़ती सक्रियता पर भारत को पैनी नजर रखनी होगी।

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