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क्या ईरान-इजरायल युद्ध सभ्यताओं के संघर्ष के कारण तो नहीं है ?

Jaipur

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डॉ. एस खान

ईरान-इजरायल युद्ध को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा, जिसमें यहूदी, इसाईयों और इस्लामी विचारधारा के वे संघर्ष हैं जिसमें इसाई देशों ने इस्लामिकिफोबिया के नाम पर हर उस मुस्लिम देश को तबाह किया जो सैन्य और आर्थिक रूप से मजबूत होने की कोशिश करता है।

ईरान-इज़रायल युद्ध को सम‌झने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा, जिसमें यहूदी, इसाईयों और इस्लामी विचारधारा के वे संघर्ष हैं जिसमें इसाई देशों ने इस्लामिकफोबिया के नाम पर हर उस मुस्लिम देश को तबाह किया जो सैन्य और आर्थिक रूप से मजबूत होने की कोशिश करता है।

इन सभ्यताओं के संघर्ष को समझने के लिए हमें इतिहास के बहुत पीछे जाना होगा और उन घटनाओं को समझना होगा| जब हम उन घटनाओं का विश्लेषण करेंगे तो हमें आसानी से समझ में आ जायेगा कि यह युद्ध क्यों हो रहा है?

यूरोप के प्रसिद्ध समाज शास्त्री सैमुएल हंटीगटन ने एक किताब लिखी थी (क्लैश ऑफ़ सिविलाइजेशन्स) सभ्यताओं का संघर्ष उसमें भी उन्होंने इतिहास की उन घटनाओं का व्यापक विश्लेषण किया था कि कैसे पहले यहूदियों और इसाईयों में सैंकड़ों सालों तक जंग चली और फिर कैसे इस्लाम के उदय के बाद इस्लाम के खिलाफ यहूदी और इसाई एकजूट हो गए।

उन्होनें अपनी इसी किताब में विश्लेषण किया था कि कैसे भविष्य में इसाई राष्ट्र अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक श्रेष्ठता को साबित करने के लिए इस्लामी मुस्लिम देशों से संघर्ष करेंगे। इन सभ्यताओं के संघर्ष को समझने के लिए पहले हमें यहूदी और इसाईयों के संघर्ष को समझना होगा। इसाई मानते हैं कि “सन ऑफ गॉड” ईसा मसीह को सलीब (सूली पर) यहूदियों ने चढ़ाया था। इसलिए सैंकड़ों सालों तक यह आपस में लड़ते रहे और यह लड़ाई यरुशलम शहर को लेकर थी, क्योंकि यहूदी इसाई और मुसलमान तीनों ही के लिए यह शहर धार्मिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। इसाई समुदाय की रोमन साम्राज्य के रूप में एक मज़बूत सत्ता स्थापित हुई (जो वर्तमान का इटली है) इस साम्राज्य का पूरे यूरोप पर क़ब्ज़ा था। उसने ताक़त से यरुशलम पर क़ब्ज़ा कर लिया और यहूदियों को बाक़ी अरब देशों में भागने पर मजबूर कर दिया। उस समय ब्रिटेन का कोई नाम भी नहीं जानता था। रोमन सत्ता का सैंकड़ों सालों तक यरुशलम पर क़ब्ज़ा रहा और फिर इस्लाम का उदय हुआ।

