बंगाल में बाबरी मस्जिद की आड़ में बीजेपी के लिए तैयार चुनावी प्लेटफॉर्म?
सियासत का नया खेल: हुमायूं कबीर की ‘बाबरी’ चाल
कोलकाता/जयपुर। ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी छोड़कर अपने चुनाव का ऐलान करने वाले हुमायूं कबीर अब पश्चिम बंगाल में बाबरी मस्जिद की नींव रखकर एक नई सियासत का खेल खेल रहे हैं। आरोप लग रहे हैं कि वे मुसलमानों को भावनात्मक रूप से अपनी ओर खींचकर अंततः बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए एक मोहरा बन रहे हैं।
जज़्बात बनाम हकीकत
मुसलमान अक्सर जज़्बात में फैसले लेते हैं और यह नहीं सोचते कि उनका यह कदम भारत के मुसलमानों को कितना नुकसान पहुँचा सकता है। हुमायूं कबीर, जिन्होंने बंगाल चुनाव और अपने निजी लाभ के लिए यह प्लेटफॉर्म खड़ा किया है, क्या वे उन मस्जिदों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेंगे जो अपनों की लापरवाही से वीरान पड़ी हैं? अब इस ‘नई बाबरी मस्जिद’ के कारण नफरती सियासत की नज़र उन पुरानी मस्जिदों पर भी पड़ गई है।
डर यह है कि मुसलमान, जो थोड़ा सुकून में आया था, दोबारा हादसों का शिकार न हो जाए। मौजूदा दौर में धर्म की सियासत चरम पर है। अगर इस मस्जिद के तमाशे से देश का सौहार्द बिगड़ा, तो क्या हुमायूं कबीर इसकी ज़िम्मेदारी लेंगे? क्या वे मॉब लिंचिंग, जान-माल, नौकरी और कारोबार की सुरक्षा की गारंटी देंगे?
वीरान मस्जिदों की सुध कौन लेगा?
नई ईंट रखने से पहले उन मस्जिदों को आबाद करने की सोचनी चाहिए जो अभी वीरान पड़ी हैं।
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हैरिटेज का हाल: कई मस्जिदें हेरिटेज (धरोहर) में आती हैं, लेकिन उनका हाल पूछने वाला कोई नहीं है। नमाज़ तो दूर, वहाँ झाड़ू लगाने वाला भी कोई नहीं।
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पुरातत्व विभाग की लापरवाही: जो मस्जिदें पुरातत्व विभाग के अधीन हैं, उनकी लापरवाही के कारण वहां कुत्ते घूम रहे हैं, जुआ खेला जा रहा है और वे असामाजिक तत्वों का अड्डा बन चुकी हैं। दिल्ली की कई मस्जिदों का यही हाल है।
लेखिका का कहना है कि जो मस्जिदें पहले से मौजूद हैं, पहले उन्हें नफरती ताकतों से बचाएं और उन्हें आबाद करें।
बाबरी का दर्द और ‘नकल’ की सियासत
बाबरी मस्जिद जैसी कोई दूसरी मस्जिद अब नहीं बन सकती। डिज़ाइन कॉपी करने से असल बाबरी मस्जिद वापस नहीं आएगी। बाबरी का दर्द हर मुसलमान के सीने में है और रहेगा। मगर, अब कोशिश यह होनी चाहिए कि दूसरी मस्जिदें बाबरी की तरह ‘शहीद’ न हों।
एक नई मस्जिद बनाना सिर्फ सियासत के सिवा कुछ नहीं है। मुसलमानों को समझना होगा कि फैसले जज़्बात से नहीं, दिमाग़ से लिए जाएं। मस्जिदों की तादाद बढ़ाने से मुसलमान मज़बूत नहीं होगा, बल्कि जो मस्जिदें हैं, उन्हें बचाने, बेहतर किरदार बनाने और आधुनिक शिक्षा से ही कौम मज़बूत होगी।
हुमायूं कबीर की नहीं, सर सैयद की ज़रूरत
मुसलमान लीडर्स कौम का वक़्त क्यों बर्बाद कर रहे हैं? आज ज़रूरत मस्जिदें गिनवाने की नहीं, बल्कि यूनिवर्सिटी, कॉलेज और मेडिकल कॉलेज बनवाने की है। रोज़गार के अवसर पैदा करें ताकि गरीब लोगों को राशन के लिए दूसरों पर निर्भर न रहना पड़े।
हुमायूं कबीर ने अपनी सियासत गर्म करने के लिए ‘मुर्दा मस्जिदों’ की ओर नफरती सरकार का ध्यान खींच दिया है। अगर इस फसाद में कोई नुकसान हुआ तो ज़िम्मेदार कौन होगा? बंगाल चुनाव में यह सब एक ‘कमीशन’ का खेल लग रहा है। एक अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) तन्हा अपनी जंग लड़ रही है। आज मुसलमानों को हुमायूं कबीर की नहीं, ‘बाबा सर सैयद अहमद खान’ जैसी सोच की ज़रूरत है। नबी ने भी एक मस्जिद तामीर की थी, हमें उसी को सजदों से आबाद करना चाहिए।
(लेखिका: मैंमूना नरगिस, आर्ट कंज़र्वेंटर एवं सोशल एक्टिविस्ट, जयपुर)
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