इस्लाम के दूसरे खलीफा हजरत उमर के दौर में इस्लामी फ़ौजों ने रोमन सेनाओं को हराकर यरुशलम को फ़तह कर लिया। उसके बाद इस्लामी साम्राज्य फैलता हुआ यूरोप के स्पेन तक पहुँच गया। जब दुनिया में इस्लामी फ़ौजों की श्रेष्ठता क़ायम हुई तो रोमन साम्राज्य तहस नहस हो गया, इस्लामी विचार धारा को रोकने के लिए अपने तमाम मतभेद ख़त्म करके यहूदी और इसाई एक हो गये और अब यह जंग दो खेमों में बँट गयी। एक तरफ़ इस्लामी विचारधारा थी और दूसरी तरफ़ यहूदी और ईसाई थे। तब से यह सभ्यताओं का संघर्ष जारी है। इसी बीच तुर्कों ने उस्मानिया सल्तनत क़ायम कर ली, जो तीन महाद्वीपों में फैली हुई थी यूरोप, एशिया और अफ्रीका और अब पूरा फिलिस्तीन यरूशलम सहित उस्मानिया सल्तनत के क़ब्ज़े में था। उधर अब रोमन साम्राज्य की जगह ब्रिटेन ने ले ली थी। जिसका दुनिया के बहुत हिस्से पर क़ब्ज़ा था। इस्लाम विरोधी ताक़तों ने सबसे पहले स्पेन से मुस्लिम शासन को ख़त्म किया और सभी मुसलमानों को स्पेन में या तो मार दिया गया या उन्हें इसाई बना दिया गया। लेकिन वे उस्मानिया सल्तनत का कुछ नही बिगाड़ पा रहे थे और यहाँ का शासक पूरी दुनिया का खलीफा माना जाता था। यही वह दौर था जब अमेरिका की खोज हुई और वह एक नये देश के रूप में उभर रहा था। इसी समय पर यूरोप में यहूदी अपने लिए एक अलग देश की माँग कर रहे थे और उनको अलग देश देने के लिए 1917 बालफ़ोर घोषणा हुई जिसमें माना गया कि यहूदियों का एक अलग देश देश होना चाहिये। यहूदी फिलिस्तीन को अपना देश बनाना चाहते थे। लेकिन ताकतवर उस्मानी सल्तनत के कारण यह मुमकिन नहीं हो पा रहा था, इसी समय यूरोप में प्रथम विश्व युद्ध शुरू हो गया और तुर्की ने जर्मनी का साथ दिया। लेकिन यह खेमा युद्ध में हार गया और जीते हुए देशों ने उस्मानिया सल्तनत को बर्बाद कर दिया। कुछ अरब देशों को उन खानदानों के हवाले कर दिया जिन्होंने उस्मानी शासन को खत्म करने में इसाईयों की मदद की थी। फिलिस्तीन के एक बड़े हिस्से पर ब्रिटेन ने कब्ज़ा कर लिया और वहां पर यहूदियों को बसने की आज़ादी दे दी। उस्मानी सल्तनत और मुसल‌मानों की कोई ताकत नहीं बची थी। फिर यूरोप में दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया और हिटलर ने यहूदियों पर बहुत जुल्म किया, तब फिलिस्तीन के अरबों ने इन पीड़ित यहूदियों का फिलिस्तीन में दिल से स्वागत किया और दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1948 में जबरन अमेरिका और यूरोप के देशों ने फिलिस्तीन में इजरायल नाम का देश उन पर लाद दिया। दूसरे विश्व युद्ध में क्योंकि ब्रिटेन बहुत कमजोर हो गया था और विश्वपटल पर अमेरिका एक नये थानेदार के तौर पर उभर गया था। इस नये थानेदार का एक ही एजेण्डा था कि अब दुनिया में किसी भी मुस्लिम देश को सैन्य और आर्थिक रूप से मजबूत नहीं होने देगा।

अमेरिका नाम के इस नए थानेदार ने हर मुस्लिम देश में ऐसे लोगों को सत्ता में बैठाया जो इसकी कठपुतली थे। इसका सबसे पहले खुला विरोध सऊदी अरब के किंग फैसल ने किया था। वे अमेरिका और यूरोप के देशों की साजिशों को समझ गए थे और उन्होंने मुस्लिम देशों को एकजुट करने का प्रयास शुरू किया। उसका नतीजा यह निकला कि उनकी हत्या करवा दी गई। उसके बाद इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने कोशिश की तो एक प्रोपेगंडा खड़ा किया गया कि इराक के पास रासायनिक हथियार हैं। इसका बहाना बनाकर इराक पर हमला किया गया और उस देश को तबाह किया गया और सद्दाम हुसैन को फांसी दी गई। हालांकि बाद में सच सामने आया कि इराक के पास कोई रासायनिक हथियार नहीं थे। ऐसा ही खेल लीबिया में खेला गया और लीबिया को तबाह किया गया।अब पूरी इस्लामी दुनिया में एकमात्र ईरान ऐसा देश है जो अमेरिका और यूरोप की साजिशों को समझ रहा है वह समझ रहा है कि यह राष्ट्र इस्लामीफोबिया के नाम पर इस्लामी विचारधारा को नष्ट करके अपनी पश्चिमी सभ्यता थोपना चाहते हैं। पूरी पश्चिमी सभ्यता इसाईयत की श्रेष्ठता के सिवा कुछ नहीं और किसी भी मुस्लिम देश में इसको चुनौती देने की ताकत नहीं बची है। हर मुस्लिम देश में सत्ता उनके पास है जो अमेरिका की कठपुतली है। ऐसे में यूरोप और अमेरिका को ईरान बर्दाश्त नहीं हो रहा है और वे कैसे भी ईरान को बर्बाद कर देना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने बहाना बनाया कि ईरान परमाणु हथियार क्यों बना रहा है, जबकि ईरान बार-बार इनकार कर रहा है कि परमाणु हथियार बनाने का उसका कोई इरादा नहीं है। लेकिन यह तो सिर्फ बहाना है। असल वजह यह है कि ईरान की शासन व्यवस्था क्यों इस्लामिक विचारधारा के आधार पर चल रही है। इसलिए ईरान को नष्ट करना ही होगा और इसीलिए इजराइल को आगे करके ईरान पर युद्ध थोपा गया। सामने इजराइल दिख रहा है। लेकिन उसके पीछे सारे इसाई देश मय अमेरिका खड़े हैं। ऐसे में आसानी से समझा जा सकता है कि यह युद्ध सभ्यताओं के संघर्ष के कारण ही हो रहा है।

 

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